सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है !
वास्ते आप आज्ञा कीजिये तो मै उसके तईं ले आऊं और वह
कुँवरको देखे भगवान् चाहे तो आराम हो जायगा. इसके सिवाय
और कुछ यत्न नहीं. राजाने कहा-तेरे बेटकी स्त्री क्या जाने ?
तब फिर दीवानने कहा-महाराज ! वह एक योगीकी चेली है,
और उस योगीने मंत्र, यंत्र तंत्र, विद्या सब उसे सिखादी है !
राजाने आज्ञा दी और दीवान सवार हो अपने घरको चला
गया और वहां चित्रकारको बुला सब अवस्था वहांकी कही
और कहा कि-मै इस तरहसे राजाको बचन देकर आयाहूं. तुम
स्त्रीका भेष बनाकर मेरे संग चलो. तंग उसने कबूल किया.
और स्त्रीका भेष बन साथ हो लिया. दोनों सवार होकर राजाके
पाय आये लोग महलमें उसे परदा करके लेगये. दरमि-
यान एक कनात खैंचला. और उस तरफ कनातके उसे बैठाया.
राजा और लडका और दीवान ये तीनें कनातके बाहर बैठे
और उसने कनातके अंदरसे कहा कि-कुवरको स्नान करावा
कपडे बदलवा चौका दिलवा एक पठढा बिछवाकर बिठाओ
और कुँवरको कहो कि, तुम सावधान होकर बैठो और जोन मै
मंत्र कहूं सो तू कान देकर सुन. बिभीषण बडा शूर बीर था
और दगा करके रामचंद्ररे जा मिला. उन्होंने रावणका राज
सब खराब किया, और अपने कुलका नाश किया. उस लाजसे
एक वर्षतक सिर न उठाया. और अपने कियेका फल पाया.
( १०० ) सिंहासनबत्तीसी.
कि सब कुल गँवाया. और भस्मासुने महादेवजी तपस्या कर
बर पाया और उन्हींसेही विश्वासघात किया कि, पार्वतीजीको
लेनेकी इच्छा की और उसकाभी फल उसने तुर्त पाया कि,
क्षणभरमे आपही जलमे भस्म होगया. और कुँवर ? तु मित्र
द्रोही और विश्वासघाती क्यों हुआ है ? सोएहुए रीछको तूने
नीचे ढकेल दिया ! उसने तो तेरेपर उपकार किया था और
तूने उसका बुरा बिचारा. पर उसमें तेरा दोष कुछ नहीं है,
तेरे पिताका दोष है; इसवास्ते कि, जैसा बीज होवेगा वैसाही
फल होवेगा. यह तुमने अपने पिताके पापसे दुःख पाया.
इतनी बात सुनतेही कुँवर सचेत हो बोल उठा. तब राजा
बोला-अय सुंदरी ! तू सच कह कि तूने वह बनका जानावर
क्योंकर पहॅचाना ? यह उसे सुनकर उसने जवाब दिया कि-
राजा! मैं अपनी पूर्व अवस्था तेरे आगे प्रकट करतीहु सो
चित्त लगाय सुनो जब मै अपने गुरूके पास पढ़ने जातीथी
तब गुरूका अति सेवा करतीथी. गुरूने प्रसन्न होकर एक
मंत्र मुझे बताया. वह मंत्र मैने साधा, तबसे सरस्वती मेरे
मनमें बसी है. और जैसे मैने रानीकी जांघका तिल पहँचाना
वैसेही बनके रिंछकोभी जाना. यह सुनतेही राजा प्रसन्न हो
पदरा दरमियानसे दूरकर दिया और कहा कि-तू सच्चा शारद-
पुत्र है, तेरे गुणको मैने अब जाना. यह कह राजाने आधा
राज उसे दिया और अपना मंत्री किया. इतनी बात कह