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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते

Page 90Permalink

( ८८ ) सिंहासनबत्तीसी.

यह कहकर मुर्दा लेकर दोनों किनारेपर आये. राजाको तमाम
किस्सा सुनाकर कहा कि-महाराज ! तुम धर्मात्मा हो इसवास्ते
धर्म विचारके हमारा न्याय करो. योगी बोला-महाराज ! मैं
कहताहूं सो आप ध्यान लगाकर सुनिये इस बैतालने बहुत
मुर्दे खाये और यह मुर्दा मैंने अपने दांवपर पाया है और
यह नाहक मुझसे तक रार करता है ! और कहता है कि-मैं तुझे
न दूंगा. मैं इससे बिनती करके माँगता हूं और कहता हूं कि-
गोया यह प्रसाद मैंने तुझसे पाया. यह नहीं मानता. तब
राजाने बैतालको पूंछा कि- तू अपने भी मुझसे बात
कह ? बह बोला-महाराज ! यह योगी बडा मूर्ख है, जो इसने मुझसे
राहमें झगडा लगाया. मैं हजार कोशसे इस मुदको ले आयाहूं
और यह मुझसे मांग रहा है. मैं इसे क्यों कर दूंगा ? इस मुर्देके
लिये मैंने बहुत कष्ट किया. यह नाहक देखके मन चलाता है.
मैं क्या कहूं कि, जो जो मैंने इसके वास्ते दुःख उठाया है और
आहारके समयमें इस दुष्टने आन सताया. और इसका न्याय
तेरे हाथ है; क्योंकि तू धर्मात्मा राजा है. जो तू कहेगा सो मुझे
प्रमाण है. तब राजा कहने लगा कि-तुम दोनोंही बड़े हो इस
वास्ते यह प्रसाद हमें दो कुछ तुमसे हम मांगते हैं. तब तुम्हारा
न्याय हम चुकावेंगे. यह सुन योगीने हँसकर झोलीमेंसे एक
गट्ठा निकाल राजाके हाथ देकर कहा-राजा ! तुझे जिनता