सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे
( १९८ ) सिंहासनबत्तीसी.
गया अभी रात कुछ बाकी है बेहतर कि, फिर घर चलिये
और स्वामीके साथ जलिये. यह दिलमे ठानकर अपने घरमे
गई और खाविंदके पास जा कूक मार हाय हाय कर रोने
लगी और पुकारा कि, दौडो, मेरे खाविंदको चोर मारके भागे
जाते हैं और घरकी सब माया लिये जाते हैं. यह रोनेकी
आवाज सुन बाहरके सब लोग दौड आये और पूछने लगे कि
चोर किधर गये हैं ? उसने कहा अभी इसी रास्तेसे निकल
गये. लोग तो ढूँढने लगे और यह शिर पटक पटक रो रो
कहतीथी कि, मेरा सुहाग लूटकर मुझे अनाथ किये जाता है
सब लोग कुटुंबके समझाने लगे कि, यह तो भगवानकी माया
हे इसमें किसीका बश नहीं चलता. जब मौत आती है तब
कुछ बहाना लिये आती है इसके दिन पूरे हो चुके और कौन
किसीको यो मार सकता है और कोन किसीको जिला सकता
है. तू अपने जीमे ढाढस बांध और इसकी गतिकर. तब यह
बोली मैं भी इसके साथ सती हूंगी. क्योंकि मेरा जगत्मे इस
बख्त कोई नहीं कि, मेरा सहाय करे. लोगोने बहुतेरा सम-
झाया, पर उसने न माना और खाविंदको ले नदीके किनारे
गई और चिता बना उसको लेकर आपही जलनेको बैठी. उस
बख्त तमाम नगरके लोग देखने आये. उसी बख्त राजाभी
वहां आकर खडा हुआ और उसने खातिर जमासे आग अपने
हाथसे चितामे लगाई और सम्भल बैठी जब कपडे और बाल
उसके जलकर बदनमे आंच लगी तब घबराकर उठी और
सब लोग देखकर हँसे. वह चितामेसे कूद नदीमे जा पडी. तब
राजासे चुप न रहा गया. और कहा कि अय सुन्दरी ! यह
क्या है? वह बोली सुनो राजा ! इसका मर्म जाकर अपने घरमें
पूछो और मै जो अपने कर्ममें लिखा लायीथी उसीका फल
पाया. पर तूने अपने घरका भेद न पाया. हम सात सखियां
इस नगरमें हैं उनमेकी एक मैं हूं और छः तेरे घरमे हैं ! यह
कह वह तो पानी डूबगई. राजा अपने मनमे दुःख पा
महलमें आया और छिप रहा. किसीको दिखाई न दिया. एक
दिन और एक रात वहां लगा रहा. दूसरी रात जब हुई तब
आधी रातके समय छहो रानियां हाथोंमें कंचनके थाल मिठाई
पकवानसे भरभर लेकर महलके पिछवाडीकी वाडीमें गई. उसके
आगे एक बन था. उस बनमे एक मठी थी. उसमें एक योगी
ध्यान लगाये बैठा था. ये छहो रानिया दंडवते कर वहीं जा
बैठीं. वहा राजाभी जो उसके पीछे पीछे आया था. यह अह-
वाल देखने लगा. जब सिद्ध अपने ध्यानसे निश्चित हुआ, और
उनसे हँस हँस बातें करने लगा. और जिसकदर ये मिठाई
पकान लेगईथी सो सब आगे रख दिया. उसने भोजन किया
और पान खाकर एक योगविद्याकी एक देहकी छे देह
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भयी और उन छहों रानियोंसे भोग किया. फिर वे छहों रानियों
बिदा हो अपने मंदिरको चली आईं. राजा यह चरित्र देख
अपने मनमें विचार करने लगा कि, इस सिद्धने क्या किया
कि अपना योग भ्रष्ट किया और उनका धर्म खोया. यह विचार
कर राजा सिद्धके सोहीं जाकर खड़ा रहा. सिद्ध मनमें कुछ
शंका लिये बोला कि, हे नृपती ! कहांसे आये हो अपने
मनका मुझसे भाव कहो. तब राजाने कहा मुझे आपके दर्शनकी
इच्छा थी. इस लिये मै यहां आया हूं. तब वह योगी बोला
कि राजा ! तू मुझसे जो कामना मांगे सो तेरी पूरी करूं फिर
राजाने कहा कि स्वामी ! एक देहकी छः दह किस तरहसे बनें
वह विद्या मै आपके पास मांगता हूं मुझे बताओ नहीं तो मैं तुझे
जानसे मार डालता हूं, इसका विचार कर, जबाब दो. इतनी बात
कह पुतली कहने लगी कि, सुन राजा भोज जब विक्रमने सिद्धसे
ये बातें कहीं तब उसने डरके वह विद्या दी. और राजाने वहां
परीक्षा करली. तिस पीछे योगीको तलवार मार उसके टुकडे टुकडे
कर डाल दिया. फिर वहांसे निकल महलमे आया और जहां छहों-
रानियां बैठीं थीं वहां आनकर राजाभी बैठ गया. तब राजाको
देखकर छहों उठकर खिदमतमे हाजिर हुई. किसीने पंखा हि-
लाया, किसीने हाथ मुंह धुलाया, किसीने पान बना खिलाया
इसी तरह सब अपनी २ बीती राजासे प्रकाश करने लगी. और