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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ )

Page 165Permalink

छब्बीसवीं पुतली २६. ( १६५ )
सो सब क्षणभरमें बेटीको दे ब्याह दिया. यह सुन राजाने और
कई लाखैं रुपये उसके घर भेज दिये. और अपने चित्तमें बहुत
प्रसन्न हुआ कि, धन्य भाग्य मेरा है जो मेरे राजमे ऐसे हिम्मत-
वाले लोग हैं. इतनी बात कह पुतली बोली कि सुन राजा भोज !
इतना.धन देकरभी राजाने उसका खर्च सुन और दौलत भेज दी
ऐसा दानी तू हो तो इस सिंहासनपर बैठ और नहीं तो मनके
लड्डू खानेसे कुछ हाँसिल नहीं है. यह सुनकर राज अपने महलमें
आया. फिर सुबह हुआ तो स्नान पूजा कर वहीं आन पहुंचा
इतनेमें विद्यावती नाम—
छब्बीसवीं पुतली—
कहने लगी कि, सुन राजा भोज ! मैं तेरे आगे ज्ञानकी बात
कहती हूं और तू मन देकर कान रख जब आदमी जन्मता है
तो कुछ नहीं संग लाता और मरता है तो कुछ नहीं लेजाता. इस
जीवितका फल यही है कि, संसारमें आकर कुछ करनी करे, और
जैसी करनी करेगा वैसाही फल पावेगा. और संसारमें जीवन
थोडा है इससे ऐसा यश करो कि, जानेपरभी जगमें नाम ठहरा
रहे. दोनों लोकोंमें सुख पावे. यह मनुष्यजन्म बारंबार नहीं पाता
देह पाता है. और लक्ष्मी दान कर कुछ सोच मत कर. यही अपने