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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

आठवीं पुतली ८. ( ६१ )

निकला जाताथा और पारेकी तरह जगहपर ठहरता न याथे.
छलावेकी मानिंद छलवल कर रहाथा. राजा खुशीके मारे बढ़-
ईकी बात भूल गया. और घडेको कौडा दिया. चाबुक लगा
तेही वो आग बबूला होकर ऐसा उडा कि समुद्रपार लेगया.
और एक जंगलमे दरख्तके ऊपरसे गिरा आप रानोंसे निकल
गया. राजाभी दरख्तपरसे लडखडाता हुआ नीचे गिर पडा और
यह हालत हुई कि मृतकसा हो गया. जब कितनी देर गयी.
तब कुछ उसे होश आया, तब अपने दिलमें कहने लगा कि-
देश, नगर, राजपट, रैयत और अपने पराये सबके सब छूटे
किस्मत, यहां मुझे लेआई देखिये आगे क्या होय ! यह मनमें
बिचार कर धीरज बाध उठकर वहांसे आगे चला, ऐसे महाब-
नमें जा पडा कि निकलना फिर मुश्कील हुआ, पर ज्यों त्यों
उस जंगलसे भूला भटका दश दिनम सातकोस राह चलकर
फिर ऐसे एक बनमे जा पहुँचा कि, उसमें ऐसा अँधियारा था
कि, हाथको हाथ न सूझताथा और चारो तरफ, झेग, गैंडे चिते
बल्कि सब परिंदे बोल रहेथे. उनकी डरावनी आवाजें सुनकर
राजा सहमा जाता था. कभी पूर्व, कभी पश्चिम, कभी
दक्षिण, कभी उत्तर, भटका भटका फिरता था पर कहीं राह
न मिलतीथी. इस तरह दुःख भोगता हुआ पंद्रह दिनके बाद
एक तरफ जा निकला. वहां एक तमाशा नजर आया कि, एक.
मकान है और उसके बाहर बडा दरख्त और दो बड़े

( ५८ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए थे, उस दरख्तपर एक बंदरिया बैठी थी. कभी नीचे उत-
रती है, और कभी ऊपर चढ़ती है. राजा यह कौतुक छिपाहुवा
देखता रहा ! इतनेमें निगाह राजकी ऊपर गई तो क्या देखता है
कि उस हवेलीपर एक बालाखाना है. जब दरख्तपर चढगया
तो देखा कि, वहां एक पलंग बिछा है और सब ऐशका असबाब
धरा है. तब मनमें कहा-अभी जाहीर होना अच्छा नहीं. पहिले
यह मालूम करूं कि, कौन यहां आता है और कौन जाता है.
जब ठीक दो पहर दिन हुआ तब एक सिद्ध वहां आया और
बाईंतरफ जो कुआ था उसमेंसे उसने एक तूंबा जल निकाला
जब वह बंदरिया निकल आई तब सिद्धने एक चुल्लू पानी
उसपर डाल दिया तो वह खूबसूरत स्त्री होगई और उस
रूपवती स्त्रीसे योगीने भोग किया. जब तीसरा पहर हुआ
तब योगीने दूसरे कुआसे पानी खींच उसपर छींटा मारा फिर वह
वैसीकी बंदरी बनगई. और दरख्तपर चढी और योगीभी
पहाड़की गुफामें जाकर बैठा और अपना योग करने लगा.
इतनेमें राजाने प्रकट हो चतुराई कर बाँए कुवेसे जल निकाल
उस बंदरीपर छींटा मारा फिर वह ऐसी सुंदरी नारी हुई कि
गोया इंद्रके अखाडेका अप्सरा है. और राजाको देख लाजसे
मुँह फेर लिया. कामके बाण राजाके आन लगे प्रेमकर उसको
अपने पास बिठाया. जब उसने आँखें प्यारकी देखी तब हंस