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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

by पारम्परिक / लल्लू जी लाल

Source: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (origin)

DevanagariHindipublished190 pages

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अठारहवीं पुतली १८. (११९)
अठारहवीं पुतली-
पुतली उठी और हांहांकर कहने लगी कि-राजा ! मुझपर
दया कर और पहले मेरी बात सुन, तिस पीछे जो इच्छामें
आवे सो कर. तब राजा बोला कि-तू कह ! जो तेरे चित्तमें है
तब वह पुतली कहने लगी कि सुन राजा भोज ! एकदिन
दो संन्यासी आपसमें योगकी रीतिसे झगडतेथे. न वह उससे
जीत सकताथा न यह इससे. आखिर इस तरह झगडते झग-
डते वीरविक्रमादित्यके पास आये. और कहा कि-महाराज !
हम दोनों विवादी हैं इसका आप न्याय चुकवो, आप धर्मात्मा
राजा हैं यह समझकर हम आये हैं राजाने कहा-मुझसे सम-
झाकर तुम जाहिर करो कि, किस बातपर झगडा है? तब उन-
मेंसे एक यती बोला कि-महाराज ! मैं कहताहूं कि मनके
बशमें ज्ञान है और मनके बशमेंही आत्मा है और मनके बश
महा देव है और माया, मोह, पाप, पुण्य येभी सब मनसे हैं.
और जितनी बातें हैं वह सब मनकेही तावेमें हैं और मनकी
इच्छाहीसे सब कुछ होता है. मन जो सो तमाम शरीरका
राजा है. और जितने अंग हैं सो मनके अधीन हैं. मन उनसे
जो काम लेता है सो ही वे करते हैं. एक दोनोंमेंसे यह जब
कहचुका तब दुसरा बोला-सुनो राजा ! निश्चय करके जो मैं
कहूं. ज्ञान जो है यही राजा है देहका. और मन जो है सो