सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )
चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )
लगाती है इस तरहसे अनेक रीतिसे चेष्टा कर रही है और वह भी
इसी तरह इशारे कर रहा है. उन दोनोंकी हालत देख राजाने
अपने जीमें विचारा कि इतना तमाशा देखा चाहिये कि, ये
क्या करते है. राजाने स्नान ध्यान अपनाभी सब किया. पर
उनकी ओरभी देखता रहा. इतनेमें वह स्त्री स्नान कर चद्दर
ओढ घूँघट कर अपने घरकू चली और साहुकार बच्चाभी
उसके पीछे चला. राजाने एक हलकारा उन दोनोंके पीछे
लगाया और उस हलकारेको कह दिया कि इन दोनोंका मकान
देख सबसे वाकिफ हो और हमे जल्दी खबर दे. जब वह
औरत अपने घरमें गई तब उसने फिरकर देखा और शिर
खोलकर दिखाया. फिर छातीपर हाथ धर अपने मंदिरमें गई
और सेठके बेटेनेभी अपनी छातीपर हाथ रख लिया. यह खबर
हलकारेने आ राजाको दी तब राजाभी अपनी सभामें आकर
बैठा और एक पंडितसे पूँछा कि कोई स्त्रीचरित्र हमें सुनाओ
कि हमारा जी सुनना चाहता है. तब पंडितने उत्तर दिया कि
महाराज ! मेरा तो क्या सामर्थ्य है जो मैं स्त्रियोंका चरित्र और
पुरुषका भाग कहूँ. ब्रह्माभी नहीं जानता, आदमीकी तो क्या
कुदरत है ! और यह देखतेही बन आवै जबानसे कहा नहीं
जाता. यह बात पंडितसे सुन राजा चुप हो रहा. और अपने
जीमें कहा यह चरित देखा चाहिये. इतनेमें शाम होगई राजा
उठ महालमें गया और कुछ खा तुरंत बाहर निकल आया और
(११६) सिंहासनबचीसी.
उस हलकारैको बुलाकर कहा कि तू, इस बातका ब्यौरा कुछ
समझ गया है क्या ? तब उसने जबाब दिया कि महाराज
कुछ मेरे जीमें आया है पर आपके आगे मुझे कहते शंका होती
है. तब राजाने कहा कि तू जो समझा है सो निडर होकर
बयान कर. वह बोला महाराज ! उसने जो शिर खोलकर छाती-
पर हाथ रखखा शो उसने कहा कि जिस वक्त अँधेरी रात होगी
तब मैं तुझसे मिलूंगा और उसनेभी छातीपर हाथ रख जबाब
दिया कि, अच्छा दासकी समझमें यह कुछ आता है
राजा कहा तू तो सब समझा है यही उनका मतलब है. मैंनेभी
बडी देरतक घाटपर बैठे उनका मुद्धा मालूम कियाथा. पर तू अब
मेरे तईं उसके घर लेचल. हलकारेने कहा अच्छा मैं हाजिर हूं
महाराज ! चलिये. तब राजा हलकारेको ले उसके मकानके पास
आया और उसको बिदा किया पिछवाडे चौबारेके एक खिडकी
थी उसमेंसे चिरागकी ज्योति नजर आतीथी और कभी २ जो
झाँकती थी तो उसकी झलकभी मालूम होतीथी जब जब दो प्रहर
रात गुजरी और खूब अंधेरी होगया तब राजाने उधरसे एक कंकरी
उस खिडकीमें मारी लगतेही वह झाँकि राजाको देख यह जाना कि
वही पुरुष यहां आन पहुंचा. तब उसने तमाम घरका जवाहिर
और सब गहना एक डब्बेमें भरा और साथ लेकर निकल राजा
के पास आई कहा कि, यह ले और मुझे लेकर चल. राजाने
कहा यों तो मैं तुझे न ले जाऊंगा क्योंकि तेरा खाविंद जाती