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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

उन्तीसवीं पुतली-

( १७८ ) सिंहासनबत्तीसी.

उन्तीसवीं पुतली-

कहने लगी-कि, हे राजा भोज ! तू किस बातपर
भूला है ? सब सखियोंने तुझे राजा विक्रमकी कथा
सुनाई तब भी तू पत्थर न पसीजा. अभी पहले
मुझसे बात सुनले और पीछेसे सिंहासनपर
पाँव दे. राजाने कहा कि-अच्छा कह, मैं सुनूंगा पुतली बोली-
एक दिन राजा बीरविक्रमादित्य रातको अपने मंदिरमे सोताथा
कि, एक ख्वान देखा. वह मैं तेरे आगे कहती हूं क्या देखता
है कि, एक सोनेका महल है, और उसमें अनेक अनेक प्रका-
रके रत्न जड़े हैं और तरह तरहके पाक पकवान और सुगन्धे
भरीहुई हैं और एक तरफ एक अच्छी फूलोकी सेज बिछी हुई
हैं. एक तरफ फूलोंके गहने चंगेरोंमें भरेहुए हैं, अतरदान, पान
दान, गुलाबपाश भरे धरे हैं ओर मकानकी चारों ओर फूलवारी
खिली हुई है. बाहर उस मकानकी भीतोंपर रंग रंगके चित्र
बने हुए, कि जिनके देखनेसे तुर्त आदमी मोहित हो और उस
मंदिरके भीतर खूबसूरत स्त्रियां अच्छे साज मिलाये मीठे मीठे
राग सुनता है. यह देख राजाने अपने जीमें कहा कि, यह
तपस्वी इन नारीयोंके योग्य नहीं है, इतनेमें आंख खुल गइ
और सुबह हुआ; तब राजा स्नान ध्यान कर बीरोंको बुलाकर