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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ )

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पचीसवीं पुतली २५. ( १६३ )
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डेका किसीसे उसने फायदा न पाया था. जब अपने
घरमें आया तो देखा कि बेटी जवान व्याहनेके लायक हुई है. यह अपने
जीमें चिंताही करताथा कि, उसकी भाटिन बोल उठी कि, तमाम देश
तुम फिर आये पर जो कमाई कर लाये सो कहो. तब उसने जवाब
दिया कि, मेरे प्रारब्धमें धन नहीं. मैं इस लिये कि. तमाम
राजाओंके पास गया. और शिष्टाचार उन्होंने सब किया;
पर एक दाम न हाथ आया. अब मेरे जीमें एक बात आती है.
राजा बीरविक्रमादित्य बाकी रहगया है उसके पासभी जाकर
माँगूं जो मेरे जीका संदेह मिटे. फिर वह भाटिन बोली-अब
तुम कहीं मत जाओ और संतोषकर रहो. कर्मका लिखा फल
यहीं बैठे पाओगे. फिर भाटने कहा कि, राजा वीरविक्रमादित्य
सुनते है कि बड़ा दानी है, उसके पास अपनी कामनों जो ले
गया है वह खाली हाथ नहीं फिरा और अपने मकसदको
पहुँचा है. ये बाते कर वह राजाके पास चला और गणेशजीको
मनाय राजाके सन्मुख जा खडा रहा. तब राजाने दंडवत् की
और वह आशीष देकर बोला कि-हे राजा ! बहुत भूमि पै
फिर आया हूं और आपका यश मुझे यहां ले आया है. आप
इस मर्त्यलोकमें इंद्रका अवतार हो. आपकी बराबर दानी इस
संसारमें कोई नहीं. इस समयमें आप दान देनेमें राजा हरिश्चंद्र
हो और तमाम पृथ्वीमें आपकाही यश छाय रहा है. और स्वामी
मैं कालिकासुत हूं. भाटवंशमें आनकर अवतार लिया है और

यहाँ पृष्ठ पर दिए गए पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:

( १६४ ) सिंहासनबत्तीसी.
अब तुम्हें याचने आयाहूं, मेरा मनोरथ पूर्ण करदो. मैंने
संसारमें फिरकर खूब देखा कि, सिवाय तुम्हारे मेरी आशाका
पुजानेवाला और और कोई नहीं. तब हँसकर राजाने कहा कि, तू
अपना मतलब सब मेरे आगे प्रकाश करके कह तो मैं तेरी
कामना पूरी करूं. भाटने कहा-यों मुझे अपने कर्मका भरोसा
नहीं आप बचन दीजिये तो मैं खातिरजमासे कहूं. तब राजाने
बचन दिया. भाट बोला-महाराज ! मुझे मुंहमांगा दान दीजिये,
मेरी पुत्रीकी शादी करदो बारह बरसकी कन्या मेरे घरमें बैठी
है, इस लिये मैं आपके पारा याचने आया हूं, यह सुन राजाने
हँसकर मंत्रीसे कहा कि, जो यह मांगे वह इसे दो. फिर भाटने
कहा-महाराज ! जो कुछ आपको देना है सो अपने सम्मुख मँगा-
कर दीजिये मुझे इस संसारमें अब किसीका इतबार नही. राजाने
दश लाख रुपये रोक और हीरे, लाल, मोती, सोने, रूपेके गहने था
ल भरकर दिये. और वह ले आशीश दे अपने घरमें गया. जो कुछ
लाया था सो सब ब्याहमें लगाया और राजाने उसके पीछे
जासूद कर दिये थे कि तुम देखो कि, 'यह धनको लेजाकर क्या
करता है,' ? इसकी खबर ठीक मुझे लाकर दो. जब शादी कर
चुका और उसके पास एक दिनेके खानेको कुछ न रहा तब
उन हलकारोंने जाकर राजाको खबर दी कि, महाराज ! उस
भाटने ऐसा ब्याह बेटीका किया कि इस कलियुगमें कोई और
करसकता नहीं. जो कुछ वो आपके पाससे धन दौलत लेगया