सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
वाल कहकर वह किस्सा राहका जो सुनाथा सब बयान
सिंहासनबत्तीसी.
सुघर था जो बात सो बकता है. चौथेने कहा--फिर समझा जायगा
कंगाल जैसे ने. आपको देर होगी आपसमें यह बातें कहकर
उसकी रथ रंग और पहले मुजरा किया, और जहां भेजाथा
उसका अहवाल अर्ज किया. राजाने सुनकर पूंछा कि, हमारे
राज्यमें सब लोग खुश रहते हैं? और अपने अपने घरमें बैठकर
हमारे हकमें क्या कहते हैं? तब उन्होंने हरएकका अह-
वाल कहकर वह किस्सा राहका जो सुनाथा सब बयान
किया, और कहा कि, अजब असर उस मचानका है कि, जब
वह उस मचानपर चढ़कर बैठता है तब एक रऊनत उसपर
चढ़जाती है और जब वह वहांसे नीचे उतरता है तब नशा उतर
जाता है, फिर अपनी हालत अस्लीमें आता है. तब राजाने कहा
तुम मुझे वहां ले चलो, और उसे दिखाओ, कि वह जगह
कौनसी है? ऐसा कह राजा खुशी खुशीसे उठ हरकारोंको साथ
लेकर उस मुकामपर गया, वहां छिपकर चुपके वहीं बैठ रहा.
इतनेमें क्या सुनता है कि, वह मचानपर पांव रखतेही कहने
लगा कि, लोग जल्दी जावें और राजा भोजको गढ़से पकड़-
लावें. उसे जल्दी मार मेरा राज ले लें. इसमें यश और धर्म
दोनों उन्हें होंगे. सुनतेही राजाको कोप हुआ और हरकारोंको
साथ लेकर घरको फिर आया. रातको फिक्रके मारे नींद न
आई. सात पांच करके ज्यों त्यों वह रात गँवाई. सबेरा होतेही
सिंहासनबत्तीसी. (७)
स्नान करके दरबार किया. पंडितोंको और नजूमियोंको बुलाया
और रातका सब अफसान जबानपर लाया. नजूमियोंने बड़ी-
साय और वह दिन विचारके कहा राजा ! हमारे विचारमें कुछ
यहां लक्ष्मीका लक्षण नजर आता है. और पंडितोंने कहा-इस
मकानमें बहुत दौलत है सुनतेही राजाने तमाम शहरोंके बेल-
दारोंको हुक्म किया कि, लाख बेलदार वहां जावो और इस
मकानकी तमाम जमीन खोदो. वे बमूजिब हुक्मके रवाना हुऐ.
साथ उनके सब अपने मुसाहिबोंको भेजा और आपभी सवार
होकर वहां आया. बेलदारने जब चारों ओरसे खोदा और
वहाँकी मट्टी दूर की तो एक पाया नजर आया. तब राजाने
फरमाया अब खबरदारीसे खोदो टूट न जाय. जब खोदते २
चारों पाए सिंहासनके नजर आये तब राजाने कहा-अब इसे
बाहर निकालो. लाख मजदूर उठातेथे. और जोर करतेथे पर
जराभी वह जगहसे नहीं हिलताथा. तब उनमेसे एक पंडितने
अर्ज की कि, महाराज ' यह सिंहासन देवताओंका या दानवोंका
बनाया हुआ हे. इस जगहसे नहीं हिलेगा और न उठेगा. बलि
लेगा. इसको बलि दीजिये. तब राजाने करोड़ भैंसे और बकरे
वहीं बलि दिये चारों तरफ बाजे बजने लगे. और जयजयकार
होने लगा. तब बलि लेकर हाथ लगातेही वह सिंहासन ऊपरको
उठ आया. झाड बुहारकर एक जमीन पाकीजःपर रखदिया-
( ८ ) सिंहासनबत्तीसी.
तब राजा सिंहासन देखकर बहुत खुश हुआ, और जब उसकी
मट्टी छुड़ाकर गर्द वा गुब्बार दूरकर धोया और पोंछा तब ऐसा
चमकने लगा कि, आंख किसीकी उसपर न ठहरतीथी. जिसने
उस जडाऊ सिंहासनको देखा उसे खुदाकी कुदरतका तमाशा नजर
आया. कारीगरोने ऐसा बनायाथा कि, किसीने न देखा न सुना.
और आठ पुतलियां चारों तर्फ बनी हुईथी और एक एक
फूल कमलका हर एकके हाथमें दियाथा. अगर सुरभामिनी
उसे देखें तो भौचक होजावें. राजाने तमाम कारीगरोंको बुला-
कर फ़रमाया कि, जितने रुपये खर्च हों सो खजानेसे लेलो, और
जहांजहांका जबाहिर जाता रहा है, वहां नया जडकर जल्दी
तय्यार करो. यह कहकर राजा महलमें दाखिल हुआ. सिंहासन
बनने लगा, पांच महीनेमें सब तय्यार हुआ. और पुतलियां
ऐसी बनकर खड़ी हुईं गोया अभी बोलती हैं और चालती हैं
गरज शिरसे पांव तक खबियोंमें भरी हुई आंखें हिरनकीसी कमर
चितेकीसी पांवका यह अंदाज जैसी हंसकी चाल. जिन्होने
सूरत उनकी देखी अपनी आखोंकी पुतलियोंमें जगह दी. उसे
देखकर पंडित राजासे सिंहासनकी हकीकत कहने लगे- हे राजा !
सुनो मरना जीना ये इख्तियार सब भगवानके है, पर मनुष्यको
चाहिये कि जीते जी सब जीनेका सुख करले. यह बात राजा
सुनकर बहुत खुश हुआ और कहने लगा कि, शायद पुत-
लियां भगवानने अपने हाथसे बनाई हैं ? या इन्द्रके यहांकी
अप्सरा हैं ? यह कहकर पंडितोंको हुक्म किया कि, नीकी सायत,
अच्छी लगन विचारो जो मैं उस सायत सिंहासनपर जाकर बैठूं।
यह बात सुनतेही पंडितोंने बिचार करके कार्तिक महीनेमें एक
दिन शुभ लगन ठहराई. सब भांति वह भली थी. कहा कि, उस
सायत तुम उस सिंहासनपर बैठो; तब राजाने बैठनेकी बिरियां
जितने राजा उसके राज्यमें थे और पंडित, करामाती दूर और
नजदीक थे उन्हें न्योता भेजकर बुलाया और आप स्नान करके
अच्छे कपडे पहने. पंडित वेद पढ़ने लगे और गंधर्व गीत गाने
लगे. भाट यश बयान करने लगे और तरह तरहके बाजे बजने
लगे. हरएक महलमें शादियां नाच, राग रंग मचे. जितने लोग
आये उन सबकी जियाफत की. ब्राह्मणोंको वृत्ति गांव दिये.
भूखोंको खाना और मुंहमांगे रुप्ये बगरे. नंगोको कपड़ा और
माल असबाब इनायत किया. रैयतको बखसीस और इनाम
दिया. तमाम शहरमें खैर खैरात बांटी. फौजको खिलत
और इजाफे कर दिये. हमनशीनोंपर तरह तरहकी मिहरबा-
नियां नवाजिशें फरमाई, गरज जितनेलोग उस सभामें इकट्ठे
हुएथे सो सब जयजयकार करतेथे और रामका नाम लेतेथे-
बीचमें सिंहासन धरा था. राजा खुशी २ श्रीगणेशको मनाता हुआ
सिंहासनके पास जाकर खड़ाहूआ और दाहिना पांव बढ़ाकर
( १० ) सिंहासनबत्तीसी.
उसने चाहा कि उसपर रक्खें, इतनेमें ये पुतलियां खिलाखिला-
कर हँसीं ओर सबने यह देखा. राजा अपने मनमें जरा रुककर
'वेनिहायत शरमिंदा हो कुछ दहशत खाई. कुछ उसे अचंभा हुआ
कि ये बेजान पुतलियां जानदार क्योंकर हुईं ? गश खाकर
गजबमे आकर पाव उधरसे खैंचलिया, और पुतलियोंसे कहने
लगा कि, तुमने क्या देखी ? ओर क्यों हँसी ? ये सब बात
मुझसे बयान करो. क्या मैं बली गजाका बेटा यशस्वी नहीं ?
या क्षत्रियोंमें कायर हूं ? या नामर्द हूं ? या बेरहम हूं ? या ओर
राजा मेरे हुकममें नहीं ? या मैं पंडित नहीं ? या मेरे यहां
पद्मिनी नारी नहीं ? या मैं राजनीति नहीं जानता ? या मैं
किसीकी मजलिसमे नींच होकर बैठा ? फिर किस बातमें मैं
नालायक हूं ? मेरे दिलमें शंक पडा है सो मुझे तुम बताओ ! ये
बात राजाके मुखसे सुनकर उनमेंसे रत्नमंजरी नामक--
पहली पुतली
बोली:--हे राजा, दिल लगाकर मेरी बात सुनो और
यह किस्सा मैं तुमसे बयान करता हूं. तुम गुणग्राहक और
कदरदान हो ! जो तुमने बातें कहीं सो सब दुरुस्त है
सूर्यसेभी तुम्हारे तेजके आगकी ज्वाला अधिक है पर उतना
गर्व मत करो. पुरानी कथा सुनो इससंसारका अंत नहीं. भगवान्ने
सिंहासनबत्तीसी. ( ११ )
इसमें किस्म किस्म और रंग रंगके जवाहर पैदा किये हैं. एक एक
कदमपर दौलतका गंज है. और एक एफ कोसपर आबहयातका चश्म
है, पर तुम कमवक्त हो इससे नहीं पहचाना अपने दिलमें क्या
समझेहो ? तुम जैसे इस दुनियामें करोड़ों पड़े हैं तुमने इतनेहीमें मग-
रूर होकर अपने ताईं भुला दिये. ओर यह जिसका सिंहासन है
उस राजाके यहां तुमसा एक एक अदना नौकर था. यह सुनकर
राजाको गुस्सा आया. और कहने लगा कि-इस सिंहासनको
अभी मैं तोड़े डालताहूं. इतनेमें वररुचि पुरोहित बोला, राजा ! यह
इनसाफसे दूर है, इसवास्ते पुतलीकी बात कान देकर सुन लो. और
जो कछु करना हो सो फिर कल्लो. राजाने कहा तू इसका अहवाल
कह. तब पुतली बोली-मैं क्या कहूं १ राजा । इतनाही सुन, तुम
जलकर खाक होयगे और जब तमाम हकीकत उस राजाकी
सुनोगे तब औरभी शरमिंदा होंगे. और अपने दिनोंको रोवो
गे. लोगोंके आगेभी हल्के होओगे इसके कहवानेसे न कहना
ना भला है हम तो उसी रोज मरचुकी थीं और सिंहासन फूट
चुका था जिस रोजसे राजा विक्रमादित्यसे बिछुडीं. अब हम क्या
डर है ? इतनेमें दिवान राजाका पुतलीसे कहने लगा-किसलिये
तू अपने राजाको बयान नहीं करती ? गुस्सा छोडदे और अब
बात कर. क्या वह भेद छिपा रखती है ? तब पुतली बोली
कि-एक शकबंधी राजा बड़ा बली था. और नगर अंबावतीमें राज