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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

About this granth

Rasaratnasamuchchaya (रसरत्नसमुच्चय) is a major text of rasashastra, the branch of Ayurveda that purifies mercury, sulphur, mica, metals and gems and turns them into medicines. It is ascribed to Vagbhatacharya, usually called Rasa-Vagbhata to distinguish him from the author of the Ashtanga Hridaya.

The opening part describes the pharmacy, apparatus, crucibles, heating methods and technical terms, followed by the purification and incineration of the major and minor minerals, metals and gems. Later chapters give mineral formulations for treating particular diseases.

This edition was published in 1939 by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Benares, as No. 91 of the Haridas Sanskrit Series. It carries the Suratnojjvala Hindi commentary of Pandit Ambikadatta Shastri, Ayurvedacharya of Banaras Hindu University, with notes, introduction, indices and appendices. Each verse is followed by a plain Hindi explanation, and the book long served students and practising vaidyas. The opening leaves of this copy also carry a few remedies handwritten in Nepali by an earlier owner.

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प्रथमोऽध्यायः ।
५

प्रतीत नहीं होता । और जिस हिमालय की कस्तूरी मृग के नाभिगत कस्तूरी से सुगन्धित कन्दराओं के गृहों में बैठी हुई किन्नरों की स्त्रियां श्रीपार्वती के शुभ विवाहोत्सव के मङ्गल गीत गाती रहतीं हैं ऐसे शुभ कैलास पर्वत पर संसार के प्रथम आराध्य भगवान् महादेव इस रूप से संसार की रक्षा के लिये विराजमान हैं जिन से ही महान् पारद रस की उत्पत्ति हुई है ॥ १६—२१ ॥

अथ रसोत्कर्षवर्णनम्—

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभिः स्वर्णसहस्रदानात् ।
नृणां भवेत्सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात् ॥ २२ ॥
विधाय रसलिङ्गं यो भक्तियुक्तः समर्चयेत् ।
जगत्त्रितयलिङ्गानां पूजाफलमवाप्नुयात् ॥ २३ ॥
भक्षणं स्पर्शनं दानं ध्यानं च परिपूजनम् ।
पञ्चधा रसपूजोक्ता महापातकनाशिनी ॥ २४ ॥
हन्ति भक्षणमात्रेण पूर्वजन्माघसम्भवम् ।
रोगसङ्घमशेषाणां नराणां नात्र संशयः ॥ २५ ॥
पूर्वजन्मकृतं पापं सद्यो नश्यति देहिनाम् ।
सुगन्धपिष्टसूतेन यदि शम्भुर्विलोपितः ॥ २६ ॥
अभ्रकं त्रुटिमात्रं यो रसस्य परिजारयेत् ।
शतक्रतुफलं तस्य भवेदित्यब्रवीच्छिवः ॥ २७ ॥
यश्च निन्दति सूतेन्द्रं शम्भोस्तेजः परात्परम् ।
स पतेन्नरके घोरे यावत्कल्पविकल्पनम् ॥ २८ ॥

विधि सहित किए हुए सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों से अथवा करोड़ों गौओं के दानसे और हजारों मन सोने के दान करने से तथा काशी प्रयागादि पुण्य स्थानों में स्नान करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है वही फल केवल मनुष्य को पारद के दर्शन से लब्ध होता है । यदि कोई पारद का शिवलिङ्ग निर्माण कर भक्तिपूर्वक अर्चन करता है तो उसको तीनों लोकों में स्थित शिवलिङ्ग पूजन का फल प्राप्त होता है । औषध रूप से पारद का सेवन, तथा स्पर्शन, दान, ध्यान और पूजन करना यह पांच तरह की बड़े २ पापों का नाश करने वाली रसेन्द्र की पूजन शास्त्रों में कही गई है । इसको शास्त्रोक्तविधि सहित औषध रूप में सेवन करने से समस्त

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६
रसरत्नसमुच्चये—

मनुष्यों के पूर्व जन्म के पापों से उत्पन्न होने वाले रोग समूह जड़ से नष्ट हो जाते हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। पारे का गन्धक के साथ पेषण करके शिवलिंग पर चन्दन के समान लेपन करने से मनुष्यों के पूर्व देह कृत पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य अभ्रक तथा किञ्चिन्मात्र भी पारद का अच्छी तरह जारण करता है उसको शत अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है, ऐसा शिव जी ने कहा है।

जारणलक्षणं यथा—
सूते गन्धादिनिक्षेपात्तत्तद्विधिविशेषतः ।
गन्धाद्यं जीर्यते यत्तु जारणं कथ्यते बुधैः ॥

जो मनुष्य परमोत्कृष्ट महादेव के तेज स्वरूप पारद की निन्दा करता है वह कल्पान्त तक नरक में पड़ा रहता है ॥ २२—२८ ॥

अथ पारदस्य विशेषतो महत्ता—

रोगिभ्यो यो रसं दत्ते शुद्धिपाकसमन्वितम् ।
तुलादानाश्र्वमेधानां फलं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ २९ ॥
सिद्धे रसे करिष्यामि निर्दारिद्र्यगदं जगत् ।
रसध्यानामदं प्रोक्तं ब्रह्महत्यादिपापनुत् ॥ ३० ॥
अभ्रग्रासो हि सूतस्य नैवेद्यं परिकीर्तितम् ।
रसस्येत्यर्चनं कृत्वा प्राप्नुयात्क्रतुजं फलम् ॥ ३१ ॥
उदरे संस्थिते सूते यस्योत्क्रामति जीवितम् ।
स मुक्तो दुष्कृताद्घोरातप्रयाति परं पदम् ॥ ३२ ॥

जो वैद्य सम्पूर्ण शुद्धि करके पारद की भस्म या उसका पाक करके रोगियों को औषध रूप में देता है उसको तुलादान तथा अश्वमेध यज्ञ करने का अनश्वर फल प्राप्त होता है। पारद का भस्मादि रूप में सिद्ध होने पर संसार को दारिद्र्य और रोग से मुक्त कर दूंगा इस तरह से किया हुआ पारद का ध्यान ब्रह्महत्यादि अनेक पापों का नाश करता है। पारद में अभ्रक को लीन करने के लिये जो जारण कर्म होता है उस पारद को अभ्रग्रास कहते हैं, इस तरह अभ्रक का ग्रास करना ही पारद का नैवेद्य है पारद की पूजा में भी अभ्रक रक्खा जाता है इस तरह पारद की जो पूजन करता है वह यज्ञजन्य फल को प्राप्त करता है।


(पार्श्व/पाद हस्तलिखित टिप्पणियाँ)

  • वाम पार्श्व: सिद्धे भो. लोड, जले पिक्त्वा ॥ गुटिका धारणं परा सदा ॥
  • अधोभाग:
    रसस्य गुटिकां बद्ध्वा कण्ठे चैव तु धारणम् ॥
    सर्व रोगाणि नश्यन्ति नरस्य नात्र संशयः ॥
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प्रथमोऽध्यायः ।

ग्रसनप्रकारः—
वज्रकण्टकवच्चेभ्रं वृद्धमष्टाङ्गुलं मृदा ।
विलिप्य गोकरीषाग्नौ पुटितं तत्र शोषितम् ॥ १ ॥
त्र्यहं वज्रे विनिक्षिप्तो ग्रासार्थी जायते रसः ।
ग्रसते गन्धहेमादिवज्रसत्वादिकं क्षणात् ॥ २ ॥

अभ्रादिग्रसनशक्तिसञ्जननमेव रसस्य पूजनम्—
जिस मनुष्य को औषधरूप में सेवित पारद के उदर में रहने पर अपनी आयु समाप्ति के कारण मृत्यु हो जाती है वह घोर पापों से मुक्त होकर अन्तिम मुक्तिपद को प्राप्त होता है ॥ २९–३२ ॥

अथ मूर्च्छितादिपारदगुणाः—
मूर्च्छित्वा हरति रुजं बन्धनमनुभूय मुक्तिदो भवति ।
अमरी करोति हि मृतः कोऽन्यः करुणाकरः सूतात् ॥ ३३ ॥
सुरगुरुगोद्विजहिंसापापकलापोद्भवं किलासाध्यम् ।
श्वित्रं तदपि च शमयति यस्तस्मात्कः पवित्रतरः सूतात् ३४
रसबन्ध एव धन्यः प्रारम्भे यस्य सततमितिकरणा ।
सेत्स्यति रसे करिष्ये महीमहं निर्जरामरणाम् ॥ ३५ ॥
सुकृतफलं तावदिदं सुकुले यज्जन्म धीश्च तत्रापि ।
साऽपि च सकलमहीतलनुलनफला भूतलंच सुविधेयम् ॥ ३६ ॥
भूतलविधेयतायाः फलमर्थास्ते च विविधभोगफलाः । ।
भोगाश्च सन्ति शरीरे तदनित्यमतो वृथा सकलम् ॥ ३७ ॥
इति धनशरीरभोगान्मत्वाऽनित्यान्सदैव यतनीयम् ।
मुक्तौ सा च ज्ञानात्तच्चाभ्यासात्स च स्थिरे देहे ॥ ३८ ॥
तत्स्थैर्य्ये न समर्थं रसायनं किमपि मूललोहादि ।
स्वयमस्थिरस्वभावं दाह्यं क्लेद्यं च शोष्यं च ॥ ३९ ॥

विधिसहित मूर्च्छित पारद व्याधि को नष्ट करता है, स्वेदनादि बन्धन साधन प्रक्रियाओं से बद्ध पारद मोक्ष प्रदान करता है, भस्मीभूत पारा मनुष्य को अमर बनाता है अत एव पारद से बढकर और कृपा करने वाला कौन है ? देव, गुरु, गौ, और ब्राह्मण इत्यादि प्राणिमात्र की हिंसा से उत्पन्न पापों के समूह से उत्पन्न हुए असाध्य श्वेत कुष्ठ को भी जो निश्चय ही दूर करता है ऐसे पारद से

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८

रसरत्नसमुच्चये—

अधिक पवित्र कौन पदार्थ है ? जिस मनुष्य की इच्छा प्रथम ही रस बन्धन के लिये निरन्तर होती रहती है तथा मैं रस का सम्यक् बन्धन हो जाने पर भूमण्डल के मनुष्यों को अजर एवं अमर कर दूंगा वह धन्य है ।

मूर्च्छनाप्रकारः—

गन्धकेन रसं प्राज्ञः सुदृढं मर्दयेद्भिषक् ।
कज्जलाभो यदा सूतो विहाय घनचापलम् ॥
दृश्यतेऽसौ तदा ज्ञेयो मूर्च्छितो रसकोविदैः ।
असौ रोगचयं हन्यादनुपानस्य योगतः ॥ इति र० सा० सं० ।

बहुविधमूर्च्छनाप्रकारेणु षड्गुणगन्धकजारणप्रक्रिया साधीयसी ।
यथा—

रसगुणबलिजारणं विनाऽयं न खलु रूजाहरणक्षमो रसेन्द्रः ।
न जलदकलधौतपाकहीनः स्पृशति रसायनतामिति प्रसिद्धा ॥
इति र० चि० म० ।

बन्धनप्रकारो यथा रसरत्नाकरे—

कटुतुम्बीयुद्द्भवे कन्दे वन्ध्यायाः क्षीरकन्दके ।
अपक्कैकं समादाय तद्गर्भे पिण्डिका ततः ॥
दशनिष्कं शुद्धसूतं निष्कैकं शुद्धगन्धकम् ।
स्तोकं स्तोकं क्षिपेद्गन्धं पाषाणे तु च कुट्टयेत् ॥
याममात्रे भवेत् पिण्डी रक्तकन्दे विनिःक्षिपेत् ।
अर्द्धाद्धं भस्म वैक्रान्तं दत्वा निष्कार्धमानकम् ॥
ततः कन्दस्य मज्जाभिर्मुखं बद्ध्वा मृदा दृढम् ।
लिप्तमङ्गुलमानेन सर्वतः शोष्य गोलकम् ॥
पाचयेत् भूधरे यन्त्रे तदुद्धृत्य पुनः पचेत् ।
उर्द्ध्वभागमधः कुर्यादित्येवं परिवर्जयेत् ॥
क्रमेण चालयेदूर्ध्वं वह्निर्युग्मोपलैः पचेत् ।
ततो भित्त्वा तु सङ्ग्राह्यः बद्धःस्याद्दाडिमोपमम् ॥
नाम्नां वैक्रान्तबद्धोऽयं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥

भस्मकरणप्रकारो यथा—

द्विपलं शुद्धसूतस्य सुतार्धं गन्धकं तथा ।
कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं निरन्तरम् ॥

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प्रथमोऽध्यायः ।
९

रुद्ध्वा तत् भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत् पुटे ॥ इति र० सा० सं० ।

पूर्वजन्म कृत अच्छे कर्मों का फल है कि उत्तम वंश में जन्म हो, उसमें भी श्रेष्ठ कुशाग्र तथा आस्तिक्य बुद्धि हो और वह बुद्धि भी सम्पूर्ण भूमण्डल के ज्ञान की तुलना कर सके, फिर उस श्रेष्ठ बुद्धि से पृथ्वी को शक्ति शालिनी बनाने का यत्न करना उससे धनप्राप्ति रूप फल होता है, और धन का फल नाना प्रकार के भोग हैं, और वे भोग शरीर ही में सम्पादित होते हैं (अर्थात् शरीर द्वारा ही भोगे जाते हैं)। किन्तु वह शरीर नाशवान् है इसलिये उपर्युक्त सर्व सामग्री वृथा ही है । इस कारण धन, शरीर, तथा भोगविलासादियों को अनित्य जानकर सदा ही मुक्तिप्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिए, और वह मुक्ति सत्य ज्ञान से होती है, वह यथार्थ ज्ञान योगाभ्यास से, और योग का अभ्यास व्याधि रहित स्थिर शरीर द्वारा ही हो सकता है, इस देह की स्थिरता को बनाई रखने में मूल काष्ठ औषधियां तथा सप्तधातु स्वर्ण लोहादि कोई भी रसायन समर्थ नहीं है क्यों कि वे काष्ठादि तथा धातु औषधियां स्वयं अस्थिर प्रकृति वाली होती हैं तथा वह्नि उनका नाश कर देती है, जल से आर्द्र हो जाती हैं, सूर्य अपनी उष्णता से उन्हें जला देता है । किन्तु पारद पर किसी का भी अनिष्ट कारी प्रभाव नहीं पड़ता है अतः सब में यही उत्तम है ।

रसायनलक्षणम्— यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम्। इति चरकः, ॥ ३३-३९ ॥

पारदे सर्वौषधानामन्तर्भावः—

काष्ठौषध्यो नागे नागो वङ्गेऽथ वङ्गमपि शुल्बे ।
शुल्बं तारे तारं कनके कनकं च लीयते सूते ॥ ४० ॥
अमृतत्वं हि भजन्ते हरमूर्त्तौ योगिनो यथा लीनाः ।
तद्वत्कवलितगगने रसराजे हेमलोहाद्याः ॥ ४१ ॥

काष्ठादिकमूल औषधियां सीसे में, सीसा वङ्ग में, वङ्ग ताम्र में, ताम्र रजत में तथा रजत (चांदी) सोने में और सुवर्ण पारद में विधियों द्वारा मिल जाता है, जिस तरह योगीजन श्रीशिवजी के रूप में लीन होकर अमृतत्व को प्राप्त करते हैं (अर्थात् वे शिवजी में मिलकर जन्म मृत्यु जराव्याधि, आदि

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१० | रसरत्नसमुच्चये—

रोगों से मुक्त हो जाते हैं ) इसी तरह अभ्रक को अपने में लीन किया हुआ पारद सम्पूर्ण सुवर्ण लौहादि धातुओं को अपने में समाविष्ट कर लेता है ॥४०-४१॥

अथ रसस्य जीवन्मुक्तिकारणतामाह—

परमात्मनीव सततं भवति लयो यत्र सर्वसत्त्वानाम् ।
एकोऽसौ रसराजः शरीरमजरामरं कुरुते ॥ ४२ ॥

स्थिरदेहेऽभ्यासवशात्प्राप्य ज्ञानं गुणाष्टकोपे तम् ।
प्राप्नोति ब्रह्मपदं न पुनर्भववासजन्मदुःखानि ॥ ४३ ॥

एकांशेन जगद्युगपदवष्टभ्यावस्थितं परं ज्योतिः ।
पादैस्त्रिभिस्तदमृतं सुलभं न विरक्तिमात्रेण ॥ ४४ ॥

न हि देहेन कथञ्चिद्व्याधिजरामरणदुःखविधुरेण ।
क्षणभङ्गुरण सूक्ष्मं तद्ब्रह्मोपासितुं शक्यम् ॥ ४५ ॥

नामापि देहसिद्धेः को गृह्णीयाद्विना शरीरेण ।
यद्योगगम्यममलं मनसोऽपि न गोचरं तत्त्वम् ॥ ४६ ॥

यज्ञाद्दानात्तपसो वेदाध्ययनादथात्सदाचारात् ।
अत्यन्तभूयसी किल योगवशादात्मसंवित्तिः ॥ ४७ ॥

भ्रुयुगमध्यगतं यच्छिखिविद्युत्सूर्यवज्रगङ्गालि ।
केषाञ्चित्पुण्यदृशामुन्मीलति चिन्मयं परं ज्योतिः ॥ ४८ ॥

परमानन्दैकरसं परमं ज्योतिःस्वभावमविकल्पम् ।
विगलितसकलक्लेशं ज्ञेयं शान्तं स्वसंवेद्यम् ॥ ४९ ॥

तस्मिन्नाधाय मनः स्फुरदखिलं चिन्मयं जगत्पश्यन् ।
उत्सन्नकर्मबन्धो ब्रह्मत्वमिहैव चाऽऽप्नोति ॥ ५० ॥

रागद्वेषविमुक्ताः सत्याचारा मृषारहिताः ।
सर्वत्र निर्विशेषा भवन्ति चिद्ब्रह्मसंस्पर्शात् ॥ ५१ ॥

तिष्ठन्त्यणिमादियुता विलसद्देहाः सदोदितानन्दाः ।
ब्रह्मस्वभावममृतं सम्प्राप्ताश्चैव कृतकृत्याः ॥ ५२ ॥

आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् ।
श्रेयः परं किमन्यच्छरीरमजरामरं विहायैकम् ॥ ५३ ॥

प्रथमोऽध्यायः । ११

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प्रथमोऽध्यायः । ११

प्रत्यक्षेण प्रमाणेन यो न जानाति सूतकम् ।
अदृष्टविग्रहं देवं कथं ज्ञास्यति चिन्मयम् ॥ ५४ ॥
यज्ज्रया जर्जरितं कासश्वासादिदुःखविवशं च ।
योग्यं तन्न समाधौ प्रतिहितबुद्धीन्द्रियप्रसरम् ॥ ५५ ॥
बालः षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पटः परतः ।
यातविवेको वृद्धो मर्त्यः कथमाप्नुयान्मुक्तिम् ॥ ५६ ॥
अस्मिन्नेव शरीरे येषां परमात्मनो न संवेदः ।
देहत्यागादूर्ध्वं तेषां तद्ब्रह्म दूरतरम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मादयो यतन्ते तस्मिन्दिव्यां तनुं समाश्रित्य ।
जीवन्मुक्ताश्चान्ये कल्पान्तस्थायिनो मुनयः ॥ ५८ ॥
तस्माज्जीवन्मुक्तिं समीहमानेन योगिना प्रथमम् ।
दिव्या तनुर्विधेया हरगौरीसृष्टिसंयोगात् ॥ ५९ ॥

जिस तरह संसार के सर्व प्राणी परब्रह्म परमात्मा में लीन हो जाते हैं उसी तरह रसों में राजा (श्रेष्ठ) पारद में सम्पूर्ण रस, उपरस लौहादि द्रव्य समाविष्ट हो जाते हैं, इस तरह का यह पारद शरीर को अजर और अमर बना देता है (अर्थात् परब्रह्म की उपासना से जो अजर और अमर फल प्राप्त होता है वही फल इससे है अतः पारद भी ब्रह्मस्वरूप ही है )

पारद के सेवन करने से स्थिर देह प्राप्त होने पर अभ्यास करने से गौतम महर्षि प्रतिपादित अष्टविध गुणों से युक्त यथार्थ ज्ञान को मनुष्य प्राप्त करके ब्रह्म पदको प्राप्त करता है फिर वह पुनरुत्पत्ति और वासना जनित दुःखों को प्राप्त नहीं होता है, इस तरह पारद मोक्ष देने वाला है ।

गौतमोक्त अष्टगुण, सर्वभूतदया, क्षान्तिः, अनसूया, शौच, अनायास, मङ्गलवचन, अकार्पण्य, अस्पृहा, ये हैं । तीन पादों (सत्व, रज, और तम) से युक्त अर्थात् त्रिविक्रमस्वरूप परमोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप पदार्थ अपने सर्वभूतस्वरूप एक अंश (पाद) से जगत् को धारण करके स्थित है वह अमृत स्वरूप पर ब्रह्म केवल वैराग्य मात्र से प्राप्त नहीं होता है ।

‘पादोऽस्य सर्वभूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि’ इति श्रुतिः ।
‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ इति गीता ॥

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१२ रसरत्नसमुच्चये—

व्याधि, जरा, मरण आदि अनेक कष्टों से आक्रान्त तथा क्षण में नाश होने वाले इस देह से किसी तरह से भी वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रसिद्ध ब्रह्म कभी भी ध्यान गम्य नहीं हो सकता है। इसी को प्रकारान्तर से कहते हैं—जो निर्मल है और मन का भी विषय न होने वाला है किन्तु योग से प्राप्त होने वाला है ऐसे तत्त्वस्वरूप ब्रह्म को देहसिद्धि के बिना इस क्षणविध्वंसी स्थूल शरीर से कौन ऐसा व्यक्ति है जो प्राप्त कर सके ?

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह,

ब्रह्मज्ञानोपाय निम्न हैं—यागानुष्ठानों से, अन्न वस्त्रादि के दान से, तपश्चर्या से, वेदपाठ से, दम से, सत्पुरुषों के समान सदाचरण करने से, और योग से, अत्यन्त प्रचुर तथा सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानरूप आत्मसिद्धि प्राप्त होती है ।

'निग्रहो बाह्यवृत्तीनां दम इत्यभिधीयते'

सरस्वती दृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥
तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्य्यक्रमागतः। वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते॥
साधवः क्षीणदोषाश्च सच्छन्दः साधुवाचकः । तेषामाचरणं यत्तु सदाचारः स उच्यते॥

दोनों भ्रुकुटियों के बीच में स्थित जो अग्नि, विद्युत् और सूर्य के समान जगत् को प्रकाशित करने वाला उत्कृष्ट ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म है वह ज्ञान चक्षुयुक्त किसी २ मनुष्य को प्रकाशित होता है ।

केवल नित्यानन्दस्वरूप, सर्वदा एकरस, और अनादि, तर्क वितर्कादि कल्पों से रहित स्वभाव वाला, समग्र क्लेशों से रहित, शान्तस्वरूप, सब के जानने योग्य तथा आत्मा ही में मनन होने वाला, ज्योतिः स्वरूप ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्म में मन को निविष्ट कर, निखिल जगत् को उस ब्रह्म से व्याप्त और प्रकाश युक्त देखता हुआ शुभाशुभ कर्मों से युक्त होकर मनुष्य इसी संसार में ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है। उस ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष स्वजनानुराग और परिजनद्वेष से रहित, शुद्ध आचार-युक्त मिथ्याभाषणादि रहित और सब में समदर्शी होते हैं और अमृत स्वरूप ब्रह्मस्वभाव को प्राप्त पुरुष अणिमादि अष्टसिद्धियों से युक्त देदीप्यमान देहवाले, और सर्वदा आनन्द ही में मग्न रहने वाले तथा अपने को कृतकृत्य जान कर रहते हैं ।

जो तत्व को साक्षात्कार कराने वाली श्रुतिस्मृत्यादि विद्याओं का आधार है

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प्रथमोऽध्यायः । | १३

और धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष का मूल है ऐसे एक जीवन मरण से रहित शरीर के सिवाय अन्य कौनसा उत्तम श्रेय है ? ।

जो पुरुष देहस्थिर करने वाले प्रत्यक्ष प्रमाणों से भी पारद को यथार्थ नहीं समझता है वह स्थूल चक्षु से अज्ञेय तथा ज्ञानस्वरूप ( चिन्मय ) शरीर से रहित ब्रह्मदेव को कैसे सत्य जान सकेगा ? जो शरीर बुढापे से जर्जरित हो गया है और कास, श्वास आदि दुःखों से व्याप्त है और सत्यासत्यनिर्णायक बुद्धि तथा स्वविषय प्रत्यक्ष करने वाली इन्द्रियों से कमजोर है ऐसा यह शरीर परमात्मा का एकाग्रचित्त से ध्यान करने में अयोग्य है ।

सोलह वर्ष की अवस्था पर्यन्त मनुष्य बालक रूप में रहता है बाद में युवावस्था प्राप्त होने पर स्रक् चन्दन वनितारूप विषयरसों में लिप्त हो जाता है, फिर ७० वर्ष के बाद ज्ञान प्राप्त होने पर वृद्ध हो जाता है इस लिये मर्त्यजन कैसे मुक्ति लाभ करें ? । जिन मनुष्यों को इसी शरीर में परब्रह्मका यथार्थ ज्ञान न हो तो फिर इस देह त्याग के पश्चात् वे ब्रह्म ज्ञान से अत्यन्त दूर रह जाते हैं । ब्रह्मादिक देवता उस ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये दिव्यशरीर धारण करके तथा अनेक कल्पों तक स्थित रहने वाले जीवन्मुक्त होकर मुनि लोग भी उसके लिये प्रयत्न करते रहते हैं । इसलिये जीवन्मुक्ति की अभिलाषा रखने वाले योगी को चाहिये कि वह सर्वप्रथम महादेव और पार्वती से जन्य पारद और गन्धक के संयोग से निर्मित औषधि से दिव्य शरीर प्राप्त करने की कोशिश करें ।

पारदं शिववीर्य्यञ्च दुर्गा बीजञ्च गन्धकम् ॥ ४२–५९ ॥

अथ रसोत्पत्तिवर्णनम्—

शैलेऽस्मिञ्छिवयोः प्रीत्या परस्परजिगीषया ।
सम्पवृत्ते च सम्भोगे त्रिलोकक्षोभकारिणि ॥ ६० ॥

विनिवारयितुं वह्निः संभोगं प्रेषितः सुरैः ।
काङ्क्षमाणैस्तयोः पुत्रं तारकासुरनामकम् ॥ ६१ ॥

कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत्कन्दरेऽनलम् ।
अपत्तिभावसंक्षुब्धं स्मरलीलाविलोकिनम् ॥ ६२ ॥

तं दृष्ट्वा लज्जितः शंभुर्विरतः सुरतात्तदा ।
प्रच्युतश्चरमो धातुर्गृहीतः शूलपाणिना ॥ ६३ ॥

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१४ रसरत्नसमुच्चये—

प्रक्षिप्तो वदने वह्नेर्गङ्गायामपि सोऽपतत् ।
बहिः क्षिप्तस्तया सोऽपि परिदन्दह्यमानया ॥ ६४ ॥
सञ्जातास्तन्मलाधानाद्धातवः सिद्धिहेतवः ।
यावदग्निमुखाद्रेतो न्यपतद्भूरिसारतः ॥ ६५ ॥
शतयोजननिम्नांस्तान्कृत्वा कूपांस्तु पञ्च च ।
तदाप्रभृति कूपस्थं तद्रेतः पञ्चधाऽभवत् ॥ ६६ ॥

हिमालय पर्वत पर महादेव और पार्वती दोनों में प्रेम पूर्वक परस्पर जय की इच्छा से लोकत्रय को क्षुब्ध करने वाला सम्भोग कर्म प्रारम्भ हुआ, उस सम्भोग को बन्द कराने की इच्छा वाले और शिव तथा पार्वती की देह से उत्पन्न पुत्र की चाहना वाले देवताओं ने अग्नि को भेजा। कबूतर के रूप को धारण किये हुए, हिमालय की गुफा में आये हुये और कामक्रीडा को देखने वाले देव भाव से संक्षुब्ध हुए अनल (अग्नि) देव को देख कर लज्जा के कारण शिव जी सम्भोग से विरत हुए, उस समय महादेव जी के शरीर से अन्तिम धातु (शुक्र) का पात हुआ, उस धातु को शिवजी ने अग्नि के मुख में डाल दिया, बाद में वह धातु वह्नि के मुख से गङ्गा में गिर पड़ा, उस तेज को न सहन करने वाली गङ्गा ने भी उसे बाहर फेंक दिया, उस वीर्य के किट्ट भाग से सिद्धिप्रदान करने वाले अनेक रसादिक धातु उत्पन्न हुए। जिस समय अग्नि के मुख से गुरुभारयुक्त शिवजी के धातु का बहिः पतन हुआ, उस वक्त वह धातु सौ योजन गहरे पांच कुए बना कर पञ्चविध हो गया ॥ ६०—६६ ॥

अथ रसानां भेदः—
रसो रसेन्द्रः सूतश्च पारदो मिश्रकस्तथा ।
इति पञ्चविधो जातः क्षेत्रभेदेन शंभुजः ॥ ६७ ॥
रसो रक्तो विनिर्मुक्तः सर्वदोषै रसायनः ।
सञ्जातास्त्रिदशास्तेन नीरुजा निर्जरामराः ॥ ६८ ॥
रसेन्द्रो दोषनिर्मुक्तः श्यावो रूक्षोऽति चञ्चलः ।
रसायिनोऽभवंस्तेन नागा मृत्युजरोज्झिताः ॥ ६९ ॥
देवैर्नागैश्च तौ कूपौ पूरितौ मृद्भिदृषद्भिः ।
तदाप्रभृति लाकानां तौ जातावतिदुर्लभौ ॥ ७० ॥

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प्रथमोऽध्यायः । १५

ईषत्पीतश्च रूक्षाङ्गो दोषयुक्तश्च सूतकः ।
दशाष्टसंस्कृतैः सिद्धो देहं लोहं करोति सः ॥ ७१ ॥
अथान्यकूपजः सोऽपि चञ्चलः श्वेतवर्णवान् ।
पारदो विविधैर्योगैः सर्वरोगहरः स हि ॥ ७२ ॥
मयूरचन्द्रिकाच्छायः स रसो मिश्रको मतः ।
सोऽप्यष्टादशसंस्कारयुक्तश्चातीव सिद्धिदः ॥ ७३ ॥
त्रयः सूतादयः सूताः सर्वसिद्धिकरा अपि ।
निजकर्मविनिर्माणैः शक्तिमन्तोऽतिमात्रया ॥ ७४ ॥
एतां रससमुत्पत्तिं यो जानाति स धार्मिकः ।
आयुरारोग्यसन्तानं रससिद्धिं च विन्दति ॥ ७५ ॥

शिवजी से उत्पन्न धातु क्षेत्र भेद से रस, रसेन्द्र, सूत, पारद, और मिश्रक इस तरह पांच तरह का कहलाया। रस नामक पारद सबदोषों से रहित तथा रक्त वर्ण का होता है उसके सेवन से देवता लोग अजर और अमर होगये । रसेन्द्र नामक पारद दोषों से रहित कपिशवर्ण (श्यामवर्ण) लिये हुए तथा स्पर्श में रूक्ष और देखने में अत्यन्त निर्मल और रसायन गुण देने वाला होता है। उसके सेवन से नाग जाति मृत्यु तथा बुढ़ापे से मुक्त होगई। इसके बाद नाग और इन्द्रादिक अजर अमर हुए देवताओं ने उन दोनों कुओं को 'जिनमें रस और रसेन्द्र भरा था, मिट्टी और पत्थरों से बन्द कर दिया, उसी समय से वे दोनों कुए या पारद प्राणियों के लिये दुष्प्राप्य होगये।

देखने में कुछ पीला, स्पर्श में रूक्ष और सप्तकञ्चुक तथा नागादि दोषों से युक्त सूत नाम का पारद होता है तथा अठारह संस्कारों से सिद्ध होने पर वह मनुष्य को लोह के समान मजबूत बना देता है, और अन्य कुओं से उत्पन्न रस चञ्चल और श्वेत वर्ण का होता है उसे पारद कहते हैं, वह विविध औषधियों के संयोग से, या अष्टादश संस्कार करने पर, सम्पूर्ण रोग दूर करता है। मोर के पुच्छस्थ विविध वर्ण की चन्द्राकृति की छाया वाला मिश्रक नाम का रस (पारद) होता है, वह भी अठारह संस्कारों से सिद्ध होने पर अत्यन्त सिद्धि प्रदान करता है। सूत, पारद और मिश्रक ये तीनों सूत (रस)

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१६ रसरत्नसमुच्चये—

सम्पूर्ण सिद्धियों के देने वाले हैं तथापि उनका यदि अष्टादश स्वेदनादि संस्कार हो जाय तो उस कर्म के प्रभाव से वे अत्यन्त शक्ति देने वाले हो जाते हैं ।

जो इस तरह रस की उत्पत्ति को जानता है, वह धर्मात्मा कहलाता है, और वही आयु और आरोग्य की परम्परा को प्राप्त करता है तथा रस शोधनादिकर्म में सफल भी होता है ।

दोषगणना—
नागो वङ्गो मलो वह्नि श्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः ।
असह्याग्निर्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ २० सा० सं० ।

रसायनलक्षणन्तु—
यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम् ।
स्वस्थस्यौजस्करं यत्तु तद्वृष्यं तद्रसायनम् ॥ 'इति चरकः ।
देहस्थेन्द्रियदन्तानां दृढीकरणमेव च ।
वलीपलितखालित्यवर्जनेऽपि च या क्रिया ॥
पूर्ववैद्यप्रणीतं हि तद्रसायनमुच्यते । इति वैद्यक संग्रहः ।

अष्टादश संस्काराः—
“स्वेदन-मर्दन-मूर्च्छनोत्थापन-पातन-बोधन-नियमन-दीपनानुवासन-गगनादि-ग्रास-प्रमाणचारण-गर्भद्रुति-बाह्यद्रुतियोग-जारण-रञ्जनसारण-क्रामणवेध-भक्षणानीति” ।
—रसेन्द्रचिन्तामणिः ।

सूत और पारद शब्द व्यक्ति तथा जाति उभयवाचक हैं । जैसे तृण शब्द तृणविशेष और सर्वतृणनिष्ठ तृणजाति का वाचक होता है ॥ ६७–७५ ॥

अथ रसादीनां निरुक्तिः—
रसनात्सर्वधातूनां रस इत्यभिधीयते ।
जरारुङ्मृत्युनाशाय रस्यते वा रसो मतः ॥ ७६ ॥
रसोपरसराज्त्वाद्रसेन्द्र इति कीर्तितः ।
देहलोहमयीं सिद्धिं सूते सूतस्ततः स्मृतः ॥ ७७ ॥
रोगपङ्काब्धिमग्नानां पारदानाच्च पारदः ।
सर्वधातुगतं तेजोमिश्रितं यत्र तिष्ठति ॥
तस्मात् स मिश्रकः प्रोक्तो नानारूपफलप्रदः ॥ ७८ ॥

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प्रथमोऽध्यायः । १७

एवंभूतस्य सूतस्य मर्त्यमृत्युगदच्छिदः ॥
प्रभावान्मानुषा जाता देवतुल्यबलायुषः ॥ ७९ ॥

सुवर्ण रजत आदि धातुओं को द्रवरूप में परिणत करने से अथवा सब धातुओं में उत्कर्ष वीर्याधान करने से पारद रस शब्द से कहा जाता है, अथवा जरा, व्याधि और मृत्यु के नाश करने में समर्थ होने से भी इसको रस कहते हैं। अभ्रक आदि आठ महारस—और गन्धकादि उपरसो में श्रेष्ठ होने से रसेन्द्र कहलाता है। शरीर को लोहे के तुल्य दृढ सिद्धि देने से अर्थात् मजबूत करने से सूत कहा जाता है। व्याधि रूपी कीचड़ के समुद्र में डूबे हुए मनुष्यों को उससे पार करने के कारण पारद कहा जाता हैं। जिसमें सब धातुओं का तेज मिश्र होकर रहता है इसलिये उसे मिश्रक भी कहते हैं। वह नाना प्रकार के रोगों को नाश करने का फल करता है। अर्थात् मिश्रक नामक पारद में सब धातुओं के गुण पाये जाते हैं। इस प्रकार से मनुष्यों की मृत्युरूप व्याधि या मृत्यु और ज्वरादि रोगों को दूर करने वाले सूत के प्रभाव से मनुष्य देवताओं के समान बल और आयु से युक्त होने लगे।

संसारस्य परं पारं दत्तेऽसौ पारदः स्मृत ॥ ७६-७९ ॥

अथ रससंस्कारकारणम्—

तान्दृष्ट्वाऽभ्यर्थितो रुद्रः शक्रेण तदनन्तरम् ।
दोषैश्च कञ्चुकाभिश्च रसराजो नियोजितः ॥ ८० ॥
तदाप्रभृति सूतोऽसौ नैव सिध्यत्यसंस्कृतः ॥ ८० ॥
जलगो जलरूपेण त्वरितो हंसगो भवेत् ।
मलगो मलरूपेण सधूमो धूमगो भवेत् ॥ ८१ ॥
अन्या जीवगतिर्दैवी जीवोऽण्डादिव निष्क्रमेत् ।
स तांश्च जीवयेज्जीवन् तेन जीवो रसः स्मृतः ॥ ८२ ॥
चतस्रो गतयो दृश्या अदृश्या पञ्चमी गतिः ।
मन्त्रध्यानादिना तस्य रुध्यते पञ्चमी गतिः ॥ ८३ ॥
इति भिन्नगतित्वाच्च सूतराजस्य दुर्लभः ।
संस्कारस्तस्य भिषजा निपुणेन तु रक्ष्येत् ॥ ८४ ॥

इस तरह मनुष्यों को अजर अमर होते देख इन्द्र के प्रार्थना करने पर महादेवजी ने उस पारद में

रस० २

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१८ रसरत्नसमुच्चये-

नागादि अष्ट दोष और पर्पव्यादि सप्तकञ्चुक दोष

नागो वङ्गो मलो वह्निश्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः ।
असह्याग्नि र्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ र० सा० सं०
भेदी द्रावी मलकरी ध्वांक्षी पर्पटीका च सा ।
अन्धकारी पाटनिका कञ्चुकाः सप्त कीर्तिताः ॥ र० त०

मिला दिये। उस समय से आज तक यह सूत बिना संस्कारों के सिद्धि देने वाला नहीं होता है । जल के समान द्रव रूप होने से जल के साथ गमन शील है । चाञ्चल्य होने से हंस के समान गमन शील है । मल रूप होने से मलादि दोषों के साथ मिल जाता है । अग्नि आदि से तप्त करने पर धूम के समान उड़न शील हो जाता है । इन चार प्रकार की गतियों के सिवाय पांचवीं भी अदृश्यरूप रस की गति है । उस गति के कारण देहरूप कोष से (अण्डाद्) आत्मा की तरह निकल जाता है । अर्थात् जिस तरह से मृत्यु के समय आत्मा की गति का ज्ञान किसी को भी नहीं होता है इसी तरह रस की पांचवीं गति अदृश्य है । वह रस जीवों (प्राणियों) को प्राण दान करने से जीव कहलाता है ।

पारद की उपर्युक्त जलग, हंसग, धूमग, मलग, रूप चारों गतियों का प्रत्यक्ष दर्शन होता है किन्तु पांचवीं गति अदृश्य है । परन्तु वह पांचवीं गति रस-रक्षामन्त्र और रसध्यान से रोकी जाती है । उक्त प्रकार से भिन्न २ गति होने के कारण पारद का संस्कार करना कठिन है । इस लिये निपुण वैद्य का कर्तव्य है कि वह उन संस्कारों की रक्षा करे ॥ ८०-८४ ॥

रसरक्षामन्त्रः—

ओं अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च ।
सर्व्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररुपिभ्यः ॥ र० सा० सं०

ध्यानप्रकारः—

हृद्व्योमकर्णिकाऽन्तःस्थं रसेन्द्रं परमेश्वरि ? ।
स्मरन्विमुच्यते पापैः सद्यो जन्मान्तरार्जितैः ॥ र० चि० म०

अथ रसस्य स्थानान्तरगतिवर्णनम्—

प्रथमे रजसि स्नातां हयारूढां स्वलंकृताम् ।
वीक्षमाणां वधूं दृष्ट्वा जिघृक्षुः कूपगो रसः ॥ ८५ ॥
उद्गच्छति जवात्सोऽपि तं दृष्ट्वा याति वेगतः ।
अनुगच्छति तां सूतः सीमानं योजनोन्मितम् ॥ ८६ ॥

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प्रथमोऽध्यायः । १९

प्रत्यायाति ततः कूपं वेगतः शिवसम्भवः ।
मार्गनिर्मितगर्तेषु स्थितं गृह्णन्ति पारदम् ॥ ८७॥

इसी समय प्रथम बार मासिकधर्म स्नान की हुई और अनेक प्रकार से उत्तम आभूषणों से शोभायमान तथा अश्व पर बैठी हुई और पारे के कुएँ में झांकती हुई तरुणी को देखकर उसे पकड़ने की इच्छा से वेग करके पारद कुएँ के बाहिर निकला । वह तरुणी भी उस पारे को देखकर वेग से भागने लगी । इसी तरह पारद भी चार कोस ( योजन ) पर्यन्त उसके पीछे पीछे चलता रहा, परन्तु उस स्त्री के भाग जाने पर बड़े वेग से फिर अपने आधार भूत कुएँ में आने लगा । उस समय कुछ पारा मार्ग में बने हुए गढहों में ठहर गया । उसी पारे को वे लोग गढहों से ग्रहण करते हैं ॥ ८५—८७ ॥

अथ हिङ्गुलोत्पत्तिवर्णनम्—

पतितो दरदे देशे गौरवाद्वह्निवक्त्रतः ।
स रसो भूतले लीनस्तत्तद्देशनिवासिनः ॥
तां मृदं पातनावन्त्रे क्षिप्त्वा सूतं हरन्ति च ॥ ८८ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥


अत्यन्त गुरुता ( भारीपन ) होने के कारण जो पारद अग्नि के मुख से निकल कर दरद नाम वाले देश में गिरा, तभी से वह रस वहां की पृथ्वी में लीन हो गया । उस देश के लोग दरद नाम की मिट्टी को विद्याधर नामक ऊर्ध्व पातन यन्त्र में रख कर उससे पारा निकालते हैं ॥ ८८ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा कृतायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां
रसोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।

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२० रसरत्नसमुच्चये—

पारदीयविमर्शः—

हमारे प्राचीन आचार्यों ने जिस विषय के ऊपर गवेषणा करके जो कुछ सूत्र रूप में लिख दिया वह अक्षरशः सत्य है। उनके ज्ञान को आजकल के नवयुग के प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक अथक परिश्रम करने पर भी अभीतक नहीं प्राप्त कर सके हैं। बहुत से सत्यप्रिय वैज्ञानिकों ने हमारे आचार्यों के सूत्राशयों को प्रत्यक्षादिकप्रमाणों से स्वयं प्रत्यक्ष करके सिद्ध करलेने पर अन्तः करण से उनकी चरण चञ्चरीकता को स्वीकार की है तथा उनकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा भी की है। इसके कई एक उदाहरण हैं। हमारे ऋषि महर्षि आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों प्रकार के ज्ञान के यथार्थ विज्ञानी थे। इस विषय में प्रायः वर्तमान समय के सब देशके विद्वानों का एक मत है किन्तु उन प्राचीन महर्षियों की शिष्य परम्परा के भी पश्चात् उप शिष्य परम्परा ने उन के सूत्रों का इस प्रकार की अलङ्कारिकसंस्कृत भाषा में वर्णन किया कि जिसके फलस्वरूपमें आधुनिक संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने उन सूत्रस्थ द्रव्यों की विज्ञानता को खोकर केवल आप्तोक्त ही मानकर शनैः शनैः अपने शेष विज्ञान सूर्य को भी अपने आप अज्ञानाम्बर से ढक दिया। उधर आजकल के पाश्चात्य विद्वानों ने हमारे ही महर्षियों के सूत्रों के तत्व को भलीभांति समझ कर उसी के आधार पर प्रत्येक पदार्थ का अन्वेषण करना प्रारम्भ कर दिया जिसका फल यह निकला कि गुरुओं

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ इति मनु० अ० २

को शिष्य बनाकर पाश्चात्य विद्वानों ने अपने मस्तक को ऊंचा उठा लिया। इतना होने पर भी आजकल हम लोग अपने महर्षियों के इन

विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ ( इति मनु० अ० २ )

श्लोकप्रतिपादित वचनों का सर्वथा अनादर करके खोये हुए अपने ही विज्ञान भास्कर के उदय के लिये इतस्ततः मनसा, वाचा, कर्मणा इन में से किसी एक भी उद्योग को नहीं कर रहे हैं। अस्तु "सब दिन रहत न एक समान, इस लोकोक्ति के अनुसार अब दैव ही गाढ निद्रा में सोये हुए हम लोगों के ऊपर से अज्ञान रूपी चादर को खींच रहा है। इससे आशा है कि वह दिन अब शीघ्र ही आयगा जब कि हमारे विशाल भारत में विज्ञान दिवाकर प्रतिदिन उदित हुआ करेगा। हमारा वैद्यक व्यवसाय सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये ही है जैसे कि कहा है—नात्मार्थं नापिकामार्थमथ भूतदयाम्प्रति ।

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प्रथमोऽध्यायः ।
२१

अत एव हमें सर्व प्रथम अपने ज्ञान को सर्वसमुन्नत बनाना ही चाहिए। तथा रसचिकित्सा में कौन पदार्थ कैसा है, कहां प्राप्त होता है, किस रूप में प्राप्त होता है, आदि अनेक ज्ञान की पूर्णावश्यकता है। इस लिये इस रसग्रन्थ में प्रत्येक पदार्थ की समाप्ति के पश्चात् उसका पूर्ण परिचय कराना मेरा परम कर्तव्य है।

पारद = मर्करी । Mercury.—इस धरातल (संसार) में जितने भी खनिज द्रव्य हैं वे सब पृथ्वी के भीतर अर्थात् भूगर्भ में उत्पन्न होते हैं। उन में पारद ही एक ऐसा खनिज है जो साधारण तापक्रम (Normal Temperature) पर द्रवरूप में प्राप्त होता है। पारद का स्वरूप पिघली हुई चांदी के समान होता है इसी कारण रसकामधेनु में इसको गलद्रूप्यनिभम् (अर्थात् द्रुतचांदी के सदृश) कहा है। तथा सम्भव है कि पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी इसको क्विक्-सिल्वर (quick silver) इसी हेतु से कहा है। पारद का सङ्केत (सिम्बोल Symbol) Hg. है तथा इसका परमाणुभार(१) (एटोमिक वेट Atomic weight.) २०० है तथा इसको तत्व(२) (एलीमेण्ट Element) माना है। इसका आपेक्षिक घनत्व(३) (Relative Density) १३०५९ है।

यह ३९° सें० पर जमता है अर्थात् इसका हिमाङ्क(४) Freezing Point ३९° सें० है तथा ३५९° सें० पर उबलता है अर्थात् इसका क्वथनाङ्क(५) (Boiling Point) ३५९° सें० है।

पारद की उपस्थिति—

पारद कभी कभी मुक्तावस्था में या स्वतन्त्र रूप से प्रकृति में अत्यल्प मात्रा में


(१) किसी तत्त्व के परमाणुभार को एकाङ्ग (unit) मान कर उसकी तुलना से दूसरे तत्त्वों के परमाणुभार के जो अङ्क प्राप्त होते हैं उन्हें 'परमाणुभार' (Atomic weight) कहते हैं। प्रा० र०
(२) जिन्हें रासायनिक दृष्टि से दो वा दो से अधिक पदार्थों में विच्छिन्न (पृथक्) नहीं कर सकते हैं ऐसे पदार्थों को 'तत्व' (Elements) कहते हैं। प्रा० र०
(३) जब एक पदार्थ के घनत्व की किसी दूसरे पदार्थ के घनत्व से तुलना की जाती है तब इसे आपेक्षिकघनत्व (Relative Density) कहते हैं तथा किसी पदार्थ के इकाई आयतन (Unit Volume) में कितनी मात्रा (Mass) विद्यमान है इसी को घनत्व (Density) कहते हैं। प्रा० र०
(४) जिस तापक्रम पर द्रव पदार्थ घन बनते हैं उसे 'हिमाङ्क' (Freezing Point) कहते हैं।
(५) जिस तापक्रम पर द्रव उबलने लगता है वह तापक्रम उस द्रव का 'क्वथनाङ्क' (Boiling Point) कहाता है। प्रा० र०

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२२ रसरत्नसमुच्चये—

पाया जाता है। यह प्राचीन काल से हिङ्गुल (सिनबार Hgs) ही से अधिकतर निकाला जाता है। इसके अन्य रस ग्रन्थों में तथा इसी ग्रन्थ (रसरत्नसमुच्चय) में अनेक प्रमाण हैं यथा—

दरदं ( हिङ्गुलं ) पातने यन्त्रे पातयेत् सलिलाशये ।
सत्त्वं सूतकसङ्काशं जायते नात्र संशयः ॥ ( रसार्णव )
तं सूतं योजयेद्योगे सप्तकञ्चुकवर्जितम् ।
ज्वरादिहरणं सर्वरसेषु विनियोजयेत् ॥ ( रसदर्पण )
पतितो दरदे देशे गौरवाद्बहिवक्त्रतः ।
स रसो भूतले लीनस्तत्तद्देशनिवासिनः ।
तां मृदं पातनायन्त्रे क्षिप्त्वा सूतं हरन्ति च ॥ ( रसरत्नसमुच्चय )
ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण हिङ्गुलादुत्थितो रसः ।
हिङ्गुलोत्थः स्मृतश्चैव हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ( र० त० )
अथवा हिङ्गुलात् सूतं ग्राहयेत् तन्निगद्यते ।
जम्बीरनिम्बुनीरेण मर्दितो हिङ्गुलो दिनम् ॥
ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण ग्राह्यः स्यान्निर्मलो रसः ।
कञ्चुकैर्नागवङ्गाद्यैर्निर्मुक्तो रसकर्मणि
विना कर्माष्टकेनैव सूतोऽयं सर्वकर्मकृत् ॥ ( र० सा० सं० )

इन सब अवतरणों को पढ़ने से यह सिद्ध होता है कि पुराण काल ही से हिङ्गुल से विशेष रूप से पारद निकाला जाता है ।

भारत से इतर देशों मे भी हिङ्गुल ही से पारद निकाला जाता है । थियो फ्रास्टस ( Theo Phrastus ) नाम के विद्वान ने ईसा के पूर्व की ३०० शताब्दि के लगभग लिखा है कि ताम्रचूर्ण और हिङ्गुल को सिरके के साथ पीस कर उसे उड़ाकर पारद पृथक् करते थें । इसी प्रकार डायस्कोरोडीज ( Dioscorides ) नामक विद्वान् ने भी लौह चूर्ण के साथ हिङ्गुल मिलाकर उड़ाके पारद निकाला था । यही विधि ऊंचे दर्जे के हिङ्गुल से पारद निकालने के लिये कहीं २ अब तक भी काम में लाई जाती है ।

सोना चांदी बनाने वाले कीमियागर लोगों ने पारद पर अनेक प्रकार के परीक्षण किये तथा उन्हीं के अनुभव से पारद-मिश्रक (Amalgams) का ज्ञान व्यवहार में सर्वप्रथम प्रचलित हुआ। इसके पूर्व कालमें कुछ लोगोंकी धारणा थी कि लोहे अथवा पारद जैसी हीन धातुएं स्वर्ण या चांदी के रूप में परिणत हो सकती है। लोग ऐसा समझते थे की पारस मणि की सहायता से यह कार्य हो सकता है।

"पारस परसि कुधातु सुहाई"

प्रथमोऽध्यायः ।

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प्रथमोऽध्यायः ।
२३

इसलिये इस पारस मणि के अन्वेषण करने के लिये कितने ही पुरुषों ने अपना समग्र जीवन दे दिया किन्तु वे उसको प्राप्त नहीं कर सके । धीरे धीरे इस निरर्थक खोज की ओर से लोगों ने मन को हटाकर ऐसी क्रियाओं के अन्वेषण में लगे जो लोहे वा पारे को चांदी या स्वर्ण में परिणत कर दे । कुछ लोग यह समझते थे कि मिश्र देश वालों को इस क्रिया का ज्ञान था जिससे वे हीन धातुओं को स्वर्ण सदृश सुन्दर धातुओं में परिणत कर देते थे । पाश्चात्य देशों में सबसे प्रथम सन् १६६६ ई० में पेरू (Peru) देश के हुवान्कावेलिका (Huancavelica) नामक स्थान में हिङ्गुल का अस्तित्व विदित हुआ और सन् १६३३ ई० में लोपेज़—सावेद्रा-बार्वा Lopez Saavedra Barba नामक व्यक्ति ने पारद निकालने के लिये अल्युडेल (Aludel मडकल़ों वालो) नामक भट्टी तैयार की। इसी भट्टी को १६४६ ई० में बुस्टामेण्ट (Bustamente) नाम के किसी रसायन शास्त्रवेत्ता ने स्पेन (Spain) देशीय पारदीयखनिज प्राप्ति के प्रसिद्ध अल्माडन (Almaden) स्थान की खानों में प्रचलित की पारद निकालने के लिये यह भट्टी दो शताब्दियों से भी अधिक समय तक उक्त दोनों देशों में प्रयुक्त होती रही । किन्तु अब नवीन उत्तम भट्टियों के बन जाने से इसका व्यवहार बन्द हो गया है ।

खनिज से पारद निकालने की विधि अत्यन्त सरल है । खनिज को खुले स्थान में फूंकते हैं जिससे हिङ्गुल का गन्धक सल्फर डाइआक्साइड (Sulphur Dioxide) में बदल जात है और पारद मुक्त हो जाता है । कभी २ हिङ्गुल को चूने के साथ मिलाकर बन्द रिटोर्ट में स्रावित करते हैं जिससे केलसियम सल्फाइड और सल्फेड बनता है तथा पारद मुक्त हो जाता है । विधिपूर्वक निकाले हुए पारद के अन्दर बहुत सी अशुद्धियां रह जाती हैं । तथा इस पारद के साथ बहुत से यन्त्रवाहित (Mechanically carried) अपद्रव्य मिले रहते हैं । इन में से कुछ तो केमोयास चमड़े के द्वारा छानने से दूर हो जाते हैं और कुछ यशद (zinc) वङ्ग (tin) सीस (Lead) सदृश पदार्थ मिले रहते हैं जो कि पारद का ऊर्ध्वादिक पातन करने से दूर हो जाते हैं । अशुद्ध पारद को तनु नाइट्रिक अम्ल (Dilut Nitric Acid) में घुलाने से अन्य धातुएं उसमें घुल जाती हैं तथा शुद्ध पारद को निकाल कर जल से धो के कपडे से छान लेना चाहिए ।

पारद की सर्व प्रथम प्राप्ति—

भूगर्भविज्ञों के मतानुसार संसार में पारद आर्कियन से क्वार्टनरी आयु प्रदर्शित करने वाले शिलान्यूहों में पाया गया है । यह आयु एक करोड़ पचहत्तर लाख वर्ष के लगभग मानी जाती है तथा पारद अनेक प्रकार के रङ्गरूप वाले विभिन्न जातीय जलज और आग्नेय पाषाणखण्डों में व्याप्त मिलता है। उदाहरण के लिये रेणु-

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२४ रसरत्नसमुच्चये-

शिला ( Sand stone ), मृत्तिकापाषाण ( Shales ), सुधापाषाण ( lime-stone, ) स्फटिकशिला ( quartzite) आदि जलज और ज्वालामुखी की लावा आदि आग्नेय पाषाणों के नाम लिखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त उक्त उभय गुणधर्मरहित रूपान्तरितपाषाणखण्डों (Schists) में भी यह पाया जाता है, किन्तु अधिकतर आग्नेय पाषाणखण्डों के ही समीप मिलता है।

पारदीय खनिजों के जमाव का देखने से यह भी विदित होता है कि भूगर्भ में जब आग्नेय पाषाण क्रमशः शीतल होते हुए अपनी द्रवावस्था से घनावस्था में परिणत होने लगे उस समय उड़नशील खनिज जो कि उनके भीतरी भाग में विद्यमान थे वे वाष्परूप में उड़कर ऊपर के समीपवर्ती पाषाण खण्डों की दरारों में जमा हो गये । उनमें पारदीय खनिज भी अन्यतम है। सम्भवतः इसी कारण उष्ण जल के स्रोतों के समीप में पारद आजकल भी पाया जाता है।

अमेरिका के प्रसिद्धभूगर्भविज्ञ रेन्ससम ( Ransome ) और स्पर ( Spurr ) नाम के विद्वानों का विचार है कि पारद सदा ज्वालामुखी आग्नेय पाषाणों के सिलसिले में ही पाया जाता है, क्योंकि इस का अस्तित्व अधिकांश में अर्वाचीन ज्वालामुखी पाषाणों में ही पाया गया है। किन्तु इस सिद्धान्त का स्थित करने में अपवाद यह है कि स्पेन देश की बड़ाखानें जो अल्माडन नामक स्थान में विद्यमान हैं वे भूगर्भकाल के निर्णयानुसार अत्यन्त प्राचीन हैं और उनमें पारद् १३०० फीट की गहराई पर पाया जाता है। इसी प्रकार अमेरिका प्रदेश की केलिफोनिया ( California ), न्यू इड्रिया (New Idria) और न्यू अल्माडन ( New Almaden ) की खाने हैं जिनका सम्बन्ध ज्वालामुखी के उद्गम से नहीं है। इन खानों में २२०० फीट की गहराई पर पारद् मिलता है।

इस प्रकार अनेक मतभेद रहते हुए भी इस बात पर सब भूगर्भ विज्ञों का एकमत है कि पारद भूगर्भ के अन्तराल से उष्ण जल के साथ ही बाहर पृथ्वी पर प्रगट हुआ है और इसीलिये यह अपने खनिजों के साथ भूभाग के ऊपरी तल में ही अधिकतर जमा हुआ मिलता है। जिस उष्ण जल के साथ पारद निकलता है वह जल चाहे वर्षा द्वारा पृथ्वी के अन्तराल के उष्णभाग में जाकर पुनः उष्णस्रोत के रूप में बाहर निकला हो, चाहे पातालिक आग्नेय पाषाणों से निकलकर बाहर आया हो किन्तु यह अनेक प्रमाणों से सिद्ध है कि पारद् उष्ण जल के साथ ही क्षारीय घोलों में घुला हुआ पृथ्वी की ऊपरी दरारों में या खुले भूभाग में आकर प्राकृतिक पारद और पारदीय खनिज हिङ्गुल आदि के रूप में जमा हुआ है।

इसी (रसरत्नसमुच्चय) ग्रन्थ में पारद के उत्पत्ति के विषय में निम्न विचार प्रगट किये गये हैं।