Skip to content
SarvaKosh
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished362 pages

Page 99 of 362

Read in context
Page 99

प्रथमोऽध्यायः ।
९

रुद्ध्वा तत् भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत् पुटे ॥ इति र० सा० सं० ।

पूर्वजन्म कृत अच्छे कर्मों का फल है कि उत्तम वंश में जन्म हो, उसमें भी श्रेष्ठ कुशाग्र तथा आस्तिक्य बुद्धि हो और वह बुद्धि भी सम्पूर्ण भूमण्डल के ज्ञान की तुलना कर सके, फिर उस श्रेष्ठ बुद्धि से पृथ्वी को शक्ति शालिनी बनाने का यत्न करना उससे धनप्राप्ति रूप फल होता है, और धन का फल नाना प्रकार के भोग हैं, और वे भोग शरीर ही में सम्पादित होते हैं (अर्थात् शरीर द्वारा ही भोगे जाते हैं)। किन्तु वह शरीर नाशवान् है इसलिये उपर्युक्त सर्व सामग्री वृथा ही है । इस कारण धन, शरीर, तथा भोगविलासादियों को अनित्य जानकर सदा ही मुक्तिप्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिए, और वह मुक्ति सत्य ज्ञान से होती है, वह यथार्थ ज्ञान योगाभ्यास से, और योग का अभ्यास व्याधि रहित स्थिर शरीर द्वारा ही हो सकता है, इस देह की स्थिरता को बनाई रखने में मूल काष्ठ औषधियां तथा सप्तधातु स्वर्ण लोहादि कोई भी रसायन समर्थ नहीं है क्यों कि वे काष्ठादि तथा धातु औषधियां स्वयं अस्थिर प्रकृति वाली होती हैं तथा वह्नि उनका नाश कर देती है, जल से आर्द्र हो जाती हैं, सूर्य अपनी उष्णता से उन्हें जला देता है । किन्तु पारद पर किसी का भी अनिष्ट कारी प्रभाव नहीं पड़ता है अतः सब में यही उत्तम है ।

रसायनलक्षणम्— यज्जराव्याधिविध्वंसि भेषजं तद्रसायनम्। इति चरकः, ॥ ३३-३९ ॥

पारदे सर्वौषधानामन्तर्भावः—

काष्ठौषध्यो नागे नागो वङ्गेऽथ वङ्गमपि शुल्बे ।
शुल्बं तारे तारं कनके कनकं च लीयते सूते ॥ ४० ॥
अमृतत्वं हि भजन्ते हरमूर्त्तौ योगिनो यथा लीनाः ।
तद्वत्कवलितगगने रसराजे हेमलोहाद्याः ॥ ४१ ॥

काष्ठादिकमूल औषधियां सीसे में, सीसा वङ्ग में, वङ्ग ताम्र में, ताम्र रजत में तथा रजत (चांदी) सोने में और सुवर्ण पारद में विधियों द्वारा मिल जाता है, जिस तरह योगीजन श्रीशिवजी के रूप में लीन होकर अमृतत्व को प्राप्त करते हैं (अर्थात् वे शिवजी में मिलकर जन्म मृत्यु जराव्याधि, आदि