रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
प्रथमोऽध्यायः । २४
प्रथमोऽध्यायः । २४
शैलेऽस्मिञ्छिवयोः प्रीत्या परस्परजिगीषया ।
सम्पवृत्ते च सम्भोगे त्रिलोकक्षोभकारिणि ॥
विनिवारयितुं वह्निः सम्भोगं प्रेषितः सुरैः ।
कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत्कन्दरेऽनलम् ॥
अपक्षिभावसंक्षुब्धं स्मरलीलाविलोकिनम् ।
तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भुर्विरतः सुरतात्तदा ॥
प्रच्युतश्चरमो धातुर्गृहीतः शूलपाणिना ।
प्रक्षिप्तो वदने वह्नेर्गङ्गायामपि सोऽपतत् ॥
वह्निः क्षिप्तस्तया सोऽपि परिदंदह्यमानया ।
सञ्जातास्तन्मलाद्धानाद्धातवः सिद्धिदायकाः ॥
यावदग्निमुखाद्रेतो न्यपतद्भूभुवि सर्वतः ।
शतयोजननिम्नास्ते जाताः कूपास्तु पञ्च च ।
तदाप्रभृति कूपस्थं तद्रेतः पञ्चधाऽभवत् ॥
( रसरत्नसमुच्चय पूर्वखण्ड प्र० अध्याय )
इन पारदोत्पत्ति विषयक श्लोकों की प्राचीनानुमत शब्दानुकूल व्याख्या ( स्पष्ट भावार्थ ) मैने प्रकरण में लिख दी है। किन्तु प्राचीनपारदोत्पत्ति की तुलना यदि आधुनिक विज्ञान के अनुसार करनी हो तो निम्न रूप से करनी चाहिए।
इस अवतरण का तात्त्विक भावार्थ यह विदित होता है कि हिमालय में जब जड़ और चैतन्य शक्ति के अन्दर संघर्षंण होता है तब पृथ्वी के अन्तराल में आग्नेय पदार्थ ज्वालामुखों के रूपमें प्रगट होने लगते हैं। उस समय त्रैलोक्य में क्षोभ उत्पन्न करने वाला भूकम्प पैदा होता है। संसार के हिम प्रदेशों में ही प्रायः ज्वालामुखी प्रगट होते हैं। अर्थात् "शैलेऽस्मिन्" आदि प्रथम श्लोक में इसी अभिप्राय का रूपक है। जहां भूकम्प के उपरान्त ज्वालामुखी का उद्गम होता है वहां पर पृथ्वी शतधा विदीर्ण हो जाती है जिसमें से प्रथम धूम्र वर्ण की गैस निकलती है। यह वृत्तान्त प्रायः (कपोतरूपिणं प्राप्तं हिमवत् कन्दरे स्थितम्) इस रूपकालङ्कार से दिखाया है। धुएं के निकलने के पश्चात् अग्नि की ज्वाला निकलने लगती है यह (अपक्षिभावसंक्षुब्धम् ) आदि दूसरे श्लोक का तात्पर्य हो सकता है। जब ज्वालामुखी का उद्गम हो जाता है तब भूकम्प होना बन्द हो जाता है इस प्रकार का अभिप्राय "तं दृष्ट्वा लज्जितः शम्भु विरतः सुरतात्तदा" इस पद्य के साथ मिल सकता है।
जब ज्वाला मुखो के आग्नेय पाषाण क्रमशः शीतल होने लगते हैं तब उसके अन्तराल के उड़नशील खनिज उष्ण जल के साथ मिल कर वाष्परूप में ऊपर आकर शीत होने पर जम जाते हैं। इसो बात के द्योतक अन्य दो श्लोक हैं। जो
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रसरत्नसमुच्चये—
खनिज इस प्रकार निकल कर जमा होते हैं उनके जमने का क्रम डा० सी० जी केलिस प्रोफेसर इम्पीरियल कालेज लण्डन के मतानुसार यह है—सब के नीचे पातालिक आग्नेय पाषाण ग्रेनाइट ( Granite ) और उसके ऊपरी भाग में एक ओर जलज, पारद, तुरमलीन, पुखराज, वंग और टगस्टन रहते हैं तथा दूसरी ओर भारी धातु जैसे ताम्र, नाग, यशद, सुवर्ण, रजत, और रौप्यमाक्षिक आदि रहते हैं। इसका नक़्शा वे इस प्रकार बनाते हैं।
पारद के खनिज
—तुरमलीन
पुखराज
वंग
टंगस्टन
ताम्र
नाग
यशद
सुवर्ण
चांदी
माक्षिक
जो लोग ऐसी खानों को खनते हैं वे प्रायः एक के बाद दूसरे खनिज को निकाल कर लाभ उठाते हैं; सम्भवतः इसी का मूल ग्रन्थ के पाठ में (सञ्जातास्तन्मलाद्धाता- द्धातवः सिद्धिदायकाः) इस प्रकारका वर्णन है। यह भी निश्चित है कि जहां पर पारद की खाने हैं वहां पर किसी किसी स्थान पर नल के आकार के कूप भी मिलते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में भी पारद के खनिजों में जलाकार कूप मिलते हैं जिनकी समानता “शतयोजननिम्नास्ते (विस्तीर्णाः) जाताः कूपास्तु पञ्च च” इस प्राचीनोक्ति में अक्षरशः सत्य मिलती जुलती है। उन देशों में पारद के कूप २४५० फीट तक गहरे हैं। नीचे के अङ्ग्रेजी अवतरण से ज्ञात होता है कि भूगर्भ के अन्दर सौ मील की खुदाई पारद निकालने की हुई है। प्राचीन पारदोत्पत्ति के अन्दर पांच कूपों का उल्लेख है परन्तु वहां पर इस समय अठारह कूप ( Shafts ) हैं जिनसे पारद निकाला जाता है। यह सम्भव है कि उस समय में पाञ्च कूपों का ही पता लगा हो।
ITALY
"In the Montebuono mine, according to R. Rosenlecher Miocene sands overlie and conceal Nummulitic Limestone. At a depth of 100 ft. a great vertical crevice about 6 ft. wide was struck, filled with Miocene sands and clays, impregnated with cinnabar in an extremely fine state of division. In the immediately neighbouring
प्रथमोऽध्यायः । [२७]
rock are several funnel-shaped cavities, also filled with metalliferous sands and clays, the proportion of cinnabar increasing with the depth. These funnel-shaped cavities appear to bear some analogy to the vertical pipes or holes (Trajas) in gypsum at the mercury mines of Huitzuco Guerrero, Mexico. Broadly speaking, the whole deposit forms a large funnel, position of which is marked on the surface by distinct depression.”
• UNITED STATES.
“Santa Clara County—The new Almaden group of mines was discovered in Santa Clara County by two Mexicans in 1824, but the ore was not recognized as cinnabar until 1845. The large output of mercury from the mine has already been mentioned. Altogether 18 shafts have been sunk, and there are nearly 100 miles of under-ground workings, a large proportion of which have of course, caved in. The greatest depth in 1917 was 2,450 ft. below the top of mine Hill (1, 600 ft. altitude) so it is the deepest and most extensive mercury mine in the world.”
Monographs on Mineral Resources, Imperial Institute London
Mercury Ores. By Edward Halse A. R. S. M. page 45 & 75.
इन अवतरणों का प्राचीन मत के साथ मिलान करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीनों का ज्ञान भी ठीक आज कल के ज्ञान के अनुसार पूर्ण वैज्ञानिक ढङ्ग ही का था । किन्तु वह अलङ्कारिक तथा तान्त्रिक भाषा में होने के कारण विना प्रत्यक्ष किये ठीक समझ में नहीं आ सकता है। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि वैद्यवर्ग इस पारद के वैज्ञानिक वर्णन को पढ़ कर इस
“एतां रससमुत्पत्तिं यो जानाति स धार्मिकः”
आचार्योक्ति का अवश्य ही पालन करेंगे।
अब नीचे जिन जिन खनिजों से पारद निकाला जाता है उन उन खनिजों का परिगणन किया जाता है।
पारद निकालने योग्य खनिज ।
( १ ) हिङ्गुल, हंसपाद (सिनावार Cinnabar Hgs) इसके भेद उत्पत्ति तथा निर्माण और प्राप्ति का विस्तृत वर्णन आगे यथा प्रसङ्ग किया जायगा ।
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( २ ) चर्मार: Metacinnabar ( Hgs )
यह कृष्णवर्ण का खनिज है। इसका रासायनिक सङ्घठन रक्त हिङ्गुल (जपाकुसुम-सङ्काश = Bright Red Sulphide) का ही सा है। यह मृत्तिका रूप में और रवों के रूप में पाया जाता है। यह मृत्तिका रूप में अधिक पाया जाता है। रवों के रूप में इसकी कठोरता ३ है तथा विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity. ७०८१ होता है। इसको चीनी मिट्टी की कसौटी पर रगड़ने से काली लकीर खिचती है। देखने में यह धातु की सी द्युतिवाला होता है। मृत्तिकाकृति में विशिष्ट गुरुत्व कुछ कम होता है इसी को रस कामधेनु नामक रसग्रन्थ में "चर्मारः कृष्णरूपः स्यात्" इस रूप में वर्णित किया गया है।
३ हीरकद्युति = केलोमल ( Calomel Hg 2 Cl 2 )
यह हीरे के समान द्युति ( कान्ति ) वाला ( 'हीरकद्युति सङ्काशम्, रस कामधेनु ) रवेदार पारद का खनिज है। इसे मरक्युरस क्लोराइड या केलोमल कहते हैं।
प्राप्ति— यह प्राकृतिक दशा में स्पेन देश के इड्रिया ( Idria ) अल्माडन ( Almaden ) नामक स्थान में स्वल्प मात्रा में पाया जाता है। यह रवों ( कण Crystals ) के रूप में ही प्रायः मिलता है। इसके रवे बहुत ही जटिल सङ्घठन के होते हैं। इसका रङ्ग श्वेत या पाण्डु होता है। चीनी मिट्टी की कसौटी पर रगड़ने से अल्पपीताभ-श्वेत लकीर खिंचती है। इसके रवे की चमक हीरे की सी होती है। इसका विशिष्ट गुरुत्व ६०५ होता है। भारतीय रसशास्त्रियों को इस पारदीय खनिज का पूर्ण ज्ञान था। रस कामधेनु ग्रन्थ में इसका जो वर्णन लिखा है वह बहुत ही सुन्दर तथा यथार्थ है। उसमें संक्षेप से इसके विषय की प्रायः सभी बातें आगई हैं।
"हीरकद्युतिसङ्काशं प्रमाणाद्धीरकात् क्वचित्" ( रसकामधेनु पृ० ५७३ )
इस खनिज का निम्न अङ्ग्रेजी वर्णन प्राचीन मत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता है।
Calomel ( Hg 2 Cl 2 )
This is Mercurous chloride and is found at Idria and at Almaden as one of the minor mercury minerals. It occurs in crystal so often highly complex of the tetragonal system.
Lustre adamantine (हीरकद्युतिसङ्काशम्) Fracture conchoidal (प्रमाणाद्धीरकात्क्वचित्) Colour white, or yellowish grey: Streak Pale, yellowish-White, hardness 1 to 2 specific gravity 6.5 Loc. Cit. Page.
इस अवतरण के शब्द जब रस कामधेनु के अवतरण के साथ मिलाये जाते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन रस शास्त्रियों ने भली प्रकार खान पर बैठ कर नमूना