रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextप्रथमोऽध्यायः । १९
प्रत्यायाति ततः कूपं वेगतः शिवसम्भवः ।
मार्गनिर्मितगर्तेषु स्थितं गृह्णन्ति पारदम् ॥ ८७॥
इसी समय प्रथम बार मासिकधर्म स्नान की हुई और अनेक प्रकार से उत्तम आभूषणों से शोभायमान तथा अश्व पर बैठी हुई और पारे के कुएँ में झांकती हुई तरुणी को देखकर उसे पकड़ने की इच्छा से वेग करके पारद कुएँ के बाहिर निकला । वह तरुणी भी उस पारे को देखकर वेग से भागने लगी । इसी तरह पारद भी चार कोस ( योजन ) पर्यन्त उसके पीछे पीछे चलता रहा, परन्तु उस स्त्री के भाग जाने पर बड़े वेग से फिर अपने आधार भूत कुएँ में आने लगा । उस समय कुछ पारा मार्ग में बने हुए गढहों में ठहर गया । उसी पारे को वे लोग गढहों से ग्रहण करते हैं ॥ ८५—८७ ॥
अथ हिङ्गुलोत्पत्तिवर्णनम्—
पतितो दरदे देशे गौरवाद्वह्निवक्त्रतः ।
स रसो भूतले लीनस्तत्तद्देशनिवासिनः ॥
तां मृदं पातनावन्त्रे क्षिप्त्वा सूतं हरन्ति च ॥ ८८ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
अत्यन्त गुरुता ( भारीपन ) होने के कारण जो पारद अग्नि के मुख से निकल कर दरद नाम वाले देश में गिरा, तभी से वह रस वहां की पृथ्वी में लीन हो गया । उस देश के लोग दरद नाम की मिट्टी को विद्याधर नामक ऊर्ध्व पातन यन्त्र में रख कर उससे पारा निकालते हैं ॥ ८८ ॥
इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा कृतायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां
रसोत्पत्तिर्नाम प्रथमोऽध्यायः ।