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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः । ११

प्रत्यक्षेण प्रमाणेन यो न जानाति सूतकम् ।
अदृष्टविग्रहं देवं कथं ज्ञास्यति चिन्मयम् ॥ ५४ ॥
यज्ज्रया जर्जरितं कासश्वासादिदुःखविवशं च ।
योग्यं तन्न समाधौ प्रतिहितबुद्धीन्द्रियप्रसरम् ॥ ५५ ॥
बालः षोडशवर्षो विषयरसास्वादलम्पटः परतः ।
यातविवेको वृद्धो मर्त्यः कथमाप्नुयान्मुक्तिम् ॥ ५६ ॥
अस्मिन्नेव शरीरे येषां परमात्मनो न संवेदः ।
देहत्यागादूर्ध्वं तेषां तद्ब्रह्म दूरतरम् ॥ ५७ ॥
ब्रह्मादयो यतन्ते तस्मिन्दिव्यां तनुं समाश्रित्य ।
जीवन्मुक्ताश्चान्ये कल्पान्तस्थायिनो मुनयः ॥ ५८ ॥
तस्माज्जीवन्मुक्तिं समीहमानेन योगिना प्रथमम् ।
दिव्या तनुर्विधेया हरगौरीसृष्टिसंयोगात् ॥ ५९ ॥

जिस तरह संसार के सर्व प्राणी परब्रह्म परमात्मा में लीन हो जाते हैं उसी तरह रसों में राजा (श्रेष्ठ) पारद में सम्पूर्ण रस, उपरस लौहादि द्रव्य समाविष्ट हो जाते हैं, इस तरह का यह पारद शरीर को अजर और अमर बना देता है (अर्थात् परब्रह्म की उपासना से जो अजर और अमर फल प्राप्त होता है वही फल इससे है अतः पारद भी ब्रह्मस्वरूप ही है )

पारद के सेवन करने से स्थिर देह प्राप्त होने पर अभ्यास करने से गौतम महर्षि प्रतिपादित अष्टविध गुणों से युक्त यथार्थ ज्ञान को मनुष्य प्राप्त करके ब्रह्म पदको प्राप्त करता है फिर वह पुनरुत्पत्ति और वासना जनित दुःखों को प्राप्त नहीं होता है, इस तरह पारद मोक्ष देने वाला है ।

गौतमोक्त अष्टगुण, सर्वभूतदया, क्षान्तिः, अनसूया, शौच, अनायास, मङ्गलवचन, अकार्पण्य, अस्पृहा, ये हैं । तीन पादों (सत्व, रज, और तम) से युक्त अर्थात् त्रिविक्रमस्वरूप परमोत्कृष्ट ज्योतिःस्वरूप पदार्थ अपने सर्वभूतस्वरूप एक अंश (पाद) से जगत् को धारण करके स्थित है वह अमृत स्वरूप पर ब्रह्म केवल वैराग्य मात्र से प्राप्त नहीं होता है ।

‘पादोऽस्य सर्वभूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि’ इति श्रुतिः ।
‘विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्’ इति गीता ॥