रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१४ रसरत्नसमुच्चये—
प्रक्षिप्तो वदने वह्नेर्गङ्गायामपि सोऽपतत् ।
बहिः क्षिप्तस्तया सोऽपि परिदन्दह्यमानया ॥ ६४ ॥
सञ्जातास्तन्मलाधानाद्धातवः सिद्धिहेतवः ।
यावदग्निमुखाद्रेतो न्यपतद्भूरिसारतः ॥ ६५ ॥
शतयोजननिम्नांस्तान्कृत्वा कूपांस्तु पञ्च च ।
तदाप्रभृति कूपस्थं तद्रेतः पञ्चधाऽभवत् ॥ ६६ ॥
हिमालय पर्वत पर महादेव और पार्वती दोनों में प्रेम पूर्वक परस्पर जय की इच्छा से लोकत्रय को क्षुब्ध करने वाला सम्भोग कर्म प्रारम्भ हुआ, उस सम्भोग को बन्द कराने की इच्छा वाले और शिव तथा पार्वती की देह से उत्पन्न पुत्र की चाहना वाले देवताओं ने अग्नि को भेजा। कबूतर के रूप को धारण किये हुए, हिमालय की गुफा में आये हुये और कामक्रीडा को देखने वाले देव भाव से संक्षुब्ध हुए अनल (अग्नि) देव को देख कर लज्जा के कारण शिव जी सम्भोग से विरत हुए, उस समय महादेव जी के शरीर से अन्तिम धातु (शुक्र) का पात हुआ, उस धातु को शिवजी ने अग्नि के मुख में डाल दिया, बाद में वह धातु वह्नि के मुख से गङ्गा में गिर पड़ा, उस तेज को न सहन करने वाली गङ्गा ने भी उसे बाहर फेंक दिया, उस वीर्य के किट्ट भाग से सिद्धिप्रदान करने वाले अनेक रसादिक धातु उत्पन्न हुए। जिस समय अग्नि के मुख से गुरुभारयुक्त शिवजी के धातु का बहिः पतन हुआ, उस वक्त वह धातु सौ योजन गहरे पांच कुए बना कर पञ्चविध हो गया ॥ ६०—६६ ॥
अथ रसानां भेदः—
रसो रसेन्द्रः सूतश्च पारदो मिश्रकस्तथा ।
इति पञ्चविधो जातः क्षेत्रभेदेन शंभुजः ॥ ६७ ॥
रसो रक्तो विनिर्मुक्तः सर्वदोषै रसायनः ।
सञ्जातास्त्रिदशास्तेन नीरुजा निर्जरामराः ॥ ६८ ॥
रसेन्द्रो दोषनिर्मुक्तः श्यावो रूक्षोऽति चञ्चलः ।
रसायिनोऽभवंस्तेन नागा मृत्युजरोज्झिताः ॥ ६९ ॥
देवैर्नागैश्च तौ कूपौ पूरितौ मृद्भिदृषद्भिः ।
तदाप्रभृति लाकानां तौ जातावतिदुर्लभौ ॥ ७० ॥