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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः ।
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इसलिये इस पारस मणि के अन्वेषण करने के लिये कितने ही पुरुषों ने अपना समग्र जीवन दे दिया किन्तु वे उसको प्राप्त नहीं कर सके । धीरे धीरे इस निरर्थक खोज की ओर से लोगों ने मन को हटाकर ऐसी क्रियाओं के अन्वेषण में लगे जो लोहे वा पारे को चांदी या स्वर्ण में परिणत कर दे । कुछ लोग यह समझते थे कि मिश्र देश वालों को इस क्रिया का ज्ञान था जिससे वे हीन धातुओं को स्वर्ण सदृश सुन्दर धातुओं में परिणत कर देते थे । पाश्चात्य देशों में सबसे प्रथम सन् १६६६ ई० में पेरू (Peru) देश के हुवान्कावेलिका (Huancavelica) नामक स्थान में हिङ्गुल का अस्तित्व विदित हुआ और सन् १६३३ ई० में लोपेज़—सावेद्रा-बार्वा Lopez Saavedra Barba नामक व्यक्ति ने पारद निकालने के लिये अल्युडेल (Aludel मडकल़ों वालो) नामक भट्टी तैयार की। इसी भट्टी को १६४६ ई० में बुस्टामेण्ट (Bustamente) नाम के किसी रसायन शास्त्रवेत्ता ने स्पेन (Spain) देशीय पारदीयखनिज प्राप्ति के प्रसिद्ध अल्माडन (Almaden) स्थान की खानों में प्रचलित की पारद निकालने के लिये यह भट्टी दो शताब्दियों से भी अधिक समय तक उक्त दोनों देशों में प्रयुक्त होती रही । किन्तु अब नवीन उत्तम भट्टियों के बन जाने से इसका व्यवहार बन्द हो गया है ।

खनिज से पारद निकालने की विधि अत्यन्त सरल है । खनिज को खुले स्थान में फूंकते हैं जिससे हिङ्गुल का गन्धक सल्फर डाइआक्साइड (Sulphur Dioxide) में बदल जात है और पारद मुक्त हो जाता है । कभी २ हिङ्गुल को चूने के साथ मिलाकर बन्द रिटोर्ट में स्रावित करते हैं जिससे केलसियम सल्फाइड और सल्फेड बनता है तथा पारद मुक्त हो जाता है । विधिपूर्वक निकाले हुए पारद के अन्दर बहुत सी अशुद्धियां रह जाती हैं । तथा इस पारद के साथ बहुत से यन्त्रवाहित (Mechanically carried) अपद्रव्य मिले रहते हैं । इन में से कुछ तो केमोयास चमड़े के द्वारा छानने से दूर हो जाते हैं और कुछ यशद (zinc) वङ्ग (tin) सीस (Lead) सदृश पदार्थ मिले रहते हैं जो कि पारद का ऊर्ध्वादिक पातन करने से दूर हो जाते हैं । अशुद्ध पारद को तनु नाइट्रिक अम्ल (Dilut Nitric Acid) में घुलाने से अन्य धातुएं उसमें घुल जाती हैं तथा शुद्ध पारद को निकाल कर जल से धो के कपडे से छान लेना चाहिए ।

पारद की सर्व प्रथम प्राप्ति—

भूगर्भविज्ञों के मतानुसार संसार में पारद आर्कियन से क्वार्टनरी आयु प्रदर्शित करने वाले शिलान्यूहों में पाया गया है । यह आयु एक करोड़ पचहत्तर लाख वर्ष के लगभग मानी जाती है तथा पारद अनेक प्रकार के रङ्गरूप वाले विभिन्न जातीय जलज और आग्नेय पाषाणखण्डों में व्याप्त मिलता है। उदाहरण के लिये रेणु-