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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

Page 107 of 362

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Page 107

प्रथमोऽध्यायः । १७

एवंभूतस्य सूतस्य मर्त्यमृत्युगदच्छिदः ॥
प्रभावान्मानुषा जाता देवतुल्यबलायुषः ॥ ७९ ॥

सुवर्ण रजत आदि धातुओं को द्रवरूप में परिणत करने से अथवा सब धातुओं में उत्कर्ष वीर्याधान करने से पारद रस शब्द से कहा जाता है, अथवा जरा, व्याधि और मृत्यु के नाश करने में समर्थ होने से भी इसको रस कहते हैं। अभ्रक आदि आठ महारस—और गन्धकादि उपरसो में श्रेष्ठ होने से रसेन्द्र कहलाता है। शरीर को लोहे के तुल्य दृढ सिद्धि देने से अर्थात् मजबूत करने से सूत कहा जाता है। व्याधि रूपी कीचड़ के समुद्र में डूबे हुए मनुष्यों को उससे पार करने के कारण पारद कहा जाता हैं। जिसमें सब धातुओं का तेज मिश्र होकर रहता है इसलिये उसे मिश्रक भी कहते हैं। वह नाना प्रकार के रोगों को नाश करने का फल करता है। अर्थात् मिश्रक नामक पारद में सब धातुओं के गुण पाये जाते हैं। इस प्रकार से मनुष्यों की मृत्युरूप व्याधि या मृत्यु और ज्वरादि रोगों को दूर करने वाले सूत के प्रभाव से मनुष्य देवताओं के समान बल और आयु से युक्त होने लगे।

संसारस्य परं पारं दत्तेऽसौ पारदः स्मृत ॥ ७६-७९ ॥

अथ रससंस्कारकारणम्—

तान्दृष्ट्वाऽभ्यर्थितो रुद्रः शक्रेण तदनन्तरम् ।
दोषैश्च कञ्चुकाभिश्च रसराजो नियोजितः ॥ ८० ॥
तदाप्रभृति सूतोऽसौ नैव सिध्यत्यसंस्कृतः ॥ ८० ॥
जलगो जलरूपेण त्वरितो हंसगो भवेत् ।
मलगो मलरूपेण सधूमो धूमगो भवेत् ॥ ८१ ॥
अन्या जीवगतिर्दैवी जीवोऽण्डादिव निष्क्रमेत् ।
स तांश्च जीवयेज्जीवन् तेन जीवो रसः स्मृतः ॥ ८२ ॥
चतस्रो गतयो दृश्या अदृश्या पञ्चमी गतिः ।
मन्त्रध्यानादिना तस्य रुध्यते पञ्चमी गतिः ॥ ८३ ॥
इति भिन्नगतित्वाच्च सूतराजस्य दुर्लभः ।
संस्कारस्तस्य भिषजा निपुणेन तु रक्ष्येत् ॥ ८४ ॥

इस तरह मनुष्यों को अजर अमर होते देख इन्द्र के प्रार्थना करने पर महादेवजी ने उस पारद में

रस० २