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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

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प्रथमोऽध्यायः ।
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प्रतीत नहीं होता । और जिस हिमालय की कस्तूरी मृग के नाभिगत कस्तूरी से सुगन्धित कन्दराओं के गृहों में बैठी हुई किन्नरों की स्त्रियां श्रीपार्वती के शुभ विवाहोत्सव के मङ्गल गीत गाती रहतीं हैं ऐसे शुभ कैलास पर्वत पर संसार के प्रथम आराध्य भगवान् महादेव इस रूप से संसार की रक्षा के लिये विराजमान हैं जिन से ही महान् पारद रस की उत्पत्ति हुई है ॥ १६—२१ ॥

अथ रसोत्कर्षवर्णनम्—

शताश्वमेधेन कृतेन पुण्यं गोकोटिभिः स्वर्णसहस्रदानात् ।
नृणां भवेत्सूतकदर्शनेन यत्सर्वतीर्थेषु कृताभिषेकात् ॥ २२ ॥
विधाय रसलिङ्गं यो भक्तियुक्तः समर्चयेत् ।
जगत्त्रितयलिङ्गानां पूजाफलमवाप्नुयात् ॥ २३ ॥
भक्षणं स्पर्शनं दानं ध्यानं च परिपूजनम् ।
पञ्चधा रसपूजोक्ता महापातकनाशिनी ॥ २४ ॥
हन्ति भक्षणमात्रेण पूर्वजन्माघसम्भवम् ।
रोगसङ्घमशेषाणां नराणां नात्र संशयः ॥ २५ ॥
पूर्वजन्मकृतं पापं सद्यो नश्यति देहिनाम् ।
सुगन्धपिष्टसूतेन यदि शम्भुर्विलोपितः ॥ २६ ॥
अभ्रकं त्रुटिमात्रं यो रसस्य परिजारयेत् ।
शतक्रतुफलं तस्य भवेदित्यब्रवीच्छिवः ॥ २७ ॥
यश्च निन्दति सूतेन्द्रं शम्भोस्तेजः परात्परम् ।
स पतेन्नरके घोरे यावत्कल्पविकल्पनम् ॥ २८ ॥

विधि सहित किए हुए सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों से अथवा करोड़ों गौओं के दानसे और हजारों मन सोने के दान करने से तथा काशी प्रयागादि पुण्य स्थानों में स्नान करने से जो पुण्यफल प्राप्त होता है वही फल केवल मनुष्य को पारद के दर्शन से लब्ध होता है । यदि कोई पारद का शिवलिङ्ग निर्माण कर भक्तिपूर्वक अर्चन करता है तो उसको तीनों लोकों में स्थित शिवलिङ्ग पूजन का फल प्राप्त होता है । औषध रूप से पारद का सेवन, तथा स्पर्शन, दान, ध्यान और पूजन करना यह पांच तरह की बड़े २ पापों का नाश करने वाली रसेन्द्र की पूजन शास्त्रों में कही गई है । इसको शास्त्रोक्तविधि सहित औषध रूप में सेवन करने से समस्त