रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पादांशटङ्कणोपेतं मुसलीरसमर्दितम् ।
६४ रसरत्नसमुच्चये—
धान्याभ्रक को वट के मूल को छाल के काढ़े में घोटकर अथवा ताम्बूल पत्र के स्वरस में घोटकर या अडूसा और हिलमोचिका के रस में घोटकर या करेला और गण्डदूर्वा (मत्स्याक्षी) के रस में घोटकर २० पुट देने से सिन्दूर सदृश भस्म हो जाती है। केवल वट के दुग्ध में भी घोट कर २० पुट देने से भस्म हो जाती है ॥ २४–२५ ॥
अथाभ्रकसत्वपातनम्—
पादांशटङ्कणोपेतं मुसलीरसमर्दितम् ।
रुन्ध्वात्कोष्ठ्यां दृढं ध्मातं सत्त्वरूपं भवेदभ्रम् ॥ २६ ॥
अभ्रक में चतुर्थांश रूप में टङ्कण मिलाकर ताल मूली (मुसली) के रस में घोट कर कोष्ठिका यन्त्र में रख कर फूंकने से सत्व निकल आता है।
कोष्ठिका यन्त्रल०
षोडशाङ्गुलविस्तीर्णं हस्तमात्रायतं समम् ।
धातुसत्वनिपातार्थं कोष्ठिकं परिकीर्तितम् ॥ २६ ॥
प्रकारान्तर—
कासमर्द्दघनध्वानवासानां च पुनर्भुवः ।
मत्स्याक्ष्याः काण्डवल्ल्याश्च हंसपाद्या रसैः पृथक् ॥ २७ ॥
पिष्ट्वा पिष्ट्वा प्रयत्नेन शोषयेद्धर्मयोगतः ।
पलं गोधूमचूर्णस्य क्षुद्रमत्स्याश्च टङ्कणम् ॥ २८ ॥
प्रत्येकमष्टमांशेन दत्त्वा दत्त्वा विमर्दयेत् ।
मर्दने मर्दने सम्यक्शोषयेद्रविरश्मिभिः ॥ २६ ॥
पञ्चाजं पञ्चगव्यं वा पञ्चमाहिषमेव च ।
क्षिप्त्वा गोलान्प्रकुर्वीत किञ्चित्तिन्दुकतोऽधिकान् ॥ ३० ॥
पयो दधि घृतं मूत्रं सविट्कं चाजमुच्यते ।
अधःपातनकोष्ठ्यां हि ध्मात्वा सत्त्वं निपातयेत् ॥ ३१ ॥
कसौंदी, नागरमोथा, धनियां, अडूसा, और पुनर्नवा, हिलमोचिका, करेला, हंसपदी इन वस्तुओं के रस में अभ्रक को पृथक् पृथक् घोट कर सूर्य की गर्मी से सुखाले और गेहूं का चूर्ण १ पल तथा मत्स्याक्षी (गण्डदूर्वा) और सोहागा ये प्रत्येक अभ्रक से अष्टमांश लेकर घोटना चाहिए। फिर सूर्य की किरणों से सूख
द्वितीयोऽध्यायः । [६५]
जाने पर बकरी का दुग्ध, दही, घृत, मूत्र और मिंगनी (मल) ये पांच वस्तु मिलाकर या पञ्चगव्य अथवा भैंस की दुग्धादि पांच वस्तु मिलाकर एक कर्ष से अधिक मोटे गोले बनाकर अधःपातन कोष्ठिका यन्त्र में रख कर फूंकने से अभ्रक का सत्व निकल जाता है । दुग्ध, दही, घी, मूत्र और गोबर इनका मिश्रण पञ्चगव्य है ॥ २७–३१ ॥
अथ किट्टात्सत्वग्रहणम्—
कोष्ठ्यां किट्टं समाहृत्य विचूर्ण्य रवकान्हरेत् ।
तत्किट्टं स्वल्पटङ्केन गोमयेन विमर्द्य च ॥ ३२ ॥
गोलान्विधाय संशोष्य घर्मे भूयोऽपि पूर्ववत् ।
भूयः किट्टं समाहृत्य मृदित्वा सत्त्वमाहरेत् ॥ ३३ ॥
पश्चात् मूषा में से शेष अभ्रक के किट्ट को निकाल कर चूर्ण कर के उस में आठवां भाग टङ्कण और समभाग गौ का गोबर मिलाकर मर्दन करे और फिर घाम में शुष्क कर पूर्वानुसार सत्व निकाल ले, फिर भी किट्ट शेष रहे तो इसी रीति से टङ्कण और गोबर मिलाकर सत्व निकालना चाहिए ॥ ३२–३३ ॥
अथ सत्वशोधनम्—
अथ सत्त्वकणांस्तांस्तु काथयित्वाऽम्लकाञ्जिकैः ।
शोधनीयगणोपेतं मूषामध्ये निरुध्य च ॥ ३४ ॥
सम्यग्द्रुतं समाहृत्य द्विवारं प्रधमेद्द्धनम् ।
इति शुद्धं भवेत्सत्त्वं योज्यं रसरसायने ॥ ३५ ॥
बाद में अभ्रक के सत्व के कणों का खट्टी काञ्जी से क्वाथ करके फिर शोधन गण की वस्तुओं के रस में घोट कर गोले बना कर मूषा यन्त्र में बन्द कर के फूंके । इस तरह द्रुत हुए सत्व को द्वितीय वार शोधन गण की औषधियों से घोट कर गोले बनाले पश्चात् उन्हें मूषा यन्त्र में बन्द करके फूंकने से वह सत्व शुद्ध हो जाता है और रस तथा रसायन के काम में आता है ॥ ३४–३५ ॥
अथ सत्त्वानां मृदुकरणम्—
मधुतैलवसाज्येषु द्रावितं परिवापितम् ।
मृदु स्याद्दशवारेण सत्त्वं लोहादिकं खरम् ॥ ३६ ॥
अभ्रक सत्व को अग्नि संयोग से द्रवित कर के शहद, तैल, वसा और घृत में
रस० ५
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दश वार निर्वापित करने से मृदु हो जाता है। इसी तरह कठिन लोहादि धातु भी मृदु होते हैं ॥ ३६ ॥
अथाभ्रमारणम्—
पट्टचूर्णं विधायाथ गोघृतेन परिप्लुतम् ।
भर्जयेत्सप्तवाराणि चुल्लीसंस्थितखर्परे ॥ ३७ ॥
अग्निवर्णं भवेद्यावद्वारं वारं विचूर्णयेत् ।
तृणं क्षिप्त्वा दहेद्यावत्तावद्वा भर्जनं चरेत् ॥ ३८ ॥
ततः सगन्धकं पिष्ट्वा वटमूलकषायतः ।
पुटेद्विंशति वारेण वाराहेण पुटेन हि ॥ ३९ ॥
पुनर्विंशतिवाराणि त्रिफलोत्थकषायतः ।
त्रिफलामुण्डिकाभृङ्गपत्रपथ्याक्षमूलकैः ॥ ४० ॥
भावयित्वा प्रयोक्तव्यं सर्वरोगेषु मात्रया ।
सत्त्वाभ्रात्किंचिदपरं निर्विकारं गुणाधिकम् ॥ ४१ ॥
एवं चेच्छुतवाराणि पुटपाकेन साधितम् ।
गुणवज्जायतेऽत्यर्थं परं पाचनदीपनम् ॥ ४२ ॥
अभ्रक सत्व को कपड़े से छान कर या पत्थर पर चूर्ण कर के गोघृत मिला कर चूल्हे पर स्थित कटाह इत्यादि पात्र में भूने । जब तक अग्नि के समान लाल वर्ण का न हो तब तक उस सत्व का कड़ाह में घोट कर चूर्ण करता जाय या कटाह में तृण डालने से वे जलने लगे तब तक घोट २ के चूर्ण करता जाय । इस तरह सात बार भूनना चाहिए । फिर उसमें समान मात्रा में शुद्ध गन्धक डाल कर वट के मूल के कषाय या क्वाथ से घोट कर वाराह संज्ञक पुट द्वारा २० पुट देवे । प्रत्येक पुट में गन्धक मिलाना चाहिए । फिर त्रिफले के क्वाथ या कषाय से घोट कर उसी तरह २० पुट देना चाहिए । पश्चात् त्रिफला, मुण्डी, भांगरे के पत्ते और हरीतकी तथा बहेड़ा और मूली इनके रस की क्रमशः भावनां देकर सब रोगों में मात्रानुसार प्रयोग करना चाहिए । इस सत्वाभ्रक से अन्य अधिक गुण करने वाली और कोई औषधि नहीं है । इसी प्रकार यदि १०० पुट दे कर अभ्रक सत्व का पुट पाक करें तो अत्यन्त गुण कारक तथा अग्निदीपक और पाचनशक्ति बढ़ाने वाली अभ्रक भस्म हो जाती है ॥ ३७-४२ ॥