रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextप्रथमोऽध्यायः । १५
ईषत्पीतश्च रूक्षाङ्गो दोषयुक्तश्च सूतकः ।
दशाष्टसंस्कृतैः सिद्धो देहं लोहं करोति सः ॥ ७१ ॥
अथान्यकूपजः सोऽपि चञ्चलः श्वेतवर्णवान् ।
पारदो विविधैर्योगैः सर्वरोगहरः स हि ॥ ७२ ॥
मयूरचन्द्रिकाच्छायः स रसो मिश्रको मतः ।
सोऽप्यष्टादशसंस्कारयुक्तश्चातीव सिद्धिदः ॥ ७३ ॥
त्रयः सूतादयः सूताः सर्वसिद्धिकरा अपि ।
निजकर्मविनिर्माणैः शक्तिमन्तोऽतिमात्रया ॥ ७४ ॥
एतां रससमुत्पत्तिं यो जानाति स धार्मिकः ।
आयुरारोग्यसन्तानं रससिद्धिं च विन्दति ॥ ७५ ॥
शिवजी से उत्पन्न धातु क्षेत्र भेद से रस, रसेन्द्र, सूत, पारद, और मिश्रक इस तरह पांच तरह का कहलाया। रस नामक पारद सबदोषों से रहित तथा रक्त वर्ण का होता है उसके सेवन से देवता लोग अजर और अमर होगये । रसेन्द्र नामक पारद दोषों से रहित कपिशवर्ण (श्यामवर्ण) लिये हुए तथा स्पर्श में रूक्ष और देखने में अत्यन्त निर्मल और रसायन गुण देने वाला होता है। उसके सेवन से नाग जाति मृत्यु तथा बुढ़ापे से मुक्त होगई। इसके बाद नाग और इन्द्रादिक अजर अमर हुए देवताओं ने उन दोनों कुओं को 'जिनमें रस और रसेन्द्र भरा था, मिट्टी और पत्थरों से बन्द कर दिया, उसी समय से वे दोनों कुए या पारद प्राणियों के लिये दुष्प्राप्य होगये।
देखने में कुछ पीला, स्पर्श में रूक्ष और सप्तकञ्चुक तथा नागादि दोषों से युक्त सूत नाम का पारद होता है तथा अठारह संस्कारों से सिद्ध होने पर वह मनुष्य को लोह के समान मजबूत बना देता है, और अन्य कुओं से उत्पन्न रस चञ्चल और श्वेत वर्ण का होता है उसे पारद कहते हैं, वह विविध औषधियों के संयोग से, या अष्टादश संस्कार करने पर, सम्पूर्ण रोग दूर करता है। मोर के पुच्छस्थ विविध वर्ण की चन्द्राकृति की छाया वाला मिश्रक नाम का रस (पारद) होता है, वह भी अठारह संस्कारों से सिद्ध होने पर अत्यन्त सिद्धि प्रदान करता है। सूत, पारद और मिश्रक ये तीनों सूत (रस)