रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
अष्टमोऽध्यायः । २२७
अष्टमोऽध्यायः । २२७
श्रेष्ठ बनादेती है तथा चांदी को रङ्ग देती है और उसके बीजराग को भी बनाती है॥१५॥
अथ ताररक्ती—
एवमेव प्रकर्तव्या ताररक्ती मनोहरा ।
रञ्जनी खलु रूप्यस्य बीजानामपि रञ्जनी ॥ १६ ॥
हेमरक्ती की तरह वरलोह के साथ चांदी को गला कर ताररक्ती बनाते हैं, यह ताररक्ती चांदी को तथा चांदी के बीजों को भी रङ्ग देती है ॥ १६ ॥
अथ दलम्—
मृतेन वा बद्धरसेन वाऽन्यल्लोहेन वा साधितमन्यलोहम् ।
सितं च पीतत्वमुपागतं तद्दलं हि चन्द्रानलयोः प्रसिद्धम् ॥१७॥
भस्महुए पारद अथवा निगडीकरण क्रिया द्वारा संयमित ( बद्ध ) पारद के साथ या किसी अन्य लोह आदि धातु के साथ सिद्ध की हुई कोई धातु जब श्वेत वर्ण की होजाती है तब उसको चन्द्रदल कहते हैं और जब वह पीतवर्ण की होजाती है तब उसको अग्निदल कहते हैं ॥ १७ ॥
अथ अन्यविधदलम्—
आमासकृतबद्धेन रसेन सह योजितम् ।
साधितं वाऽन्यलोहेन सितं पीतं च तद्दलं ॥ १८ ॥
एक मास तक रस को निगडीकरण क्रिया द्वारा बद्ध करके उस (बद्ध हुए) के साथ या उसकी भस्म के साथ या किसी अन्य लोह के साथ सिद्ध की हुई किसी धातु को श्वेत होनेपर सितदल और पीत होने पर पीतदल कहते हैं ॥१८॥
अथ शुल्वनागम्—
माक्षिकेण हतं ताम्रं दशवारं समुत्थितम् ।
तद्वद्विशुद्धनागं हि द्वितयं तच्चतुष्पलम् ॥ १६ ॥
नीलाञ्जनहतं भूयः सप्तवारं समुत्थितम् ।
इति संसिद्धमेतद्धि शुल्वनागं प्रकीर्त्यते ॥ २० ॥
शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ शुद्ध ताम्र की भस्म बनाकर उसको उत्थापित करें, इस तरह फिर उस उत्थापित ताम्र की शुद्धस्वर्ण माक्षिक के साथ भस्म बनाकर उसको पुनः उत्थापित करें इसी प्रकार से यह क्रिया दसवार करनी चाहिए । शुद्ध नाग को भी शुद्धस्वर्णमाक्षिक के साथ भस्म करके उत्थापित करें इस तरह
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इसको भी दसवार भस्म बनाकर उत्थापित करना चाहिए। पश्चात् इस नाग और ताम्र को चारपलकी मात्रा में ग्रहणकर नीलाञ्जन के साथ भस्म करके उत्थापन करें। इस तरह भस्म करके सात वार उत्थापन करना चाहिए। इस क्रिया से शुद्ध नाग और ताम्र को शुल्बनाग कहते हैं ॥ १९-२० ॥
अथ शुल्बनागगुणाः—
सान्निस्तेन सूतेन्द्रो वदने विधृतो नृणाम् ।
निहन्ति मासमात्रेण मेहव्यूहं विशेषतः ॥ २१ ॥
पथ्याशनस्य वर्षेण पलितं वलिभिः सह ।
गृध्रदृष्टिर्लसत्पुष्टिसर्वारोग्यसमन्वितः ॥ २२ ॥
इस शुल्बनाग के साथ पारद की भस्म बना करके गोली बनाकर एक मास तक मुख में धारण करने से मनुष्यों के बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं, इसी तरह जो मनुष्य पथ्य का पालन करता हुआ एक वर्ष तक इस गोली को मुख में धारण करता रहे तो उसके वली (युवावस्था में ही मुख तथा अन्य अङ्ग के चर्म में झुर्रियों का पड़ना) और पलित (असमय में बालों का सफेद होना) रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उस मनुष्य की अवलोकन शक्ति (दृष्टि) गृध्र के समान बढ़ जाती है, शरीर पुष्ट हो जाता है, तथा उसका शरीर सब तरह से नीरोग होजाता है ॥ २१-२२ ॥
अथ पिञ्जरी—
लोहं लोहान्तरे क्षिप्तं ध्मातं निर्वापितं द्रवे ।
पाण्डुपीतप्रभं जातं पिञ्जरीत्यभिधीयते ॥ २३ ॥
एक धा को अन्य धातु के साथ मिलाकर अग्नि में विद्रुत करके किसी त्रिफला इत्यादि के क्वाथ में बुझाने ने से यदि वह धातु पाण्डुवर्ण लिये हुई पीत वर्ण की हो जाय तब उसको पिञ्जरी कहते हैं ॥ २३ ॥
अथ चन्द्रार्कम्—
भागाः षोडश तारस्य यथा द्वादश भास्वतः ।
एकत्रावर्तितास्तेन चन्द्रार्कंमिति कथ्यते ॥ २४ ॥
चांदी १६ भाग और ताम्र १२ भाग लेकर दोनों को अग्नि में विद्रुत करके घोटकर जो रस तैयार होता है उसको चन्द्रार्क कहते हैं ॥ २४ ॥