रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
षष्ठोऽध्यायः । २०७
षष्ठोऽध्यायः । २०७
स्पर्शानात्प्राप्यते मुक्तिरिति सत्यं शिवोदितम् ।
आग्नेय्यां श्रीअघोरेण मन्त्रराजेन चार्चयेत् ॥ २१ ॥
एक सहस्रकरोड़ शिवलिङ्गों की यथाविधि पूजन करने से जो फल होता है उससे भी करोड़ों गुना अधिक फल रसलिङ्ग की पूजन करने से प्राप्त होता है । हजारों ब्रह्महत्याओं से तथा लाखों गोहत्याओं से जो पाप उत्पन्न होता है वह केवल रसलिङ्ग के दर्शन कर लेने से क्षण भर में नष्ट हो जाता है । श्रीशिवजी ने कहा है कि इस लिङ्ग के स्पर्श करने से मुक्ति प्राप्त होती है, यह सत्य है । अग्निकोण में रसलिङ्ग की स्थापना करके सब मन्त्रों में प्रधान जो अघोरमन्त्र(१) है उससे उसकी पूजन करनी चाहिए ॥ १९-२१ ॥
ध्यानम्—
अष्टादशभुजं शुभ्रं पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ।
प्रेतारूढं नीलकण्ठं रसलिङ्गं विचिन्तयेत् ॥ २२ ॥
तस्योत्सङ्गे महादेवीमेकवक्त्रां चतुर्भुजाम् ।
अक्षमालाङ्कुशं दत्ते वामे पाशाभयं शुभम् ॥
दधतीं तप्तहेमाभां पीतवस्त्रां विभावयेत् ॥ २३ ॥
रसलिङ्ग का ध्यान—जिनके १८ भुजाएं हैं और जिनका गौरवर्ण हैं तथा जिनके ५ मुख और तीन नेत्र हैं और प्रेत (मृतक) के ऊपर आरूढ़, नीलकण्ठ-वाले ऐसे महादेव जी का रसलिङ्ग में अपना ध्यान बैठाना चाहिए, अर्थात् यह रसलिङ्ग एक तरह से शिवस्वरूप ही है और शिवस्वरूप उस रसलिङ्ग की प्रतिमा की गोद में अद्वितीयमुखवाली तथा चार भुजाओं से शोभायमान, दक्षिणहस्त में रुद्राक्षमाला और अङ्कुश और वामहस्त में शुभ पाश धारण की हुई और एक हस्त से भक्तजनों को शुभ अभयप्रदान करती हुई, सन्तप्त सुवर्ण की कान्ति के समान दैदीप्यमान एवं पीतवस्त्र धारण की हुई महादेवी श्री पार्वती का ध्यान करना चाहिए ॥ २२-२३ ॥
देवीपूजनमन्त्रम् ।
"वाङ्मयी श्रीः कामराजशक्तिबीजं रसाङ्कुशा-
( १ ) अघोरमन्त्रः-अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च ।
सर्व्वतः सर्व्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः ॥
२०८ रसरत्नसमुच्चये—
य नमो" द्वादशार्णेषा ज्ञेया विद्या रसाङ्कुशा ॥ २४ ॥
अनया पूजयेद्देवीं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
नन्दीभृङ्गीमहाकालकुलीरान्पूर्वदिक्क्रमात् ॥ २५ ॥
पूजयेन्नाममन्त्रैश्च प्रणवादिनमोन्तकैः ।
एवं नित्यार्चनं तत्र कर्तव्यं रससिद्धये ॥ २६ ॥
"ॐ वाग्वायीश्रीः" इत्यादि २४ वें श्लोक में कहे मन्त्र का उच्चारण करते हुए गन्ध, पुष्प, अक्षत, नैवेद्य, दीप आदि से श्री पार्वती देवी की पूजन करे पश्चात् यथाक्रम से रसलिङ्ग के पूर्व दिशा में नन्दी, पश्चिम में भृङ्गी, उत्तर में महाकाल और दक्षिण में कुलीर गण की स्थापना करके इनके नाम के आदि में ॐकार तथा अन्त में नमः-शब्द लगाकर (जैसे ॐ नन्दिने नमः) मन्त्र का उच्चारण करते हुए चारों की पूजन करनी चाहिए । इस तरह रससिद्धि की प्राप्ति के लिये उस रस मण्डप में सदा पूजन करनी चाहिए ॥ २४-२६ ॥
अथ कुम्भस्थापनादिशिष्यदीक्षादानविधिः—
रसविद्या शिवेनोक्ता दातव्या साधकाय वै ।
यथोक्तेन विधानेन गुरुणा मुदितात्मना ॥ २७ ॥
सुमुहूर्ते सुनक्षत्रे चन्द्रताराबलान्विते ।
कलशं तोयसम्पूर्णं हेमरत्नफलैर्युतम् ॥ २८ ॥
स्थापयेद्रसलिङ्गाग्रे दिव्यवस्त्रेण वेष्टितम् ।
गन्धपुष्पाक्षतैर्धूपनैवेद्यश्च सुपूजयेत् ॥ २९ ॥
पूजान्ते हवनं कुर्याद्योनिकुण्डे सुलक्षणे ।
तिलाज्यैः पायसैः पुष्पैः शतपुष्पादिकैः पृथक् ॥ ३० ॥
अघोरेण रसाङ्कुश्या होमान्ते शिष्यमाह्वयेत् ।
कालिनीशक्तिसंयुक्तं रससिद्धिपरायणम् ॥ ३१ ॥
यह रसविद्या श्रीशिवजी ने कही है । इस विद्या को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले साधक को प्रसन्नचित्त गुरु द्वारा शास्त्रोक्तविधि के अनुसार शुभ मुहूर्त, शुभ नक्षत्र तथा शुभचन्द्रबल और शुभताराबल के समय में पूजन हवनादि करके प्रदान करनी चाहिए ।
**पूजनविधि—**उपर्युक्त शुभ दिन में जल से भरा हुआ और सुवर्ण,
षष्ठोऽध्यायः। २०९
रत्न, फल पुष्पों से युक्त दिव्यवस्त्र से वेष्टित (ढका हुआ) एक कलश रसलिङ्ग के सामने स्थापित करके उसको गन्ध, पुष्प, अक्षत और नैवेद्य से अच्छी प्रकार जन करनी चाहिए। फिर पूजन के पश्चात् योनि के समान आकार वाले उत्तम कुण्ड में तिल, घृत, क्षीरान्न, पुष्प, क्षौफ इत्यादि पृथक् २ पदार्थों के द्वारा अघोर रसाङ्कुशीमन्त्र का उच्चारण करते हुए अथवा श्रो अघोरमन्त्र से रसा-ङ्कुशी देवी के निमित्त हवन करना चाहिए। होम हो जाने के पश्चात् वक्ष्यमाण-लक्षणों से युक्त कालिनीशक्ति से युक्त और रस की सिद्धि करने में परायण शिष्य को समीप बुलाना चाहिए ॥ २७-३१ ॥
अथ कालिनीलक्षणम्—
यस्यास्तु कुञ्चिताः केशाः श्यामा या पद्मलोचना ।
सुरूपा तरुणी भिन्ना विस्तीर्णजघना शुभा ॥ ३२ ॥
सङ्कीर्णहृदया पीनस्तनभारेण नम्निता ।
चुम्बनालिङ्गनस्पर्शकोमला मृदुभाषिणी ॥ ३३ ॥
अश्वत्थपत्रसदृशयोनिश्रदेशसुशोभिता ।
कृष्णपक्षे पुष्पवती सा नारी कालिनी स्मृता ॥
रसबन्धे प्रयोगे च उत्तमा सा रसायने ॥ ३४ ॥
जिस स्त्री के घुंघरीले बाल हों और जो श्याम अङ्ग की या सोलह वर्ष की हो तथा कमल के समान विशाल और मनोहर नेत्रों से शोभायमान, सुन्दर लावण्ययुक्त, युवती (यौवनमदोन्मत्त) और प्रस्फुटित योनिरवाली और विस्तीर्ण जंघाओं वाली, शुभलक्षणों से युक्त, संकीर्ण (प्रसन्न) हृदय वाली और जो बड़े २ स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई हो तथा चुम्बन, आलिङ्गन और स्पर्श में कोमल प्रतीत होने वाली, मधुर आलाप (भाषण) शील तथा जिस का योनि-प्रदेश पीपल के पत्ते की रचना के समान सुशोभित हो और जो कृष्णपक्ष में रजस्वला होती हो वह स्त्री कालिनी कहलाती है। कालिनी स्त्री रस के बन्धन करने में, प्रयोग में और रसायन में उत्तम होती है ॥ ३२-३४ ॥
अथ कालिन्यभावे तदनुकल्पविधिः—
तदभावे सुरूपा तु या काचित्तरुणाङ्गना ।
तस्या देयं त्रिसप्ताहं गन्धकं घृतसंयुक्तम् ।
रस० १४
२१० रसरत्नसमुच्चये-
कर्षैकैकं प्रभाते तु सा भवेत्कालिनीसमा ॥ ३५ ॥
एवं शक्तियुतो योऽसौ दीक्षयेत्तं गुरुत्तमः ।
सुस्नातमभिषिञ्चेत् मन्त्रेण कलशोदकैः ॥ ३६ ॥
अघोरामङ्कुशीं विद्यां दद्याच्छिष्याय सद्गुरुः ।
यथाशक्त्या सुशिष्येण दातव्या गुरुदक्षिणा ॥ ३७ ॥
अथाज्ञया गुरोर्मन्त्रं लक्षं लक्षं पृथग्जपेत् ।
“ॐ ह्रां ह्रीं हम् अघोरतरप्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं हैं हौं हम् अघोराय फट्” इममघोरमन्त्रन्तु
“ओम् कामराजशक्तिवीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्यां रसाङ्कुशाम्” ॥
अनया पूजयेद्देवीं शक्तिमङ्कुशविद्यया ॥ ३८ ॥
यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली कालिनी स्त्री न मिल सके तो सुन्दररूपवाली किसी भी तरुण स्त्री को २१ दिन तक एक २ कर्ष शुद्ध गन्धक घृत के साथ प्रातः सेवन कराने से वह स्त्री कालिनी के समान सर्व गुणों से युक्त हो जाती है जो शिष्य इस कालिनी स्त्री के साथ दीक्षाग्रहण करने के योग्य हो तो उत्तम गुरु उसको दीक्षित करे । प्रथम स्नान किये हुए शिष्य को गुरु कलश के जल से मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अभिषिक्त करे, फिर सद्गुरु शिष्य को अघोर और अङ्कुशी विद्या का उपदेश दे, और अपनी शक्ति के अनुसार दीक्षा के पश्चात् गुरू जी को दक्षिणा दे कर फिर गुरुजी की आज्ञा से दोनों मन्त्रों का पृथक २ एक लाख जप करना चाहिए। इस अंकुशी विद्या(१) के द्वारा शक्तिस्वरूप देवी का पूजन करे ॥ ३५-३८ ॥
तत्र होमविधिः—
दशांशं जुहुयात्कुण्डे त्रिकोणे हस्तमात्रके ।
जातिपुष्पं त्रिमध्वक्तं पूर्णान्ते कन्यकार्चनम् ॥ ३९ ॥
पूजन करने के पश्चात् एक हाथ चौड़ा त्रिकोण के आकार वाला एक हवन का
( १ ) मूलपाठ में मन्त्र का यह स्वरूप लिखा है । ॐ ह्रां ह्रीं हूम, अघोर तर प्रस्फुट २ प्रकट २ कह २ शमय २ जात २ दह २ पातय २ ॐ ह्रीं ह्रौं हौं हूम, अघोराय फट् इममघोरमन्त्रन्तु ॐ कामराजशक्तिबीजरसाङ्कुशायै आज्ञया विद्या रसाङ्कुशाम् ।