रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
नवमोऽध्यायः ।
नवमोऽध्यायः ।
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यस्मिन्निपतति सूतः प्रोक्तं तद्दीपिकायन्त्रम् ॥ १३ ॥
उपर्युक्त विधि से कच्छप यंत्र बनाकर उसमें एक मिट्टी का खर्पर रख कर उसमें एक दीपिका या मूषा अथवा सकोरा रख देना चाहिए, इस सकोरे में पारद भर दें, फिर अग्नि के प्रभाव से पारद उस दीपिका से कच्छप यंत्र में उड़ कर गिर जाता है, इसको दीपिकायंत्र कहते हैं ॥ १३ ॥
अथ ढेकीयन्त्रम्—
भाण्डकण्ठादधश्छिद्रे वेणुनालं विनिक्षिपेत् ।
कांस्यपात्रद्वयं कृत्वा सम्पुटं जलगर्भितम् ॥ १४ ॥
नलिकास्यं तत्र योग्यं दृढं तच्चापि कारयेत् ।
युक्तद्रव्यैर्विनिक्षिप्तः पूर्वं तत्र घटे रसः ॥ १५ ॥
अग्निना तापितो नालात्तोये तस्मिन् पतत्यधः ।
यावदुष्णं भवेत्सर्वं भाजनं तावदेव हि ।
जायते रससन्धानं ढेकीयन्त्रमितीरितम् ॥ १६ ॥
एक मिट्टी के बड़े भाण्ड में या घड़े में कुछ (स्वेदनोपयोगी) औषधियों (क्षार, अम्ल इत्यादि) के साथ घोटे हुए पारद का लेप करके उस भाण्ड को सुखा लेना चाहिए । पश्चात् उस भाण्ड की ग्रीवा से कुछ नीचे (पास ही) एक छिद्र बनाकर उसमें बांस की नली का एक भाग प्रविष्ट कर भाण्ड का मुख तथा छिद्र के आस पास कपड़मिट्टी कर देना चाहिए । फिर दो कांस्य के पात्रों (कटोरों) का परस्पर सन्धिबन्धन करके ऊपर के पात्र में एक छिद्र बनाकर इसमें उस बांस की नली का दूसरा भाग प्रविष्ट करके मजबूती से सन्धिबन्धन कर देना चाहिए, फिर इस भाण्ड को आसानी से चूल्हे पर चढाकर नीचे आग जलादे, अग्नि के ताप से भाण्ड के अन्दर औषधियों के साथ घोटकर लिप्त किया हुआ पारद उड़कर उस बांस की नलिका में होता हुआ कांसे के पात्र के जल में गिर जायगा । सम्पूर्ण भाण्ड के प्रतप्त हो जाने पर प्रायः सब पारा उड़ जाता है, इसको ढेकी यन्त्र कहते हैं ॥ १४-१६ ॥
अथ जारणायन्त्रम्—
लोहमूषाद्वयं कृत्वा द्वादशाङ्गुलमानतः ।
ईषच्छिद्रान्वितामेकां तत्र गन्धकसंयुताम् ॥ १७ ॥
२५० रसरत्नसमुच्चये—
मूषायां रसयुक्तायामन्यस्यां तां प्रवेशयेत् ।
तोयं स्यात्सूतकस्याध ऊर्ध्वाधो वह्निदीपनम् ॥ १८ ॥
१२ अङ्गुल लम्बी दो लोहे की मूषा बना कर एक मूषा में कुछ छिद्र बनवा कर उस में गन्धक भर दें, फिर इस गन्धक युक्त मूषा को पारद से भरी हुई द्वितीय मूषा के अन्दर रख देवे ( पारद जिसमें भरना हो उसको कुछ बड़ी बनवाना चाहिए ) पश्चात् इन दोनों मूषा को एक जल से भरे हुए भाण्ड में रख कर उस भाण्ड को चूल्हे पर चढाकर अग्नि जला देना चाहिए । इसको जारणा यंत्र कहते हैं ॥ १७-१८ ॥
अथ जारणायन्त्रस्य प्रकारान्तरम्—
रसोनकरसं भद्रे यत्नतो वस्त्रगालितम् ।
दापयेत्प्रचुरं यत्नादाप्लाव्य रसगन्धकौ ॥ १९ ॥
स्थालीकायां पिधायोर्ध्वं स्थालीमन्यां दृढां कुरु ।
सन्धिं विलेपयेद्यत्नान्मृदा वस्त्रेण चैव हि ॥ २० ॥
स्थाल्यन्तरे कपोताख्यं पुटं कर्षाग्निना सदा ।
यन्त्रस्याधः करीषाग्निं दद्यात्तीव्राग्निमेव वा ॥ २१ ॥
एवं तु त्रिदिनं कुर्यात्ततो यन्त्रं विमोचयेत् ।
तप्तोदके तप्तचुल्ल्यां न कुर्याच्छीतलां क्रियाम् ॥ २२ ॥
न तत्र क्षीयते सूतो न च गच्छति कुत्रचित् ।
अनेन च क्रमेणैव कुर्याद्गन्धकजारणम् ॥ २३ ॥
हे पार्वति ! एक स्थाली के अन्दर पारद और गन्धक दोनों भर कर वस्त्र से छाने हुए लहसुन के पानी (स्वरस) से उन दोनों को खूब भिगोना ( आप्लावित करना) चाहिए । फिर एक शराव से रस तथा गन्धक को बन्द करके ऊपर एक और स्थाली ढककर दोनों स्थालियों की वस्त्र तथा कपड़मिट्टि से सन्धि अच्छी तरह बन्दकर के यंत्र के नीचे तेज आंच दें तथा यंत्र के ऊपर की स्थाली के ऊपर भी उपलों की आंच से कपोत (१)पुट देना चाहिए, इस तरह तीन दिन
( १ ) कपोतपुटलक्षणम्—
यत्पुटं दीयते खाते अष्टसङ्ख्यैर्वनोपलैः ।
कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ॥ १ ॥
नवमोऽध्यायः ।
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तक अग्नि देना चाहिए । तीसरे दिन के पश्चात् उष्ण चूल्हे पर गरम जल में यन्त्र को रख कर खोलना चाहिए । यंत्र को शीतल करके नहीं खोलें। इसी क्रम से पारद के साथ गन्धक का जारण करना चाहिए । यह जारणयंत्र का दूसरा स्वरूप है ॥ १९-२३ ॥
अथ विद्याधरयन्त्रम्—
यन्त्रं विद्याधरं ज्ञेयं स्थालीद्वितयसम्पुटात् ।
चुल्लीं चतुर्मुखीं कृत्वा यन्त्रभाण्डं निवेशयेत् ॥ २४ ॥
तत्रौषधं विनिक्षिप्य निरुन्ध्याद्भाण्डकाननम् ।
यन्त्रं विद्याधरं नाम तन्त्रज्ञैः परिकीर्त्तितम् ॥ २५ ॥
दो मिट्टी की स्थालियों को परस्पर कपड़मिट्टी द्वारा बन्द करने की क्रिया को विद्याधर यंत्र कहते हैं। विधि-एक चार मुख वाला चूल्हा बना कर उस पर औषधादिक से भरा हुआ एक मिट्टी का भाण्ड रखना चाहिए, फिर इस भाण्ड पर एक दूसरा भाण्ड रखकर नीचे के भाण्ड के मुख को ऊपर रखे हुए भाण्ड के तल के साथ कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देते हैं, फिर अग्नि जलाते हैं। इसको रसशास्त्र के पण्डितों ने विद्याधरयंत्र कहा है ॥ २४-२५ ॥
अथ सोमानलयन्त्रम्—
ऊर्ध्वं वह्निरधश्चापो मध्ये तु रससङ्ग्रहः ।
सोमानलमिदं प्रोक्तं जारयेद्गगनादिकम् ॥ २६ ॥
एक स्थाली के अन्दर जल भर कर उसमें पारद से युक्त मूषा रखकर उस स्थाली के मुख को शराव से बन्द करके कपड़मिट्टी कर देते हैं । पश्चात् उस शराव पर उपलों की आँच देते हैं, इस यंत्र को सोमानल यंत्र कहते हैं। क्यों के नीचे सोम (जल) भरा रहता है, बीच में मूषा के अन्दर रस का संग्रह रहता है, ऊपर अग्नि जलाते हैं अतः इसका नाम सोमानल यंत्र है। पारद के साथ मूषा में अभ्रक आदि रखकर इससे जारण करते हैं ॥ २६ ॥
अथ गर्भयन्त्रम्—
गर्भयन्त्रं प्रवक्ष्यामि पिष्टिकाभस्मकारकम् ।
चतुरङ्गुलदीर्घाञ्च त्र्यङ्गुलोन्मितविस्तराम् ॥ २७ ॥
मृण्मयीं सुदृढां मूषां वर्तुलां कारयेन्मुखम् ।
२५२ रसरत्नसमुच्चये—
लोणस्य विंशतिर्भागा भाग एकस्तु गुग्गुलाः ॥ २८ ॥
सुश्लक्ष्णं पेषयित्वा तु वारं वारं पुनः पुनः ।
मूषालेपं दृढं कृत्वा लवणाङ्घ्रीमृदम्बुभिः ॥ २९ ॥
कर्षेत्तुषाग्निना भूमौ स्वेदयेन्मृदु मानवित् ।
अहोरात्रं त्रिरात्रं वा रसेन्द्रो भस्मतां व्रजेत् ॥ ३० ॥
नष्टपिष्ट किये हुए पारद की भस्म बनाने के लिये गर्भ यंत्र का वर्णन करते हैं। चार अङ्गुल लम्बी और तीन अङ्गुल चौड़ी मिट्टी की गोल मुखकी दृढ मूषा बनवानी चाहिए, फिर बीस भाग नमक और एक भाग गुग्गुल, दोनों को नमक से आधे भाग मिट्टी तथा जल के साथ घोटकर उस मूषा में लेप करना चाहिए, फिर उस मूषा के अन्दर पारद डालकर उसका मुख बन्दकर देवे। सूखनेके बाद मूषा को पृथ्वी में गाड़कर उसके ऊपर जंगली उपलों की अग्नि देकर एक दिन तक अथवा तीन दिन तक स्वेदन करना चाहिए। प्रायः अग्नि यदि तीन दिन तक देना हो तो मृदु अग्नि जलावे। और यदि एक दिन रात में पाक करना हो तो तीव्र आंच देवे, इस को गर्भयंत्र कहते हैं ॥ २७-३० ॥
अथ हंसपाकयन्त्रम्—
खर्परं सिकतापूर्णं कृत्वा तस्योपरिन्यसेत् ।
अपरं खर्परं तत्र शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ३१ ॥
पञ्चक्षारैस्तथा मूत्रैर्लवणं च विडं ततः ।
हंसपाकं समाख्यातं यन्त्रं तद्वार्त्तिकोत्तमैः ॥ ३२ ॥
एक मिट्टीके खर्पर (कुण्डा) को वालुका (रेते) से भरकर ऊपरसे दूसरा खर्पर रख कर ढक देते हैं, और इस में पारद को (१)पांचोक्षार, आठों (२)प्रकार के मूत्र तथा लवण विशेष कर विड़लवण इत्यादि पदार्थों के साथ पाक करते हैं। इस यंत्र को रसपरिभाषाकार पण्डितों ने हंसपाक यन्त्र कहा है ॥ ३१-३२ ॥
( १ ) यवमुष्ककसर्जानीं पलाशतिलयोस्तथा ।
क्षारैस्तु पञ्चभिः प्रोक्तः पञ्चक्षाराभिधोगणः ॥
( २ ) सैरिभाजाविकरभगोखरद्विपवाजिनाम् ।
मूत्राणीति भिषग्वर्यै र्मूत्राष्टकमुदाहृतम् ॥