रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context२० रसरत्नसमुच्चये—
पारदीयविमर्शः—
हमारे प्राचीन आचार्यों ने जिस विषय के ऊपर गवेषणा करके जो कुछ सूत्र रूप में लिख दिया वह अक्षरशः सत्य है। उनके ज्ञान को आजकल के नवयुग के प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक अथक परिश्रम करने पर भी अभीतक नहीं प्राप्त कर सके हैं। बहुत से सत्यप्रिय वैज्ञानिकों ने हमारे आचार्यों के सूत्राशयों को प्रत्यक्षादिकप्रमाणों से स्वयं प्रत्यक्ष करके सिद्ध करलेने पर अन्तः करण से उनकी चरण चञ्चरीकता को स्वीकार की है तथा उनकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा भी की है। इसके कई एक उदाहरण हैं। हमारे ऋषि महर्षि आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक इन तीनों प्रकार के ज्ञान के यथार्थ विज्ञानी थे। इस विषय में प्रायः वर्तमान समय के सब देशके विद्वानों का एक मत है किन्तु उन प्राचीन महर्षियों की शिष्य परम्परा के भी पश्चात् उप शिष्य परम्परा ने उन के सूत्रों का इस प्रकार की अलङ्कारिकसंस्कृत भाषा में वर्णन किया कि जिसके फलस्वरूपमें आधुनिक संस्कृत साहित्य के विद्वानों ने उन सूत्रस्थ द्रव्यों की विज्ञानता को खोकर केवल आप्तोक्त ही मानकर शनैः शनैः अपने शेष विज्ञान सूर्य को भी अपने आप अज्ञानाम्बर से ढक दिया। उधर आजकल के पाश्चात्य विद्वानों ने हमारे ही महर्षियों के सूत्रों के तत्व को भलीभांति समझ कर उसी के आधार पर प्रत्येक पदार्थ का अन्वेषण करना प्रारम्भ कर दिया जिसका फल यह निकला कि गुरुओं
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः॥ इति मनु० अ० २
को शिष्य बनाकर पाश्चात्य विद्वानों ने अपने मस्तक को ऊंचा उठा लिया। इतना होने पर भी आजकल हम लोग अपने महर्षियों के इन
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम्।
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ ( इति मनु० अ० २ )
श्लोकप्रतिपादित वचनों का सर्वथा अनादर करके खोये हुए अपने ही विज्ञान भास्कर के उदय के लिये इतस्ततः मनसा, वाचा, कर्मणा इन में से किसी एक भी उद्योग को नहीं कर रहे हैं। अस्तु "सब दिन रहत न एक समान, इस लोकोक्ति के अनुसार अब दैव ही गाढ निद्रा में सोये हुए हम लोगों के ऊपर से अज्ञान रूपी चादर को खींच रहा है। इससे आशा है कि वह दिन अब शीघ्र ही आयगा जब कि हमारे विशाल भारत में विज्ञान दिवाकर प्रतिदिन उदित हुआ करेगा। हमारा वैद्यक व्यवसाय सम्पूर्ण जगत् की रक्षा के लिये ही है जैसे कि कहा है—नात्मार्थं नापिकामार्थमथ भूतदयाम्प्रति ।