रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context१२ रसरत्नसमुच्चये—
व्याधि, जरा, मरण आदि अनेक कष्टों से आक्रान्त तथा क्षण में नाश होने वाले इस देह से किसी तरह से भी वह सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रसिद्ध ब्रह्म कभी भी ध्यान गम्य नहीं हो सकता है। इसी को प्रकारान्तर से कहते हैं—जो निर्मल है और मन का भी विषय न होने वाला है किन्तु योग से प्राप्त होने वाला है ऐसे तत्त्वस्वरूप ब्रह्म को देहसिद्धि के बिना इस क्षणविध्वंसी स्थूल शरीर से कौन ऐसा व्यक्ति है जो प्राप्त कर सके ?
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह,
ब्रह्मज्ञानोपाय निम्न हैं—यागानुष्ठानों से, अन्न वस्त्रादि के दान से, तपश्चर्या से, वेदपाठ से, दम से, सत्पुरुषों के समान सदाचरण करने से, और योग से, अत्यन्त प्रचुर तथा सर्वोत्तम ब्रह्मज्ञानरूप आत्मसिद्धि प्राप्त होती है ।
'निग्रहो बाह्यवृत्तीनां दम इत्यभिधीयते'
सरस्वती दृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् । तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥
तस्मिन्देशे य आचारः पारम्पर्य्यक्रमागतः। वर्णानां सान्तरालानां स सदाचार उच्यते॥
साधवः क्षीणदोषाश्च सच्छन्दः साधुवाचकः । तेषामाचरणं यत्तु सदाचारः स उच्यते॥
दोनों भ्रुकुटियों के बीच में स्थित जो अग्नि, विद्युत् और सूर्य के समान जगत् को प्रकाशित करने वाला उत्कृष्ट ज्योतिः स्वरूप परब्रह्म है वह ज्ञान चक्षुयुक्त किसी २ मनुष्य को प्रकाशित होता है ।
केवल नित्यानन्दस्वरूप, सर्वदा एकरस, और अनादि, तर्क वितर्कादि कल्पों से रहित स्वभाव वाला, समग्र क्लेशों से रहित, शान्तस्वरूप, सब के जानने योग्य तथा आत्मा ही में मनन होने वाला, ज्योतिः स्वरूप ब्रह्म है, ऐसे ब्रह्म में मन को निविष्ट कर, निखिल जगत् को उस ब्रह्म से व्याप्त और प्रकाश युक्त देखता हुआ शुभाशुभ कर्मों से युक्त होकर मनुष्य इसी संसार में ब्रह्मपद को प्राप्त कर लेता है। उस ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष स्वजनानुराग और परिजनद्वेष से रहित, शुद्ध आचार-युक्त मिथ्याभाषणादि रहित और सब में समदर्शी होते हैं और अमृत स्वरूप ब्रह्मस्वभाव को प्राप्त पुरुष अणिमादि अष्टसिद्धियों से युक्त देदीप्यमान देहवाले, और सर्वदा आनन्द ही में मग्न रहने वाले तथा अपने को कृतकृत्य जान कर रहते हैं ।
जो तत्व को साक्षात्कार कराने वाली श्रुतिस्मृत्यादि विद्याओं का आधार है