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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

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DevanagariHindipublished362 pages

About this granth

Rasaratnasamuchchaya (रसरत्नसमुच्चय) is a major text of rasashastra, the branch of Ayurveda that purifies mercury, sulphur, mica, metals and gems and turns them into medicines. It is ascribed to Vagbhatacharya, usually called Rasa-Vagbhata to distinguish him from the author of the Ashtanga Hridaya.

The opening part describes the pharmacy, apparatus, crucibles, heating methods and technical terms, followed by the purification and incineration of the major and minor minerals, metals and gems. Later chapters give mineral formulations for treating particular diseases.

This edition was published in 1939 by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Benares, as No. 91 of the Haridas Sanskrit Series. It carries the Suratnojjvala Hindi commentary of Pandit Ambikadatta Shastri, Ayurvedacharya of Banaras Hindu University, with notes, introduction, indices and appendices. Each verse is followed by a plain Hindi explanation, and the book long served students and practising vaidyas. The opening leaves of this copy also carry a few remedies handwritten in Nepali by an earlier owner.

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९४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ तृतीयोऽध्यायः ।

अथोपरसानां नामानि—

गन्धाश्मगैरिकासीसकांक्षीतालशिलाञ्जनम् ।
कङ्कुष्ठं चेत्युपरसाश्चाष्टौ पारदकर्मणि ॥ १ ॥

गन्धक ( सल्फर ), गैरिक, कासीस, सुराष्ट्रमृत्तिका ( कांक्षी ), हरताल, मैनशील, अञ्जन, कङ्कुष्ठ ये आठ उपरस हैं । इनका पारद के कार्य में उपयोग होता है ॥ १ ॥

अथ गन्धकोत्पत्तिः—

पार्वत्युवाच ।
गन्धकस्य तु महात्म्यं तद्गुह्यं वद मे विभो ॥ २ ॥

हे भगवन् गन्धक का गुप्त माहात्म्य मुझे सुनाईये ॥ २ ॥

ईश्वर उवाच ।
श्वेतद्वीपे पुरा देवि सर्वरत्नविभूषिते ।
सर्वकाममये रम्ये तीरे क्षीरपयोनिधेः ॥ ३ ॥
विद्याधरीभिर्मुख्याभिरङ्गनाभिश्च योगिनाम् ।
सिद्धाङ्गनाभिः श्रेष्ठाभिस्तथैवाप्सरसां गणैः ॥ ४ ॥
देवाङ्गनाभी रम्याभिः क्रीडन्तीभिर्मनोहरैः ।
गीतैर्नृत्यैर्विचित्रैश्च वाद्यैर्नानाविधैस्तथा ॥ ५ ॥
एवं संक्रीडमानायाः प्राभवत्प्रस्रुतं रजः ।
तद्रजोऽतीव सुश्रोणि सुगन्धि सुमनोहरम् ॥ ६ ॥
रजसश्चातिबाहुल्याद्वासस्ते रक्ततां ययौ ।
तत्र त्यक्त्वा तु तद्वस्त्रं सुस्नाता क्षीरसागरे ॥ ७ ॥
वृता देवाङ्गनाभिस्त्वं कैलासं पुनरागता ।
ऊर्मिभिस्तद्रजोवस्त्रं नीतं मध्ये पयोनिधेः ॥ ८ ॥
एवं ते शोणितं भद्रे प्रविष्टं क्षीरसागरे ।
क्षीराब्धिमथने चैतदमृतेन सहोत्थितम् ॥ ९ ॥
निजगन्धेन तान्सर्वान्हर्षयन्सर्वदानवान् ।
ततो देवगणैरुक्तं गन्धकाख्यो भवत्वयम् ॥ १० ॥

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तृतीयोऽध्यायः । ९५

रसस्य बन्धनाथार्य जारणाय भवत्वलम् ।
ये गुणाः पारदे प्रोक्तास्ते चैवात्र भवन्विति ॥ ११ ॥
इति देवगणैः प्रीतैः पुरा प्रोक्तं सुरेश्वरि ।
तेनायं गन्धको नाम विख्यातः क्षितिमण्डले ॥ १२ ॥
इस तरह पार्वतीजी के प्रश्न करने पर शिवजी कहने लगे हे देवि ? किसी
समय श्वेतद्वीप नामक देश में सर्वरत्नों से शोभायमान, निखिल कामदेव की
सामग्री वाले क्षीरसमुद्र के तट पर श्रेष्ठ सिद्धाङ्गनाओं, अप्सराओं, विद्याधरियों
योगिनियों और देवताओं की स्त्रियों के साथ नाना प्रकार की रासक्रीड़ा तथा
मनोहर गीत, नृत्य, वाद्य आदि क्रीड़ा करते करते तुम्हारा रजःस्राव हो गया ।
हे सुश्रोणि ? वह रज अत्यन्त सुगन्धित और मनोहर तथा उस रज के अधिक
निकलने से तुम्हारे वस्त्र लाल हो गये, तब तुम उन रञ्जित वस्त्रों को वहीं छोड़
कर क्षीर समुद्र में स्नान कर देवताओं की स्त्रियों के साथ कैलास पर्वत पर चली
आईं । उधर वे रज के वस्त्र तरङ्गों के द्वारा क्षीरसमुद्र में मिल गये । हे भद्रे ? इस
तरह तुम्हारा आर्तव शोणित क्षीर सागर में प्रविष्ट हो गया । जिस समय क्षीर
सागर का मथन होने लगा उस समय यह रज सभी दानवों को अपनी सुगन्ध से
प्रसन्न करता हुआ अमृत के साथ बाहर निकला, तब देव समाज ने कहा कि यह
संसार में गन्धक कहलाएगा और पारद के बन्धन तथा जारण के लिये समर्थ
होगा और जो गुण पारद में हैं वे सब इस में भी होंगे । हे सुरेश्वरि ? प्रसन्न
हुए देवताओं ने इस तरह गन्धक के विषय में कहा है । तभी से यह खनिज
संसार में गन्धक के नाम से विख्यात हुआ ॥ ३-१२ ॥
अथ गन्धकभेदाः—
स चापि त्रिविधो देवि शुकचञ्चुनिभो वरः ।
मध्यमः पीतवर्णः स्याच्छुक्लवर्णोऽधमः प्रिये ॥ १३ ॥
चतुर्धा गन्धको ज्ञेयो वर्णैः श्वेतादिभिः खलु ।
श्वेतोऽत्र खटिका प्रोक्तो लेपने लोहमारणे ॥ १४ ॥
तथो चामलसारः स्याद्यो भवेत्पीतवर्णवान् ।
शुकपिच्छः स एव स्याच्छ्रेष्ठो रसरसायने ॥ १५ ॥
रक्तश्च शुकतुण्डाख्यो धातुवादविधौ वरः ।

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९६ | रसरत्नसमुच्चये—

दुर्लभः कृष्णवर्णश्च स जरामृत्युनाशनः ॥ १६ ॥

हे देवि ! वह गन्धक तीन प्रकारका है । प्रथम तोते की चोञ्च के समान लाल वर्ण वाला होता है वह उत्तम है। दूसरा पीले वर्ण का होता है वह मध्यम होता है। तृतीय श्वेत वर्ण का होता है वह अधम है। कुछ लोगों का मत है कि श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार तरह का होता है । इन में श्वेत गन्धक को खटिक कहते हैं । क्यों कि यह खड़िया के समान सफेद होता है । यह लेप करने में तथा लौह मारण में काम आता है और जो गन्धक पीले वर्ण का होता है उसे आमला सार गन्धक कहते हैं । इसी का एक दूसरा भेद होता है, उस का नाम शुक पिच्छ है, वह रस और रसायन में श्रेष्ठ होता है । जो गन्धक तोते की चोञ्च समान होता है वह सोना, चांदी इत्यादि धातुओं के बनाने में श्रेष्ठ होता है। जो कृष्ण वर्ण का गन्धक होता है वह जरा और मृत्यु को नष्ट करता है किन्तु वह दुर्लभ है ॥ १३-१६ ॥

अथ गन्धकगुणाः—

गन्धाश्मातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णो मतः ।
कण्डूकुष्ठविसर्पदद्रुदलनो दीप्तानलः पाचनः ॥
आमोन्मोचनशोषणो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः ।
गौरीपुष्पभवस्तथा कृमिहरःसत्त्वात्मकः सूतजित् ॥ १७ ॥
बलिना सेवितः पूर्वं प्रभूतबलहेतवे ॥ १८ ॥

गन्धक श्रेष्ठ रसायन है तथा स्वाद में मधुर तथा पाक में कटु एवं उष्ण है । यह खुजली, कुष्ठ, विसर्प ( फैलने वाली खुजली ) और दद्रु को नष्ट करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है, अग्नि दीप्त करता है, आंव को दूर करता है तथा उस का शोषक है, विषनाशक तथा पारद के गुणों का उत्कर्ष बढ़ाता है । प्लीहावृद्धि, आध्मान और कृमियों को नष्ट करता है । सत्त्वस्वरूप गन्धक पारद को जीतने वाला है। पूर्वकाल में शक्ति प्राप्ति के लिये राजा बली ने इस का सेवन किया था ॥ १७-१८ ॥

अथ बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिः—

वासुकिं कर्षतस्तस्य तन्मुखज्वालया द्रुता ।
वसा गन्धकगन्धाढ्या सर्वतो निःसृता तनोः ॥ १६ ॥
गन्धकत्वं च सम्प्राप्ता गन्धोऽभूत्सविषःस्मृतः ।

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तृतीयोऽध्यायः । ९७

तस्माद्वलिवसेत्युक्तो गन्धकोऽतिमनोहरः ॥ २० ॥

समुद्र के मन्थन के समय वासुकी को खींचते हुए उस के मुख की ज्वाला से मिली हुई राजा बली के शरीर से गन्धक की गन्ध से मिली हुई जो वसा (चर्बी) निकली वही गन्धक के स्वरूप को प्राप्त होकर विषगन्धक कहलाई । इस अत्यन्त मनोहर गन्धक को बलिवसा कहते हैं ॥ १९–२० ॥

अथ गन्धकशुद्धिः—
पयः स्विन्नो घटीमात्रं वारिधौतो हि गन्धकः ।
गव्याज्यविद्रुतो वस्त्राद्गालितः शुद्धिमृच्छति ॥ २१ ॥
एवं संशोधितः सोऽयं पाषाणानंबरे त्यजेत् ।
घृते विषं तुषाकारं स्वयं पिण्डत्वमेव च ॥ २२ ॥
इति शुद्धो हि गन्धाश्मा नापथ्यैर्विकृतिं व्रजेत् ।
अपथ्यादन्यथा हन्यात्पीतं हालाहलं तथा ॥ २३ ॥

गन्धक को एक घण्टे तक दुग्ध में स्वेदन कर जल से धो डालें । फिर उसे चूल्हे पर कढ़ाई में द्रव कर के वस्त्र से छान डालें । इस प्रकार से शुद्ध हुए गन्धक के पाषाण के टुकड़े तथा अन्य मल निकल जाते हैं। और विष बिन्दुओं के रूप में घी के ऊपर तैरने लगता है । स्वयं गन्धक ठंडक से पिण्ड के स्वरूप का हो जाता है । इस तरह से शुद्ध गन्धक के सेवन करने पर अपथ्य होने पर भी विकार उत्पन्न नहीं होता । किन्तु अशुद्ध गन्धक सेवन करने पर अपथ्य हो जाय तो वह हालाहल विष की तरह मनुष्य को मार डालता है । गन्धक को पिघला (द्रुत) कर भृङ्गराज के रस मेँ छोड़ने से शुद्ध हो जाता है । इस तरह सात बार करना चाहिए । प्रत्येक समय में भृङ्गराज का रस बदलना चाहिये और गन्धक को उष्ण जल से धोना चाहिए ॥ २१–२३ ॥

मतान्तरम्—
गन्धको द्रावितो भृङ्गरसे क्षिप्तो विशुध्यति ।
तद्रसैः सप्तधा भिन्नो गन्धकः परिशुध्यति ॥ २४ ॥

अथवा गन्धक को द्रुत करके सात बार भृङ्गराज (भांगरे) के रस में बुझाने से भी शुद्धि हो जाती है अथवा भृङ्गराज के स्वरस से आप्लावित करके सूर्योदय से सूर्यास्त तक घोटे’ । इस तरह सात बार घोटने से वह शुद्ध हो जाता ॥ २४ ॥

रस० ७

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रसरत्नसमुच्चये-

अथ मतान्तरम्-

स्थाल्यां दुग्धं विनिक्षिप्य मुखे वस्त्रं निबध्य च ।
गन्धकं तत्र निक्षिप्य चूर्णितं सिकताकृतिम् ॥ २५ ॥
छादयेत्पृथुदीर्घेण खर्परेणैव गन्धकम् ।
ज्वालयेत्खर्परस्योर्ध्वं वनच्छाणैस्तथोपलैः ॥ २६ ॥
दुग्धे निपतितो गन्धो गलितः परिशुध्यति ।
शतवारं कृतञ्चैव निर्गन्धो जायते ध्रुवम् ॥ २७ ॥

एक हण्डिका में दुग्ध (जितने में गन्धक डूब सके) भर कर पतले शुद्ध वस्त्र से उसका मुख बांध देना चाहिए तथा उस वस्त्र पर गन्धक का बारीक चूर्ण कर रख दें और ऊपर से शराव द्वारा ढक दें, बाद में सकोरे पर जङ्गली उपलों (छाणों) की अग्नि जलादें। इससे गन्धक पिघल कर वस्त्र से छन कर दुग्ध में पड़ जाता है और शुद्ध हो जाता है। इस तरह सौ बार करने से गन्धक निःसन्देह गन्ध रहित हो जाता है ॥ २५–२७ ॥

अथ प्रयोगः-

इत्थं विशुद्धस्त्रिफलाज्यभृङ्गमध्वन्वितः शाणमितो हि लीढः ।
गृध्राक्षितुल्यं कुरुतेऽक्षियुग्मं करोति रोगोज्झितदीर्घमायुः ॥ २८ ॥

इस तरह उपर्युक्त विधि से शतवार शुद्ध किया हुआ गन्धक एक शाण (चोअन्नी भर) लेकर उसमें त्रिफला चूर्ण, मधु, भांगरे का रस और घृत मिला कर प्रतिदिन सेवन करने से दोनों नेत्र गिद्ध की आंख के समान दूर की वस्तुओं को देखने में समर्थ हो जाते हैं और रोग रहित होकर मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ २८ ॥

अथ गन्धकद्रुतिः-

कलांशव्योषसंयुक्तं गन्धकं श्लक्ष्णचूर्णितम् ।
अरत्निमात्रे वस्त्रे तद्विप्रकीर्य विवेष्ट्य तत् ॥ २६ ॥
सूत्रेण वेष्टयित्वाऽथ यामं तैले निमज्जयेत् ।
धृत्वा संदंशतो वर्त्तिमध्यं प्रज्जवालयेच्च तम् ।
द्रुतो निपतितो गन्धो बिन्दुशः काचभाजने ॥ ३० ॥

शुद्ध गन्धक में षोडशांस त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का चूर्ण मिला कर

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तृतीयोऽध्यायः । ९९

खरल में दोनों का अत्यन्त बारीक चूर्ण करलें, इस चूर्ण को एक हाथ चौरस कपड़े पर बिछा कर उसे मोड़ कर दृढ़ बत्ती बनाले उस वत्ती को धागे से लपेट कर एक प्रहर तक तिल तैल में डूबो दें। फिर उसे संड़सी से बीच में पकड़ कर अग्नि से जलावें और नीचे एक काच का पात्र रख दें जिसमें गन्धक द्रुत होकर बिन्दु २ कर के तैल के रूप में एकत्रित हो जायगा ॥ २९-३० ॥

अथ प्रयोगविधिः—
तां द्रुतिं प्रक्षिपेत्पत्रे नागवल्ल्यास्त्रिबिन्दुकाम् ॥
वल्लेन प्रमितं स्वच्छं सूतेन्द्रं च विमर्दयेत् ॥ ३१ ॥
मङ्गुल्याऽथ सपत्रां तां द्रुतिं सूतं च भक्षयेत् ।
करोति दीपनं तीव्रं क्षयं पाण्डु च नाशयेत् ॥ ३२ ॥
कासं श्वासं च शूलार्ति ग्रहणामतिदुर्घराम् ।
आमं विनाशयत्याशु लघुत्वं प्रकरोति च ॥ ३३ ॥

उस तैल स्वरूप गन्धक द्रुति के तीन बूंद और एक रत्ती भर रससिन्दूर ले के घोट कर दोनों को अङ्गुली से पान में मिला कर भक्षण करें। इस से अग्नि दीप्त होती है तथा तीव्र क्षय, पाण्डु, कास और श्वास ये रोग नष्ट हो जाते हैं, तथा शूल, दुःसाध्य ग्रहणी, आंव ये भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवन करने से शरीर में लघुता उत्पन्न होती है ॥ ३१-३३ ॥

अथान्यविधप्रयोगविधिः—
घृताक्ते लोहपात्रे तु विद्रुतं शुद्धगन्धकम् ।
घृताक्तदर्विकाक्षिप्तं द्विनिष्कप्रमितं भजेत् ॥
हन्ति क्षयमुखान् रोगान्कुष्ठरोगं विशेषतः ॥ ३४ ॥

घृत से लिप्त लौह पात्र (कडाही) में शुद्ध गन्धक डालकर पिघलावें फिर उसे घृत से लिप्त कलच्छु से चलाते रहें। कुछ देर बाद नीचे उतार कर चूर्ण कर रख लें। इस गन्धक को एक निष्क (चार मासा) से दो निष्क की मात्रा में सेवन करने से कुष्ठ तथा क्षय रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४ ॥

गन्धकसेवने वर्ज्यानि—
क्षाराम्लतैलसौवीरविदाहिद्विदलं तथा ।
शुद्धगन्धकसेवायां त्याज्यं योगयुतेन हि ॥ ३५ ॥

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रसरत्नसमुच्चये—

शुद्ध गन्धक का सेवन करने वाले मनुष्य क्षार (नोमक), अम्ल (निम्बू इ०), तैल और निस्तुष यव या गोधूमकृत काञ्जी (सौवीर), जलन कारक वस्तु या अम्ल-पाक वस्तु जैसे वंशकरीरादि और दो दल वाले मुद्गादि शमीधान्य त्याग दें॥३५॥

कुष्ठे गन्धकप्रयोगः—

गन्धकस्तुल्यमरिचः षड्गुणत्रिफलान्वितः ।
घृष्टः शम्पाकमूलेन पीतश्चाखिलकुष्ठहा ॥ ३६ ॥
तन्मूलं सलिले पिष्टं लेपयेत्प्रत्यहं तनौ ।
दृष्टप्रत्यययोगोऽयं सर्वत्राप्रतिवीर्यवान् ।
श्रीमत्ता ऽोमदेवेन सम्यगत्र प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥

शुद्ध गन्धक और मरिच चूर्ण समान भाग लेकर गन्धक से षड् गुण अधिक त्रिफला चूर्ण मिलाकर घोट लें । फिर इस चूर्ण को अमलतास की जड़ के क्वाथ या स्वरस के साथ पीने से सम्पूर्ण कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं । इसी के साथ साथ अमलतास की जड़ को पानी में चन्दन की तरह घिस कर उसका शरीर पर लेप करना चाहिए । यह योग कुष्ठनाशन के लिये प्रत्यक्ष फलप्रद देखा गया है । इसके समान अन्य योग शान्तिप्रद नहीं है । यह सोमदेव ने बताया है॥३६-३७॥

अथ कण्डूहरप्रयोगः—

द्विनिष्कप्रमितं गन्धं पिष्ट्वा तैलेन संयुतम् ।
अथापामार्गतोयेन सतैलमरिचेन हि ॥ ३८ ॥
विलिप्यासकलं देहं तिष्ठेद् घर्मे ततः परम् ।
तक्रभक्तं च भुञ्जीत तृतीये प्रहरे खलु ॥ ३९ ॥
भजेद्रात्रौ तथा वह्निं समुत्थाय तथाप्रगे ।
महिषीछगणं लिप्त्वा स्नायाच्छीतेन वारिणा ॥ ४० ॥
ततोऽभ्यज्य घृतैर्देहं स्नायादिष्टोष्णवारिणा ।
अमुना क्रमयोगेन विनश्यत्यतिवेगतः ।
दुर्जया बहुकालीना पामा कण्डूः सुनिश्चितम् ॥ ४१ ॥
गन्धकस्य प्रयोगाणां शतं तन्न प्रकीर्तितम् ।
ग्रन्थविस्तारभीतेन सोमदेवेन भूभुजा ॥ ४२ ॥

दो निष्क (८ मासे) भर शुद्ध गन्धक का चूर्ण तथा इतना ही मरिचचूर्ण

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तृतीयोऽध्यायः। १०९

लेकर दोनों को कटुतैल और अपामार्ग के जल के साथ घोट कर सम्पूर्ण शरीर में लेप कर धूप में खड़ा रहना चाहिए। तीसरे प्रहर में भूख लगने पर मट्ठा और भात का भोजन करें। रात्रि में अग्नि से देह को तपावें। दूसरे दिन उठ कर भैंस के गोबर का शरीर पर लेप कर शीत जल से स्नान करें। पश्चात् समग्र शरीर पर घृत की मालिश कर मन्दोष्ण जल से स्नान करें। इस तरह इस प्रयोग का कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही बहुकालीन तथा असाध्य पामा, और कण्डू निश्चय ही नष्ट हो जाती हैं। इस तरह के गन्धक के सैकड़ों प्रयोग हैं उनका ग्रन्थ विस्तार होने के भय से महाराज सोमदेव ने नहीं वर्णन किया है ॥३८-४२॥

अथ गन्धकतैलम्—
अथवाऽर्कस्नुहीक्षीरैर्वस्त्रं लेप्यन्तु सप्तधा ।
गन्धकं नवनीतेन पिष्ट्वा वस्त्रं लिपेद्धनम् ॥ ४३ ॥
तद्वर्तिं ज्वलितां दंशे धृतां कुर्यादधोमुखीम् ।
तैलं पतेदधोभाण्डे ग्राह्यं योगेषु योजयेत् ॥ ४४ ॥

किसी स्वच्छ वस्त्र को सेंहुड़ के दुग्ध से लिप्त कर सुखा लें। इस तरह सात बार सुखावें, पश्चात् सात बार ही उस वस्त्र को मदार के दुग्ध से लिप्त कर सुखालें। फिर शुद्ध गन्धक को मक्खन या घृत में पीस कर उसका वस्त्र पर गाढ़ा लेप कर वस्त्र की बत्ती बना लें। उस बत्ती को संड़सी से पकड़ कर जलावें, फिर उसका एक मुख नीचे रखे पात्र की ओर कर देना चाहिए। इस तरह तैल नीचे के पात्र में गिरेगा। उसेसब कामों में (रोगनाशार्थ) ग्रहण करें ॥ ४३-४४ ॥

शुद्धगन्धकगुणाः—
अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥ ४५ ॥

इति गन्धकाधिकारः—

शुद्ध गन्धक कुष्ठ रोग तथा जरा और मरण (अकाल मृत्यु) को नष्ट करता है। यह पाचकाग्नि को दीप्त करता है। उष्ण वीर्य तथा वीर्य अर्थात् शरीर शक्ति को बढ़ाता है ॥ ४५ ॥

अथ गन्धकीयविमर्शः—
गन्धक ( Sulphur ) सल्फर ।
इस मूलतत्त्व ( Element ) का ज्ञान सांसारिक प्राणियों को कब से है, इसके

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रसरत्नसमुच्चये—

ऐतिहासिक वृत्त का ब्योरा अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है । सम्भवतः इस तत्त्व का ज्ञान भ्रमणशील रसायन प्रेमियों ने ज्वालामुखी, उष्णस्रोत तथा गोदन्ती के क्षेत्र प्रभृति प्रदेशों में उग्र गन्ध और ज्वलनशक्ति देखकर अन्वेषण किया हो इसी लिये प्राचीन आर्य रसायन ग्रन्थों में "गन्धक" नाम से ही इसका अभिधान किया गया है। गन्धक की उत्पत्ति के प्रकरण में लिखा है कि:—

निजगन्धेन तान्सर्वान् हर्षयन्दैत्यदानवान् ।
ततो देवगणैरुक्तं गन्धकाख्यो भवत्वयम् ॥

इसी प्रकार पाश्चात्य वैज्ञानिक साहित्य में ज्वलन शक्ति के कारण इसको सल्फर ( Sul = sal = salt Fur = fire ) अर्थात् ज्वलन-शील-लवण के अभिधान से सम्बोधित किया है ।

उपलब्धि—

गन्धक प्रायः ज्वालामुखी प्रदेशों में स्वतन्त्र दशा में पाया जाता है । मिस्चरलिच ( Mitscherlich ) नामक विद्वान् ने सर्व प्रथम योरोप में गन्धक की अनेक प्रकार की परिवर्तित रासायनिक दशाओं का प्राप्त करने का प्रयत्न किया था । गन्धक का प्रयोग भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से किया जा रहा है । रस ग्रन्थों के अवलोकन से विदित होता है कि आर्यरसायन-विज्ञों ने भी ब्योरेवार इसके रासायनिक परिवर्त्तन और गुणों का अध्ययन किया तथा उसका औषधि में उपयोग कर जन समुदाय का बड़ा उपकार किया था । किन्तु इस ब्योरे से यह प्रगट नहीं होता कि गन्धक का क्रमबद्ध अध्ययन करने वाला महापुरुष कौन था और किस समय में वह वर्तमान रहा। यह ऐतिहासिक वृत्त अन्वेषणीय है ।

गन्धक उन थोड़े से मूलतत्त्वों में गिना जाता है जो प्रकृति में स्वतन्त्र रूप से पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं यह प्रशान्त वा प्रज्वलित ज्वालामुखी प्रदेशों में आधिक्य से प्राप्त होता है । योरोप में इटली ( Italy ), सिसली (Sicily), आइस-लेन्ड ( Iceland ) आदि देशों में बहुतायत से मिलता है । असाधारणतया अन्य खनिजों के साथ में भी यह यौगिक रूप में पाया जाता है । कहीं २ हाइड्रोजन गेज़ के साथ सल्फ्यूरेटेड हाईड्रोजन ( Sulphurated Hydrogen ) के रूप में उष्ण स्रोतों में पाया जाता है । ऐसे स्रोत बद्रीनाथजी की यात्रा के मार्ग में प्रायः देखे जाते हैं । अन्यत्र भी भारतवर्ष के विहार, बङ्गाल, आसाम, मद्रास आदि प्रान्तों में तीर्थों के स्थानों में प्रायः ऐसे उष्ण स्रोत मिला करते हैं । ऐसे स्रोतों में गन्धक की उग्र गन्ध होती है ।

यौगिक-गन्धक सल्फाइड ( Sulphide ) के रूप में अनेक खनिजों के साथ में मिला रहता है उनमें से प्रधान निम्न लिखित समझे जाते हैं ।

१ रौप्यमाक्षिक ( Iron pyrites ) लौहमाक्षिक ।

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तृतीयोऽध्यायः । १०३

२ सुवर्णमाक्षिक ( Copper pyrites ) ताम्रमाक्षिक ।
३ कांस्यमाक्षिक ( Arseno pyrites ) तालमाक्षिक ।
४ कान्तमाक्षिक ( Pyrrhotite ) चुम्बकीय लौहमाक्षिक ।
५ विमल ( Marcasite pyritous ) लौहमाक्षिक ( विशिष्टरूप युक्त ) ।
६ गन्धनाग ( Galena ) नीलाञ्जन ।
७ गन्धयशद् Zinc blende ) यशद् का खनिज ।
८ गन्धबरनाग ( Stibnite ) ।
९ गन्धरजत ( Argentite ) रजतखनिज ।
१० हिङ्गुल ( Cinnabar ) पारद का खनिज ।
११ गोदन्ती ( Gypsum ) गन्धक का खनिज ।
१२ बेरिया सल्फेट ( Heavy spar ) बराइट ।
१३ बोर्नाइट ( Bornite ) पाषाणस्वरूप ताम्रमाक्षिक ।

उक्त खनिजों की मात्रा किसी किसी स्थान पर बहुत व्यापक और बड़ी तादाद में पाई जाती है । स्वतन्त्र तथा अन्य खनिजों के साथ मिला हुआ गन्धक प्रायः पृथिवी के सर्वांश में पाया जाता है ।

वनस्पतियों में भी नीचे लिखे गणों में प्रायः गन्धक मिला रहता है:—
राईवर्ग, गाजरवर्ग, लहसुनवर्ग, इनके रस और बीजों के तैल में सल्फेट ( Sulphate ) और सल्फाइड ( Sulphide ) के रूप में गन्धक पाया जाता है ।

प्राणि वर्ग में भी यह रक्तादि धातुओं में अत्यल्प प्रमाण से मिला रहता है । पित्त में २६ फी सदी गन्धकांश गन्धक के तेजाब ( Hydro chloric acid ) के रूप में विद्यमान है ।

प्रकृति में अनेक प्रकार की रासायनिक प्रतिक्रियाओं से गन्धक पैदा होता है । माक्षिक के आक्सिडेशन से भी गन्धक पृथक् होकर जहां माक्षिक के कण घुले रहते हैं, वहां पर के कोष्ठों में जमा पाया जाता है । जहां पर ज्वालामुखी की कन्दराओं से अनेक प्रकार की गन्धकीय गैसें ऊपर की ओर निकलती हैं वहां पर 'सल्फर डाई औक्साइड' और हाइड्रोजन सल्फाईड की प्रतिक्रिया से गन्धकाम्ल और गन्धक उत्पन्न होता है ।

( H₂ S हाइड्रोजन सल्फाइड × ₂ So ₂ सल्फर डाइ आक्साइड H ₂ So 4 गन्धकाम्ल और 2S गन्धक ) कहीं २ सम्भवतः हाइड्रोजन सल्फाइड और आक्सिजन की अपूर्ण प्रति क्रिया से गन्धक बनता है । ( ₂ H ₂ So हाइड्रोजन सल्फाइड + O ₂ आक्सिजन की प्रतिक्रिया से ₂ H ₂ o जल और ₂ S गन्धक) अथवा सल्फर डाइ ओक्साइड और जल की प्रतिक्रिया से गन्ध काम्ल और गन्धक

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१०४ रसरत्नसमुच्चये—

पैदा होते हैं । (₃So ₂ + ₂ H ₂ o = ₂ H ₂ So ₄ + S) इस प्रकार से उत्पन्न हुआ गन्धक का बड़ा जमाव 'अबासानो वेशी माइनहोकैडो जापान में गन्धक निकालने के लिये काम में लाया जा रहा है। यह जमाव पुराने सुखे ज्वालामुखी सम्बन्धी मृत्तिकामय तालाबों के क्षेत्र के साथ पाया गया है। इस जमाव से बहुत बड़ी मात्रा में गन्धक निकाल कर युनाइटेड स्टेट को भेजा है । इस प्रकार के जमाव जो मेक्सिको ( Mexico ) आदि प्रदेशों में पाये जाते हैं उनका भी उपयोग करने का प्रबन्ध किया जा रहा है। सबसे अधिक गन्धक खुश्क या तर उष्ण स्रोतों के आस पास में पाया जाता है। ऐसे स्थानों में डाइड्रोजन सल्फाइड के अपूर्ण ओक्सिडेशन से अथवा गन्धकोत्पादक जीवाणुओं की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होता है। इस रीति से उत्पन्न हुए गन्धक के जमाव अमेरिका के पश्चिमी राज्यों में प्रायः मिलते हैं। उदाहरण के लिये कुपराइट ( Cuprite ), इस्मेरेल्डा कन्टी ( Esmeralda County ), नवाडा ( Navada ), सल्फर बैंक केलिफोर्निया ( Sulphur Bank California ), रैबिट होल माइन्स हम्बाल्ट कौन्टी ( Rabbit Hole Mines Humboldt county), उटाह (Utah), कौडी (Cody), थर्मोपोलिस (Thermopolis) ३ और व्योमिङ्ग (Wyoming) जिलों के नाम लिखे जा सकते हैं। अन्त के तीन जिलों में गन्धक निकालने का व्यवसाय प्रारम्भ हैं। व्योमिंग जिले में जो गन्धक प्राप्त होता है वह अल्पांश में चुने के साथ पाया जाता है। यहां का जमाव गहरा नहीं है तथापि व्यापार चलाने लायक समझा जाता है।

संसार में जितना भी प्राकृतिक गन्धक प्राप्त होता है वह ज्वालामुखी या उष्ण स्रोतों के उद्गम से ही निकलता नहीं है किन्तु सब से अधिक निक्षिप्तस्तरों के जमाव ( Sedimentary beds ) में पाया जाता है, ऐसे जमावों का घनिष्ट सम्बन्ध गोदन्ती ( Gypsum ) व सुधापाषाण ( Lime stone ) के साथ रहता है । इनके अतिरिक्त कालसाइट ( Calcite ), अरेगोनाइट ( Aragonite ), ओपल और कभी कभी स्फटिक (Quartz) आदि के साथ गन्धक मिला प्राप्त होता है । गैसीय और घन हाइड्रोकार्बन (Gaseous and solid Hydro Carbons) के साथ भी गन्धक का सहयोग देखा गया है। संसार के बड़े २ गोदन्ती के क्षेत्रों के साथ विशेष रूप से गन्धक का सम्बन्ध सदा और सर्वत्र पाया जाता है, चाहे ऐसे सम्बन्ध व्यापारोपयोगी गन्धक निकालने का कार्य न दें तथापि गन्धक उत्पत्ति का यह नित्य सम्बन्ध सर्वत्र दिखाई देता रहेगा । इस विषय का विशेष ज्ञान प्राप्त करना हो तो लुसियाना ( Louisiana ) के बोरिंग ( Boring ) का विवरण जो उक्त स्टेट को सर्वे के बुलेटिन में प्रकाशित हुआ है, मँगाकर अवलोकन करना चाहिए । इस विवरण के देखने से गोदन्ती और गन्धक का अविरत जन्यजनक सम्बन्ध भली प्रकार विदित हो

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जाता है । गन्धक गोदन्ती और चूने के साथ शिरा, मृत्तिका, राल का शकल का तथा रवों आदि के रूप में जमा पाया जाता है ।

गन्धक निम्न रूप में मिलता है ।

  • ( १ ) रवेदार गन्धक ( Crystalline Forms )
    • ( क ) अष्टफलकीय रवेदार गन्धक ( Octahedral sulphur )
    • ( ख ) त्रिपाश्र्वीय रवेदार गन्धक ( Prismatic sulphur )
  • ( २ ) बिना रवेदार गन्धक ( Amorphous forms )
    • ( अ ) नम्य गन्धक ( Plastic sulphur )
    • ( ब ) श्वेत रवे रहित ( White Amorphous )
    • ( म ) पीत रवे रहित ( Yellow amorphous )
  • ( ३ ) द्रवितगन्धक ( Colloidal sulphur )

गन्धक और गन्धकाय खनिज प्राप्ति के स्थान

अफगानिस्तान—
के हजार जाठ ( Hazara Jat ) नामक स्थान में प्राकृतिक गन्धक बहुतायत से प्राप्त होता है ।
पीत गन्धक के डले और शिरायें गोदन्ती के खण्डों के साथ “दस्त-ह-सफेद” ( Dast i-safed ) नामक स्थान के आस पास में मिलता है ।

आसाम—
के लखिमपुर जिले के “माकुम” ( Makum ) ग्राम में माक्षिक के खण्ड ( Shales ) भुगर्भज कोयले के साथ ऊपर आसाम में प्राप्त होते हैं । किन्तु इनकी मात्रा इतनी नहीं है कि जिससे गन्धक निकाल कर व्यापारिक लाभ उठाया जा सके ।

बलुचिस्तान ( Baluchistan )
के कोह-इ-सुलतान ( Koh-i-sultan ) नामक स्थान में प्रशान्त ज्वालामुखी के आस पास के परिवर्त्तित स्थानों में पीत गन्धक और गौदन्ती पाये जाते हैं । यहां के निवासी खनिज गन्धक को नांदो में भर कर गरम करते हैं। जब गन्धक पिघल जाता है तब उसे तसलों की शकल के ढांचों में ढाल कर अन्य पार्थिव अशुद्धियों से शुद्ध कर लिया करते हैं । “बोलन पास के “द्राज बेन्ट” ( Draj Bent ) और गोकुर्थ ( Gokurth ) नामक स्थानों में भी मृत्तिकाकृति चूने के साथ गन्धक पाया जाता है । किन्तु यहां से उसकी निकासी कठिन है ।

कच्छी ( Kachhi )
जिले के सन्नी ( Sanni ) नामक स्थान में गन्धक की बड़ी खान रही है । सन् १८४६ ई० हुटन ( Huttan ) नामक अंग्रेज ने इस स्थान को जाकर देखा था ।

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रसरत्नसमुच्चये -

उसका कथन है कि इस स्थान में गंधक अष्ट पार्श्वीय रवों और चूर्ण के रूप में बहुतायत से प्राप्त हो सकता है। अब भी यहां के निवासी खनिज गंधक को निकाल कर 'सन्नी' के पूर्व की तरफ स्थित बाग ( Bagh ) नामक स्थान पर ले जाकर उसे तैल के साथ पिघाल कर शुद्ध किया करते हैं। बाग नामक स्थान सत्री से ४० मील दूर है। यहां पर की खान की खुदाई का काम अफगानिस्तान के अमीर के तरफ से होता रहा है पर अब ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य में आ जाने पर गंधक की निकासी का काम बन्द कर दिया गया है। किसी कारण वश इस खान में आग लग जाने से खान का कुछ अंश जल भी गया है। सन् १९०६ ई० में इस खान को टिप्पर ( Tipper ) नामक अंग्रेज देखने गया था। उसका लिखना है कि इस स्थान में गन्धक शिवालिक मृत्तिका के साथ शिराओं के रूप में प्राप्त होता है। कुछ स्थान पर गन्धक इस प्रकार जमा हुआ है कि वह आसानी से जल सकता है। होलेन्ड ( Holland ) नामक विद्वान की राय है कि यहां गन्धकीय जमाव व्यापारिक लाभ उठाने के योग्य है।

लास वेला ( Las bela )

जिले में 'कान बेरार' ( Kan Berar ) नामक स्थान के आस पास खारे स्रोतों के समीप गन्धक का जमाव देखा गया है। यहां पर के स्रोतों के समीप रेणु शिला की शिराओं में लवण और गन्धक की शिरायें देखी जाती हैं। किन्तु परीक्षा करने से विदित हुआ कि यहां का जमाव व्यापारोपयोगी नहीं है।

मेकरन तट ( Mekran coast )

के जिले में करघारी ( Karghari ) के पास गोलकुर्ट ( Golkurt ) स्थान में बहुत गन्धक एकत्रित किया जा सकता है।

सिबि ( Sibi )।

जिले में "खाटान" (Khattan) नामक स्थान के मिट्टी के तैल के कूप के पास वाले उष्ण स्रोतों के स्राव से रवेदार गन्धक का बहुत सा जमाव पाया जाता है।

बैरन आइलेन्ड ( Barten Island )

में भी गन्धक का जमाव पाया जाता है। किन्तु उसकी मोटाई २ या ३ इञ्च से अधिक नहीं है और कई दर्जन टन से अधिक गन्धक निकालने का अनुमान भी नहीं किया जाता है।

विहार और उड़िसा—

मयूरभञ्ज रियासत के धल भूमि सीमा प्रान्त के मालाघाटी के पास में विशेष रूप से रौप्यमाक्षिक ( Iron pyrites ) अनेक स्थानों में पाया जाता है। आज कल गन्धक निकालने का यह प्रधान खनिज समझा जाता है।

सिन्ध भूम जिले में सुवर्ण माक्षिक ( Copper pyrites ) से ताम्र के साथ

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गन्धक बहुतायत के साथ प्राप्त किया जा सकता है। यहां के ताम्र के खनिजों का व्यापार उसी दशा में लाभ कारक हो सकता है जब बड़े पैमानों पर काम किया जाय।

बम्बई—

सिन्ध के गिजरी बन्दर ( Ghizri bunder ) पर गन्धक के जमाव का पता लगाया गया है। यहां के खनिजों से ६० फी सदी गन्धक प्राप्त किया जा सकता है। किसी समय “लाकि” ( Laki ) नामक स्थान के स्रोतों के स्राव से जो गन्धक के जमाव “जामा” ( Scum ) के रूप में बनते थे, उनसे वहां के ग्राम्यजन गन्धक निकालने का अध्यवसाय करते थे । किन्तु व्यापारिक लाभ के लिये यहां की गन्धक पर्याप्त नहीं समझी जाती ।

बर्मा ( Burma )

सन् १८७३ में स्ट्रोवर ( Strover ) नामक विद्वान ने लिखा है कि वर्मा राजाओं के राज्य काल में अपर वर्मा में अनेक स्थानों से २८००० बिस ( एक बर्मा तौल ) गन्धक रौप्यमाक्षिक से उड़ा कर प्रति वर्ष निकाला जाता रहा है। बर्मा में गन्धक व्यवसाय का मुख्य केन्द्र जोन्स ( Jones ) के लेखानुसार “मासुन” ( Mowsun ) नामक प्रान्त के समीप में रहा है।

दक्षिणी शान राज्यों ( Southern Shan states ) में भी गन्धक निकालने का व्यवसाय अब तक होता रहा है। शान राज्यों की अनेक प्रकार की स्फटिक शिलाओं में रौप्यमाक्षिक पाया गया है। इस रौप्यमाक्षिक से गन्धक निकालने का कारोबार चल सकता है। यहां के रौप्यमाक्षिक में सुवर्ण, रजत आदि बहुमूल्य खनिज प्राप्त नहीं होते । ये स्थान इतने निकट हैं कि यहां पर रौप्यमाक्षिक से गन्ध-काम्ल बनाने का व्यवसाय लाभ पूर्वक नहीं चलाया जा सकता ।

दक्षिण हैदराबाद—

के गुलबर्ग ( Gulbarg ) जिले में मुदानूर ( Mudanur ) नामक स्थान पर आधिक्य से रौप्यमाक्षिक प्राप्त होता है, जिससे गन्धक निकालने का व्यवसाय किसी जमाने में होता रहा है।

कश्मीर—

के बाल्टिस्तान ( Baltistan ) जिले में अनेक उष्ण-स्रोतों से गन्धक का जमाव होता है। रूपशु ( Rupshu ) जिले की पुगा घाटी ( Puga valley ) के उष्ण-स्रोत-सम्बन्धी गन्धकीय जमाव से काश्मीर दरबार की तरफ से गन्धक निकालने का कारोबार हुआ करता था, यहां शीत अधिक होने के कारण केवल वर्ष में चार मास तक ही कारखाना चलता था, जिससे गन्धक की वार्षिक निकासी २०-२५ टन हो जाया करती थी।

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१०८ रसरत्नसमुच्चये-

मद्रास-
के आरकोट ( Arcot ) जिले में आधा मील तक गन्धक का जमाव 'वोलण्डर-पेट ( Wolunderpet ) से कुछेक मील की दूरी पर पोडिया बोलियं ( Wodia Paliam ) नामक जिले में स्थित है।

गोदावरी-
के किनारे २ दलदलों के क्षेत्रों में पानी सूख जाने पर ढेलों के रूप में जमा हुआ गन्धक पाया जाता है। यहां के गन्धक के खनिजों में २८% फी सदी स्वतन्त्र गन्धक और ६८ फी सदी निश्चित रूप में गन्धक पाया जाता है।

ट्रावनकोर-
राज्य में मङ्गामलाई ( Mangamalai ) नामक पहाड़ी पर कान्तमाक्षिक ( Pyrrhotite ) मिलता है इससे गन्धक निकाला जा सकता है। इसी स्थान के पश्चिमी भाग की ओर कुछ दूरी पर एक दूसरा जमाव भी कान्तमाक्षिक का है।

उत्तरी पश्चिमीय सीमाप्रान्त ( North West Frontier Province )
के कोहाट जिले में इन्डस ( Indus ) नदी के पश्चिमी किनारे पर माक्षिकीय ( Pyritous ) मिश्रित स्फटिक ( Alum ) के खपड़े सुधा पाषाण के नीचे जमे पाये जाते हैं। इन खपड़ों से गन्धक निकालने का व्यवसाय किया जाता रहा है। गन्धक निकालने के लिये डमरू यन्त्र का उपयोग किया जाता था। इस यन्त्र द्वारा गन्धक उड़ाकर गन्धक के फूल तय्यार किये जाते रहे हैं।

शिरानी ( Shirani )
नामक जिले में डोमुन्डा ( Domunda ) के पास में रौप्यमाक्षिक के परिवर्तन से गन्धक जमा होता हुआ देखा गया है।

पञ्जाब-
में डेरागाजी खान के सोरीपास नामक स्थान पर गन्धक निकालने का कारोबार चलता था। यहां पर गन्धक गोदन्ती के साथ उष्ण स्रोतों में जमा हुआ दिखाई देता है। गोदन्ती के अन्दर पीत गन्धक के रेशे या शिरायें मिली पाई जाती हैं। कोहाट की भांति डमरू यन्त्र से उड़ाकर शुद्ध गन्धक एकत्रित करने का व्यवहार यहां भी चालू था। गन्धारी पहाड़ के दक्षिणी किनारे पर सफेद क्षेत्रों में भी गन्धक पाया जाता है।

झङ्ग ( Jhang ) राज्य में किराना पहाड़ी के पाषाणों में कान्त माक्षिक ( Pyrrhotite ) के ढेले पाये गये हैं। हुन्डी वाला नामक स्थान की खान में भी रेलवे स्टेशन के पास विमल के नमूने प्राप्त हुये हैं।

मियां वाला ( Mian wala ) ज़िले में पेट्रोलियम प्राप्ति की जमीन में गन्धक

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पाया जाता है। बोरिङ्ग ( Bowring ) नामक स्थान के पास पेट्रोलियम के स्रोत के समीप समीप मीलों तक पहाड़ी भूमि पर गोदन्ती के साथ गन्धक पाया जाता है। किन्तु यहां पर व्यापारोपयोगी गन्धक की मात्रा मिलने में सन्देह है।

रावल पिंडी के जिले में मशालापास के पूर्वी ओर की पहाड़ी पर गन्धक की खान में काम होता रहा है।

संयुक्त प्रान्त—
के देहरादून, जोन्सार जिलों में मेवार ( Maiwar ) नामक स्थान की सीसक ( Lead ) की खान की परिधि में गन्धक पाया जाता है और उसका इतना निकास होता है कि जिससे सीसक निकालने का सारा व्यय प्राप्त हो जाया करता है।

कुमायूँ—
जिले के उष्ण स्रोतों से अल्प मात्रा में गन्धक जमा पाया जाता है। कुमायूँ प्रान्त के नीचे लिखे स्थानों का गन्धक प्राप्ति के विषय में विशेषतः उल्लेख है—
( १ ) राम गङ्गा और गजियर नदी के तटवर्ती उष्णस्रोत ।
( २ ) नन्द प्रयाग के पास मन्सियारी मुल्ला, दसोली और मुल्लानागपुरा ।

उक्त स्थानों के अतिरिक्त अनेक उष्ण स्रोतों के आसपास में न्यूनाधिक मात्रा में गन्धक पाया जाता है उसको शैलोदक ( Mineral waters ) कहते हैं ।

आज कल माक्षिक का (गन्धक युक्त होने के कारण) गन्धकाम्ल बनाने के लिये अधिकतया व्यवहार किया जाता है। इसलिये गन्धक प्रसङ्ग में गन्धकाम्ल (Sulphuric acid) का संक्षिप्त ब्योरा जानना आवश्यक है। संसार व्यापी यूरोपियन युद्ध के कुछ ही पूर्व युनाइटेड स्टेट्स में लगभग ३५०,००० छोटे टन ( Short tons ) गन्धकाम्ल बनता था। युद्ध की दशा में विस्फोटक ( Explosive ) पदार्थों के निर्माण के लिये इसकी मांग अधिक हो गई। सन् १९१६ में ६२१० ००० टन गन्ध-काम्ल बनाया गया और १९१८ में ८०००००० टन तय्यार किया गया। सन् १९१६ ई० में ४० फी सदी गन्धकाम्ल स्पेनिश माक्षिक ले कर बनाया गया था। शेष ६ फी सदी केनाडियन माक्षिक, १३ फी सदी अमेरिकन माक्षिक, २२ फी सदी ताम्र और यशद के खनिज गलाने से उत्पन्न गन्धकीय वाष्प और शेष १९ फी सदी प्राकृतिक गन्धक लेकर बनाया जाता है। युद्ध के पूर्व प्राकृतिक गन्धक का उपयोग इस कार्य के लिये नहीं किया जाता रहा है। इस लेख से यह स्पष्ट है कि माक्षिक अन्य गन्धक के खनिजों के साथ या स्वतन्त्र ही गन्धकाम्ल बनाने के लिये प्रधानता से उपयोग किया जा रहा है। इस काम के लिये अनेक देश, विशेष कर स्पेन, नारवे (Norway) पोर्चुगाल (Portugal), फ्रान्स, युनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका, जर्मनी २,००००० टन से अधिक माक्षिक की प्रतिवर्ष निकासी करते हैं।

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११० | रसरत्नसमुच्चये—

युनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में गन्धक प्राप्ति के मुख्य खनिज माक्षिक और विमल (Pyrite marcasite pyrrhotite) ५३˙३% व ३८˙४% फीसदी वाले क्रमशः समझे जाते हैं।

इसी प्रकार पाश्चात्य वैज्ञानिक साहित्य में ज्वलन शक्ति के कारण इसको सल्फर (Sulphur) अर्थात् ज्वलन-शील-लवण के अभिधान से सम्बोधित किया है।

अथ गैरिकम्—

गैरिकभेदाः—

पाषाणगैरिकं चैकं द्वितीयं स्वर्णगैरिकम् ॥ ४६ ॥

गैरिक दो प्रकार का होता है एक को पाषाण गैरिक तथा दूसरे को स्वर्ण गैरिक कहते हैं ॥ ४६ ॥

विमर्शः— गैरिक को साधारणतया हीमोटाइट (Heamotite) कहते हैं। इसके दो भेद हैं प्रथम पाषाणगैरिक तथा द्वितीय स्वर्णगैरिक (Kidney Iron ore) है। यह द्वितीय प्रकार का खनिज भारत वर्ष में अल्पमात्रा में मिलता है किन्तु अमेरीका और जर्मन में अधिक मात्रा में मिलता है इसको गैरिक का मणि समझना चाहिए। जहां तक हो सके औषध कर्म में स्वर्ण गैरिक का ही प्रयोग करना चाहिए। गैरिक लौह का प्रधान खनिज है। यह रेड आयर्न आक्साइड (Red Iron oxide) है। ताता (टाटा) के कारखाने में इससे लोह (Iron) निकाला जाता है।

पाषाणस्वर्णगैरिकयोर्लक्षणम्—

पाषाणगैरिकं प्रोक्तं कठिनं ताम्रवर्णकम्।
अत्यन्तशोणितं स्निग्धं मसृणं स्वर्णगैरिकम् ॥ ४७ ॥
स्वादु स्निग्धं हिमं नेत्र्यं कषायं रक्तपित्तनुत्।
हिष्मावमिविषघ्नं च रक्तघ्नं स्वर्णगैरिकम्।
पाषाणगैरिकं चान्यत्पूर्वस्मादल्पकं गुणे ॥ ४८ ॥

पाषाण गैरिक स्पर्श में कठिन तथा ताम्रवर्ण का होता है, स्वर्ण गैरिक अत्यन्त रक्तवर्ण तथा स्निग्ध और कोमल होता है। यह स्वर्ण गैरिक स्वादु, स्निग्ध, शीतल, नेत्रहितकर, कसैला और रक्तपित्त को नष्ट करता है और हिचकी, वमन, विष इन का नाशक है, रक्तस्राव को नष्ट करता है। पाषाणगैरिक स्वर्णगैरिक से कुछ कम गुणवाला होता है ॥ ४७–४८ ॥

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अथ गैरिकशोधनम्—

गैरिकं तु गवां दुग्धैर्भावितं शुद्धिमृच्छति ॥ ४९ ॥
गैरिकं सत्त्वरूपं हि नन्दिना परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥
कैरप्युक्तं पतेत्सत्त्वं क्षाराम्लस्विन्नगैरिकात् ।
उपतिष्ठति सूतेन्द्रमेकत्वं गुणवत्तरम् ॥ ५१ ॥

गैरिक गोदुग्ध से भावना देने पर शुद्ध हो जाता है । नन्दी नामक सिद्ध ने गैरिक को सत्त्व स्वरूप ही बताया है । कुछ लोगों का मत है कि क्षार और अम्ल में स्वेदन करने से गैरिक से सत्त्व निकलता है। गैरिक सत्त्व पारद में मिल जाता है और अधिक गुणकर होता है ॥ ४९-५१ ॥

अथ कासीसरसायनम्—
तत्रादौ कासीसभेदाः—

कासीसं वालुकाद्येकं पुष्पपूर्वमथापरम् ॥ ५२ ॥

कासीस दो तरह का होता है। एक को बालु काकासीस तथा द्वितीय को पुष्प कासीस कहते हैं । बालु कासीस को धातु कासीस भी कहते हैं ॥ ५२ ॥

**विमर्शः—**कासीस को साधारणतया आजकल फेराइ सल्फ ( Ferri Sulph ) अथवा फेरस सल्फेट ( Ferrous Sulphate ) कहते हैं । यह लौह और गन्धक का यौगिक है। यह आजकल प्रायः कृत्रिम ही मिलता है तथा लौह पर गन्धक के तेजाब गन्धकाम्ल ( Sulphuric Acid ) के प्रयोग से तय्यार किया जाता है । प्रायः प्राकृतिक या कृत्रिम कासीस हरे क्रिस्टलीय रूप में पाया जाता है। यह मडुर होता है तथा जल में विलेय (Soluble) है तथा उस में घुल कर विलयन (Solution) बनता है। इसको अग्नि पर गरम करने से इसमें से जल निकलता है इस जल को क्रिस्टलीकरण का जल ( Water of Crystallisation ) कहते हैं । इसी जल के कारण यह क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है । इस प्रकार तपाने से जल निकल जाने पर जो चूर्ण अवशेष रह जाता है वह सफेद रङ्ग का हो जाता है । अतः जल ही के कारण यह क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। इसको ज्यादा गरम करने से इससे प्रथम जल निकलता है फिर सफेद रङ्ग का धुआं निकलता है जिसे यदि द्रवीभूत करके परीक्षा करें तो मालूम होता है कि वह तेल ( oil ) सा गाढा पदार्थ है । इसकी कुछ बूंदे जल में डालकर स्वाद लेने से खट्टा मालूम होता है तथा इस कासीस के द्रवीभूत धुम्र को लकड़ी या कपड़ों पर डालें तो वे झुलस जावेंगे । परीक्षा करने से यह गन्धकाम्ल ( Sulphuric

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११२ रसरत्नसमुच्चये—

Acid) सिद्ध हुआ है । इस निर्णय के पहिले इसको कसीस का तैल कहते थे । इसके निकल जाने से जो पदार्थ शेष रहता है वह कासीस के गुणधर्मों से भिन्न होता है । इस द्रव्यका रङ्ग कपिल होता है तथा जल में डालने से यह बिलकुल अविलय ( In Soluble ) है तथा देखने में भी मोरचे के समान प्रतीत होता है । जो क्रिस्टल स्वरूप कासीस है, उसे पुष्पकासीस समझना चाहिए और उसका सूत्र यह ( Fe Soy TH 20 ) है । जो आक्साई के रूप में हो जाता है उसको वालु कासीस समझना चाहिए, तथा उसका सूत्र ( Fe Soy ) है । प्रायः औषध कर्म में पुष्प कासीस को ही अधिक गुणकर होने से ग्रहण करना चाहिए ।

वालुकासीसगुणाः—

क्षाराम्लागुरुधूमाभं सोष्णवीर्यं विषापहम् ।
वालुकापूर्वकासीसं श्वित्रघ्नं केशरञ्जनम् ॥ ५३ ॥

बालुकाकासीस क्षार, अम्ल और गुरु होता है तथा वर्ण में धूएं के सदृश होता है और वीर्य में उष्ण और विष विकारों को विनष्ट कर देता है तथा सफेद कुष्ठ को नष्ट करता है और केशों को काले रंग का कर देता है ॥ ५३ ॥

पुष्पकासीसगुणाः—

पुष्पादिकासीसमतिप्रशस्तं सोष्णं कषायाम्लमतीव नेत्र्यम् ।
विषानिलश्लेष्मगदव्रणघ्नं श्वित्रक्षयघ्नं कचरञ्जनञ्च ॥ ५४ ॥

पुष्प कासीस औषध कर्म में श्रेष्ठ है । यह उष्णवीर्य, कषाय और अम्ल होता है । नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर है और विषवाधा, वात और कफ से जन्यरोग, व्रण तथा श्वेतकुष्ठ को नष्ट करता है, शिर के बालों को काला करता है ॥ ५४ ॥

कासीसशोधनम्—

सकृद्भृङ्गाम्बुना क्लिन्नं कासीसं निर्मलं भवेत् ॥ ५५ ॥

कासीस का चूर्ण कर भृङ्गराज के स्वरस या क्वाथ में एक बार भिगो देने से शुद्ध हो जाता है ॥ ५५ ॥

सत्त्वग्रहणनिर्देशः—

तुवरीसत्त्ववत्सत्त्वमेतस्यापि समाहरेत् ॥ ५६ ॥

वक्ष्यमाण तुवरी ( फिटकरी ) के सत्त्व के निष्कासन की विधि के समान इसका भी सत्त्व निकाल कर ग्रहण करना चाहिए ॥ ५६ ॥

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अथ शोधनान्तरम्—

कासीसं शुद्धिमाप्नोति पित्तैश्च रजसा स्त्रियाः ॥ ५७ ॥

कासीस को पञ्चपित्त ( वराह, छाग, महिष, मत्स्य, मयूरपित्त, ) और स्त्री के मासिक धर्म कालीन शोणित से भिगो देने पर शुद्धि होती है ॥ ५७ ॥

कासीसप्रयोगः—

बलिना हतकासीसं क्रान्तं कासीसमारितम् ।
उभयं समभागं हि त्रिफलावेल्लसंयुतम् ॥ ५८ ॥
विषमांशघृतक्षौद्रप्लुतं शाणमितं प्रगे ।
सेवितं हन्ति वेगेन श्वित्रं पाण्डुक्षयामयम् ॥ ५९ ॥
गुल्मप्लीहगदं शूलं मूलरोगं विशेषतः ।
रसायनविधानेन सेवितं वत्सरावधि ॥ ६० ॥
आमसंशोषणं श्रेष्ठं मन्दाग्निपरदीपनम् ।
पलितं वलिभिः सार्धं विनाशयति निश्चितम् ॥ ६१ ॥

इति कासीसाधिकारः ।

गन्धक से मारण की हुई कासीस भस्म और कासीस से मारण की हुई लौह भस्म या वैक्रान्तभस्म इन दोनों को समान भाग लेकर खरल में घोट लें इसमें से एक शाण (चोअन्नी) भर लेकर त्रिफला चूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण विषम मात्रा से घृत तथा मधु मिलाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करने से श्वेत कुष्ठ, पाण्डु, क्षयरोग, पञ्चप्रकार के गुल्म, प्लीहवृद्धि, शूल, अर्श नष्ट होते हैं । इस योग को रसायन-विधि से एकवर्ष पर्यन्त सेवन करने से आंवरोग सूख जाता है, मन्दाग्नि दीप्त हो जाती है, बालों का श्वेत होना तथा गिरना दोनों रोग निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ५८-६१ ॥

अथ तुवरीनिरूपणम्—

तुवरीपरिचयः—

सौराष्ट्राश्मनि सम्भूता मृत्स्ना सा तुवरी मता ।
वस्त्रेषु लिप्यते यासौ मञ्जिष्ठारागबन्धिनी ॥ ६२ ॥

सोराष्ट्रदेश के पत्थरों की खान से पैदा होने वाली मृत्तिका को तुवरी

रस० ८