रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः । ९९
खरल में दोनों का अत्यन्त बारीक चूर्ण करलें, इस चूर्ण को एक हाथ चौरस कपड़े पर बिछा कर उसे मोड़ कर दृढ़ बत्ती बनाले उस वत्ती को धागे से लपेट कर एक प्रहर तक तिल तैल में डूबो दें। फिर उसे संड़सी से बीच में पकड़ कर अग्नि से जलावें और नीचे एक काच का पात्र रख दें जिसमें गन्धक द्रुत होकर बिन्दु २ कर के तैल के रूप में एकत्रित हो जायगा ॥ २९-३० ॥
अथ प्रयोगविधिः—
तां द्रुतिं प्रक्षिपेत्पत्रे नागवल्ल्यास्त्रिबिन्दुकाम् ॥
वल्लेन प्रमितं स्वच्छं सूतेन्द्रं च विमर्दयेत् ॥ ३१ ॥
मङ्गुल्याऽथ सपत्रां तां द्रुतिं सूतं च भक्षयेत् ।
करोति दीपनं तीव्रं क्षयं पाण्डु च नाशयेत् ॥ ३२ ॥
कासं श्वासं च शूलार्ति ग्रहणामतिदुर्घराम् ।
आमं विनाशयत्याशु लघुत्वं प्रकरोति च ॥ ३३ ॥
उस तैल स्वरूप गन्धक द्रुति के तीन बूंद और एक रत्ती भर रससिन्दूर ले के घोट कर दोनों को अङ्गुली से पान में मिला कर भक्षण करें। इस से अग्नि दीप्त होती है तथा तीव्र क्षय, पाण्डु, कास और श्वास ये रोग नष्ट हो जाते हैं, तथा शूल, दुःसाध्य ग्रहणी, आंव ये भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवन करने से शरीर में लघुता उत्पन्न होती है ॥ ३१-३३ ॥
अथान्यविधप्रयोगविधिः—
घृताक्ते लोहपात्रे तु विद्रुतं शुद्धगन्धकम् ।
घृताक्तदर्विकाक्षिप्तं द्विनिष्कप्रमितं भजेत् ॥
हन्ति क्षयमुखान् रोगान्कुष्ठरोगं विशेषतः ॥ ३४ ॥
घृत से लिप्त लौह पात्र (कडाही) में शुद्ध गन्धक डालकर पिघलावें फिर उसे घृत से लिप्त कलच्छु से चलाते रहें। कुछ देर बाद नीचे उतार कर चूर्ण कर रख लें। इस गन्धक को एक निष्क (चार मासा) से दो निष्क की मात्रा में सेवन करने से कुष्ठ तथा क्षय रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४ ॥
गन्धकसेवने वर्ज्यानि—
क्षाराम्लतैलसौवीरविदाहिद्विदलं तथा ।
शुद्धगन्धकसेवायां त्याज्यं योगयुतेन हि ॥ ३५ ॥