रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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रसरत्नसमुच्चये—
शुद्ध गन्धक का सेवन करने वाले मनुष्य क्षार (नोमक), अम्ल (निम्बू इ०), तैल और निस्तुष यव या गोधूमकृत काञ्जी (सौवीर), जलन कारक वस्तु या अम्ल-पाक वस्तु जैसे वंशकरीरादि और दो दल वाले मुद्गादि शमीधान्य त्याग दें॥३५॥
कुष्ठे गन्धकप्रयोगः—
गन्धकस्तुल्यमरिचः षड्गुणत्रिफलान्वितः ।
घृष्टः शम्पाकमूलेन पीतश्चाखिलकुष्ठहा ॥ ३६ ॥
तन्मूलं सलिले पिष्टं लेपयेत्प्रत्यहं तनौ ।
दृष्टप्रत्यययोगोऽयं सर्वत्राप्रतिवीर्यवान् ।
श्रीमत्ता ऽोमदेवेन सम्यगत्र प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥
शुद्ध गन्धक और मरिच चूर्ण समान भाग लेकर गन्धक से षड् गुण अधिक त्रिफला चूर्ण मिलाकर घोट लें । फिर इस चूर्ण को अमलतास की जड़ के क्वाथ या स्वरस के साथ पीने से सम्पूर्ण कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं । इसी के साथ साथ अमलतास की जड़ को पानी में चन्दन की तरह घिस कर उसका शरीर पर लेप करना चाहिए । यह योग कुष्ठनाशन के लिये प्रत्यक्ष फलप्रद देखा गया है । इसके समान अन्य योग शान्तिप्रद नहीं है । यह सोमदेव ने बताया है॥३६-३७॥
अथ कण्डूहरप्रयोगः—
द्विनिष्कप्रमितं गन्धं पिष्ट्वा तैलेन संयुतम् ।
अथापामार्गतोयेन सतैलमरिचेन हि ॥ ३८ ॥
विलिप्यासकलं देहं तिष्ठेद् घर्मे ततः परम् ।
तक्रभक्तं च भुञ्जीत तृतीये प्रहरे खलु ॥ ३९ ॥
भजेद्रात्रौ तथा वह्निं समुत्थाय तथाप्रगे ।
महिषीछगणं लिप्त्वा स्नायाच्छीतेन वारिणा ॥ ४० ॥
ततोऽभ्यज्य घृतैर्देहं स्नायादिष्टोष्णवारिणा ।
अमुना क्रमयोगेन विनश्यत्यतिवेगतः ।
दुर्जया बहुकालीना पामा कण्डूः सुनिश्चितम् ॥ ४१ ॥
गन्धकस्य प्रयोगाणां शतं तन्न प्रकीर्तितम् ।
ग्रन्थविस्तारभीतेन सोमदेवेन भूभुजा ॥ ४२ ॥
दो निष्क (८ मासे) भर शुद्ध गन्धक का चूर्ण तथा इतना ही मरिचचूर्ण