रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः। १०९
लेकर दोनों को कटुतैल और अपामार्ग के जल के साथ घोट कर सम्पूर्ण शरीर में लेप कर धूप में खड़ा रहना चाहिए। तीसरे प्रहर में भूख लगने पर मट्ठा और भात का भोजन करें। रात्रि में अग्नि से देह को तपावें। दूसरे दिन उठ कर भैंस के गोबर का शरीर पर लेप कर शीत जल से स्नान करें। पश्चात् समग्र शरीर पर घृत की मालिश कर मन्दोष्ण जल से स्नान करें। इस तरह इस प्रयोग का कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही बहुकालीन तथा असाध्य पामा, और कण्डू निश्चय ही नष्ट हो जाती हैं। इस तरह के गन्धक के सैकड़ों प्रयोग हैं उनका ग्रन्थ विस्तार होने के भय से महाराज सोमदेव ने नहीं वर्णन किया है ॥३८-४२॥
अथ गन्धकतैलम्—
अथवाऽर्कस्नुहीक्षीरैर्वस्त्रं लेप्यन्तु सप्तधा ।
गन्धकं नवनीतेन पिष्ट्वा वस्त्रं लिपेद्धनम् ॥ ४३ ॥
तद्वर्तिं ज्वलितां दंशे धृतां कुर्यादधोमुखीम् ।
तैलं पतेदधोभाण्डे ग्राह्यं योगेषु योजयेत् ॥ ४४ ॥
किसी स्वच्छ वस्त्र को सेंहुड़ के दुग्ध से लिप्त कर सुखा लें। इस तरह सात बार सुखावें, पश्चात् सात बार ही उस वस्त्र को मदार के दुग्ध से लिप्त कर सुखालें। फिर शुद्ध गन्धक को मक्खन या घृत में पीस कर उसका वस्त्र पर गाढ़ा लेप कर वस्त्र की बत्ती बना लें। उस बत्ती को संड़सी से पकड़ कर जलावें, फिर उसका एक मुख नीचे रखे पात्र की ओर कर देना चाहिए। इस तरह तैल नीचे के पात्र में गिरेगा। उसेसब कामों में (रोगनाशार्थ) ग्रहण करें ॥ ४३-४४ ॥
शुद्धगन्धकगुणाः—
अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥ ४५ ॥
इति गन्धकाधिकारः—
शुद्ध गन्धक कुष्ठ रोग तथा जरा और मरण (अकाल मृत्यु) को नष्ट करता है। यह पाचकाग्नि को दीप्त करता है। उष्ण वीर्य तथा वीर्य अर्थात् शरीर शक्ति को बढ़ाता है ॥ ४५ ॥
अथ गन्धकीयविमर्शः—
गन्धक ( Sulphur ) सल्फर ।
इस मूलतत्त्व ( Element ) का ज्ञान सांसारिक प्राणियों को कब से है, इसके