रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः । ९७
तस्माद्वलिवसेत्युक्तो गन्धकोऽतिमनोहरः ॥ २० ॥
समुद्र के मन्थन के समय वासुकी को खींचते हुए उस के मुख की ज्वाला से मिली हुई राजा बली के शरीर से गन्धक की गन्ध से मिली हुई जो वसा (चर्बी) निकली वही गन्धक के स्वरूप को प्राप्त होकर विषगन्धक कहलाई । इस अत्यन्त मनोहर गन्धक को बलिवसा कहते हैं ॥ १९–२० ॥
अथ गन्धकशुद्धिः—
पयः स्विन्नो घटीमात्रं वारिधौतो हि गन्धकः ।
गव्याज्यविद्रुतो वस्त्राद्गालितः शुद्धिमृच्छति ॥ २१ ॥
एवं संशोधितः सोऽयं पाषाणानंबरे त्यजेत् ।
घृते विषं तुषाकारं स्वयं पिण्डत्वमेव च ॥ २२ ॥
इति शुद्धो हि गन्धाश्मा नापथ्यैर्विकृतिं व्रजेत् ।
अपथ्यादन्यथा हन्यात्पीतं हालाहलं तथा ॥ २३ ॥
गन्धक को एक घण्टे तक दुग्ध में स्वेदन कर जल से धो डालें । फिर उसे चूल्हे पर कढ़ाई में द्रव कर के वस्त्र से छान डालें । इस प्रकार से शुद्ध हुए गन्धक के पाषाण के टुकड़े तथा अन्य मल निकल जाते हैं। और विष बिन्दुओं के रूप में घी के ऊपर तैरने लगता है । स्वयं गन्धक ठंडक से पिण्ड के स्वरूप का हो जाता है । इस तरह से शुद्ध गन्धक के सेवन करने पर अपथ्य होने पर भी विकार उत्पन्न नहीं होता । किन्तु अशुद्ध गन्धक सेवन करने पर अपथ्य हो जाय तो वह हालाहल विष की तरह मनुष्य को मार डालता है । गन्धक को पिघला (द्रुत) कर भृङ्गराज के रस मेँ छोड़ने से शुद्ध हो जाता है । इस तरह सात बार करना चाहिए । प्रत्येक समय में भृङ्गराज का रस बदलना चाहिये और गन्धक को उष्ण जल से धोना चाहिए ॥ २१–२३ ॥
मतान्तरम्—
गन्धको द्रावितो भृङ्गरसे क्षिप्तो विशुध्यति ।
तद्रसैः सप्तधा भिन्नो गन्धकः परिशुध्यति ॥ २४ ॥
अथवा गन्धक को द्रुत करके सात बार भृङ्गराज (भांगरे) के रस में बुझाने से भी शुद्धि हो जाती है अथवा भृङ्गराज के स्वरस से आप्लावित करके सूर्योदय से सूर्यास्त तक घोटे’ । इस तरह सात बार घोटने से वह शुद्ध हो जाता ॥ २४ ॥
रस० ७