रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः । ११३
अथ शोधनान्तरम्—
कासीसं शुद्धिमाप्नोति पित्तैश्च रजसा स्त्रियाः ॥ ५७ ॥
कासीस को पञ्चपित्त ( वराह, छाग, महिष, मत्स्य, मयूरपित्त, ) और स्त्री के मासिक धर्म कालीन शोणित से भिगो देने पर शुद्धि होती है ॥ ५७ ॥
कासीसप्रयोगः—
बलिना हतकासीसं क्रान्तं कासीसमारितम् ।
उभयं समभागं हि त्रिफलावेल्लसंयुतम् ॥ ५८ ॥
विषमांशघृतक्षौद्रप्लुतं शाणमितं प्रगे ।
सेवितं हन्ति वेगेन श्वित्रं पाण्डुक्षयामयम् ॥ ५९ ॥
गुल्मप्लीहगदं शूलं मूलरोगं विशेषतः ।
रसायनविधानेन सेवितं वत्सरावधि ॥ ६० ॥
आमसंशोषणं श्रेष्ठं मन्दाग्निपरदीपनम् ।
पलितं वलिभिः सार्धं विनाशयति निश्चितम् ॥ ६१ ॥
इति कासीसाधिकारः ।
गन्धक से मारण की हुई कासीस भस्म और कासीस से मारण की हुई लौह भस्म या वैक्रान्तभस्म इन दोनों को समान भाग लेकर खरल में घोट लें इसमें से एक शाण (चोअन्नी) भर लेकर त्रिफला चूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण विषम मात्रा से घृत तथा मधु मिलाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करने से श्वेत कुष्ठ, पाण्डु, क्षयरोग, पञ्चप्रकार के गुल्म, प्लीहवृद्धि, शूल, अर्श नष्ट होते हैं । इस योग को रसायन-विधि से एकवर्ष पर्यन्त सेवन करने से आंवरोग सूख जाता है, मन्दाग्नि दीप्त हो जाती है, बालों का श्वेत होना तथा गिरना दोनों रोग निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ५८-६१ ॥
अथ तुवरीनिरूपणम्—
तुवरीपरिचयः—
सौराष्ट्राश्मनि सम्भूता मृत्स्ना सा तुवरी मता ।
वस्त्रेषु लिप्यते यासौ मञ्जिष्ठारागबन्धिनी ॥ ६२ ॥
सोराष्ट्रदेश के पत्थरों की खान से पैदा होने वाली मृत्तिका को तुवरी
रस० ८