रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
Page 197 of 362
Read in contextतृतीयोऽध्यायः । १०७
गन्धक बहुतायत के साथ प्राप्त किया जा सकता है। यहां के ताम्र के खनिजों का व्यापार उसी दशा में लाभ कारक हो सकता है जब बड़े पैमानों पर काम किया जाय।
बम्बई—
सिन्ध के गिजरी बन्दर ( Ghizri bunder ) पर गन्धक के जमाव का पता लगाया गया है। यहां के खनिजों से ६० फी सदी गन्धक प्राप्त किया जा सकता है। किसी समय “लाकि” ( Laki ) नामक स्थान के स्रोतों के स्राव से जो गन्धक के जमाव “जामा” ( Scum ) के रूप में बनते थे, उनसे वहां के ग्राम्यजन गन्धक निकालने का अध्यवसाय करते थे । किन्तु व्यापारिक लाभ के लिये यहां की गन्धक पर्याप्त नहीं समझी जाती ।
बर्मा ( Burma )
सन् १८७३ में स्ट्रोवर ( Strover ) नामक विद्वान ने लिखा है कि वर्मा राजाओं के राज्य काल में अपर वर्मा में अनेक स्थानों से २८००० बिस ( एक बर्मा तौल ) गन्धक रौप्यमाक्षिक से उड़ा कर प्रति वर्ष निकाला जाता रहा है। बर्मा में गन्धक व्यवसाय का मुख्य केन्द्र जोन्स ( Jones ) के लेखानुसार “मासुन” ( Mowsun ) नामक प्रान्त के समीप में रहा है।
दक्षिणी शान राज्यों ( Southern Shan states ) में भी गन्धक निकालने का व्यवसाय अब तक होता रहा है। शान राज्यों की अनेक प्रकार की स्फटिक शिलाओं में रौप्यमाक्षिक पाया गया है। इस रौप्यमाक्षिक से गन्धक निकालने का कारोबार चल सकता है। यहां के रौप्यमाक्षिक में सुवर्ण, रजत आदि बहुमूल्य खनिज प्राप्त नहीं होते । ये स्थान इतने निकट हैं कि यहां पर रौप्यमाक्षिक से गन्ध-काम्ल बनाने का व्यवसाय लाभ पूर्वक नहीं चलाया जा सकता ।
दक्षिण हैदराबाद—
के गुलबर्ग ( Gulbarg ) जिले में मुदानूर ( Mudanur ) नामक स्थान पर आधिक्य से रौप्यमाक्षिक प्राप्त होता है, जिससे गन्धक निकालने का व्यवसाय किसी जमाने में होता रहा है।
कश्मीर—
के बाल्टिस्तान ( Baltistan ) जिले में अनेक उष्ण-स्रोतों से गन्धक का जमाव होता है। रूपशु ( Rupshu ) जिले की पुगा घाटी ( Puga valley ) के उष्ण-स्रोत-सम्बन्धी गन्धकीय जमाव से काश्मीर दरबार की तरफ से गन्धक निकालने का कारोबार हुआ करता था, यहां शीत अधिक होने के कारण केवल वर्ष में चार मास तक ही कारखाना चलता था, जिससे गन्धक की वार्षिक निकासी २०-२५ टन हो जाया करती थी।