रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context९६ | रसरत्नसमुच्चये—
दुर्लभः कृष्णवर्णश्च स जरामृत्युनाशनः ॥ १६ ॥
हे देवि ! वह गन्धक तीन प्रकारका है । प्रथम तोते की चोञ्च के समान लाल वर्ण वाला होता है वह उत्तम है। दूसरा पीले वर्ण का होता है वह मध्यम होता है। तृतीय श्वेत वर्ण का होता है वह अधम है। कुछ लोगों का मत है कि श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार तरह का होता है । इन में श्वेत गन्धक को खटिक कहते हैं । क्यों कि यह खड़िया के समान सफेद होता है । यह लेप करने में तथा लौह मारण में काम आता है और जो गन्धक पीले वर्ण का होता है उसे आमला सार गन्धक कहते हैं । इसी का एक दूसरा भेद होता है, उस का नाम शुक पिच्छ है, वह रस और रसायन में श्रेष्ठ होता है । जो गन्धक तोते की चोञ्च समान होता है वह सोना, चांदी इत्यादि धातुओं के बनाने में श्रेष्ठ होता है। जो कृष्ण वर्ण का गन्धक होता है वह जरा और मृत्यु को नष्ट करता है किन्तु वह दुर्लभ है ॥ १३-१६ ॥
अथ गन्धकगुणाः—
गन्धाश्मातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णो मतः ।
कण्डूकुष्ठविसर्पदद्रुदलनो दीप्तानलः पाचनः ॥
आमोन्मोचनशोषणो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः ।
गौरीपुष्पभवस्तथा कृमिहरःसत्त्वात्मकः सूतजित् ॥ १७ ॥
बलिना सेवितः पूर्वं प्रभूतबलहेतवे ॥ १८ ॥
गन्धक श्रेष्ठ रसायन है तथा स्वाद में मधुर तथा पाक में कटु एवं उष्ण है । यह खुजली, कुष्ठ, विसर्प ( फैलने वाली खुजली ) और दद्रु को नष्ट करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है, अग्नि दीप्त करता है, आंव को दूर करता है तथा उस का शोषक है, विषनाशक तथा पारद के गुणों का उत्कर्ष बढ़ाता है । प्लीहावृद्धि, आध्मान और कृमियों को नष्ट करता है । सत्त्वस्वरूप गन्धक पारद को जीतने वाला है। पूर्वकाल में शक्ति प्राप्ति के लिये राजा बली ने इस का सेवन किया था ॥ १७-१८ ॥
अथ बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिः—
वासुकिं कर्षतस्तस्य तन्मुखज्वालया द्रुता ।
वसा गन्धकगन्धाढ्या सर्वतो निःसृता तनोः ॥ १६ ॥
गन्धकत्वं च सम्प्राप्ता गन्धोऽभूत्सविषःस्मृतः ।