रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in context११२ रसरत्नसमुच्चये—
Acid) सिद्ध हुआ है । इस निर्णय के पहिले इसको कसीस का तैल कहते थे । इसके निकल जाने से जो पदार्थ शेष रहता है वह कासीस के गुणधर्मों से भिन्न होता है । इस द्रव्यका रङ्ग कपिल होता है तथा जल में डालने से यह बिलकुल अविलय ( In Soluble ) है तथा देखने में भी मोरचे के समान प्रतीत होता है । जो क्रिस्टल स्वरूप कासीस है, उसे पुष्पकासीस समझना चाहिए और उसका सूत्र यह ( Fe Soy TH 20 ) है । जो आक्साई के रूप में हो जाता है उसको वालु कासीस समझना चाहिए, तथा उसका सूत्र ( Fe Soy ) है । प्रायः औषध कर्म में पुष्प कासीस को ही अधिक गुणकर होने से ग्रहण करना चाहिए ।
वालुकासीसगुणाः—
क्षाराम्लागुरुधूमाभं सोष्णवीर्यं विषापहम् ।
वालुकापूर्वकासीसं श्वित्रघ्नं केशरञ्जनम् ॥ ५३ ॥
बालुकाकासीस क्षार, अम्ल और गुरु होता है तथा वर्ण में धूएं के सदृश होता है और वीर्य में उष्ण और विष विकारों को विनष्ट कर देता है तथा सफेद कुष्ठ को नष्ट करता है और केशों को काले रंग का कर देता है ॥ ५३ ॥
पुष्पकासीसगुणाः—
पुष्पादिकासीसमतिप्रशस्तं सोष्णं कषायाम्लमतीव नेत्र्यम् ।
विषानिलश्लेष्मगदव्रणघ्नं श्वित्रक्षयघ्नं कचरञ्जनञ्च ॥ ५४ ॥
पुष्प कासीस औषध कर्म में श्रेष्ठ है । यह उष्णवीर्य, कषाय और अम्ल होता है । नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर है और विषवाधा, वात और कफ से जन्यरोग, व्रण तथा श्वेतकुष्ठ को नष्ट करता है, शिर के बालों को काला करता है ॥ ५४ ॥
कासीसशोधनम्—
सकृद्भृङ्गाम्बुना क्लिन्नं कासीसं निर्मलं भवेत् ॥ ५५ ॥
कासीस का चूर्ण कर भृङ्गराज के स्वरस या क्वाथ में एक बार भिगो देने से शुद्ध हो जाता है ॥ ५५ ॥
सत्त्वग्रहणनिर्देशः—
तुवरीसत्त्ववत्सत्त्वमेतस्यापि समाहरेत् ॥ ५६ ॥
वक्ष्यमाण तुवरी ( फिटकरी ) के सत्त्व के निष्कासन की विधि के समान इसका भी सत्त्व निकाल कर ग्रहण करना चाहिए ॥ ५६ ॥