रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
प्रारंभिक संक्षिप्त जीवन-चरित्र एवं परिचय
संतबानी
संतबानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जगत्-प्रसिद्ध महात्माओं की
बानी और उपदेश को, जिन का लोप होता जाता है, बचा लेने का है । जितनी बानियाँ
हमने छापी हैं उन में से विशेष तो पहिले छपी नहीं थीं और जो छपी थीँ सो
प्रायः ऐसे छिन्न भिन्न और बेजोड़ रूप में या क्षेपक और त्रुटि से भरी हुई कि उन
से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था ।
हमने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ हस्तलिखित दुर्लभ
ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक मिल सके असल या नक़ल कराके मँगवाये ।
भरसक तो पूरे ग्रंथ छापे गये हैं, और फुटकर शब्दों की हालत में सर्व-साधारण
के उपकारक पद चुन लिये हैं, प्राय कोई पुस्तक बिना दो लिपियों का मुक़ाबला
किये और ठीक रीति से शोधे नहीं छापी गई है और कठिन और अनूठे शब्दों के
अर्थ और सकेत फ़ुट-नोट में दे दिये हैं । जिन महात्मा की बानी है उनका
जीवन-चरित्र भी साथ ही छापा गया है और जिन भक्तों और महापुरुषों के नाम
किसी बानी में आये हैं उनके वृत्तांत और कौतुक संक्षेप से फ़ुट-नोट में लिख
दिये गये हैं ।
दो अंतिम पुस्तकें इस पुस्तक माला की अर्थात् “सतबानी संग्रह” भाग १
[ साखी ] और भाग २ [ शब्द ] छप चुकीँ जिन का नमूना देखकर महा-
महोपाध्याय श्री पंडित सुधाकर द्विवेदी वैकुंठ-वासी ने गद्गद होकर कहा था—
“न भूतो न भविष्यति” ।
एक अनूठी और अद्वितीय पुस्तक महात्माओँ और बुद्धिमानों के बचनों की
“लोक परलोक हितकारी” नाम की गद्य में सन् १९१६ में छपी है जिसके विषय
में श्रीमान् महाराज काशी नरेश ने लिखा है—“वह उपकारी शिक्षाओँ का अचरजी
संग्रह है जो सोने के तोल सस्ता है” ।
पाठक महाशयोँ की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोष उन
की दृष्टि में आवें उन्हें हम को कृपा करके लिख भेजें जिस से वह दूसरे छापे में
दूर कर दिये जावें ।
हिन्दी में और भी अनूठी पुस्तकें छपी हैं जिनमें प्रेम कहानियों के द्वा
शिक्षा बतलाई गई हैं—उनके नाम और दाम इस पुस्तक के अन्त वाले पृ
में देखिए ।
मैनेजर, वेलवेडियर छापाखाना,
रैदास जी का जीवन-चरित्र
रैदास जी जाति के चमार एक भारी भक्त हो गये हैं जिनका नाम हिन्दु-
स्तान वरन् और देशों में भी प्रसिद्ध है । यह कबीर साहिब के समय में वर्तमान
थे और इस हिसाब से इनका ज़माना ईसवी सन् की चौदहवीं सदी (शतक)
ठहरता है ।
यह महात्मा भी कबीर साहिब की तरह काशी में पैदा हुए । कहते हैं कि
कबीर साहिब के साथ इनका परमार्थी संबाद कई बार हुआ जिसमें इन्होंने
वेद शास्त्र आदि का मंडन और कबीर साहिब ने खंडन किया है। जो हो,
पर इस ग्रंथ के देखने से तो यही मालूम होता है कि रैदास जी को वेद
शास्त्रों में कुछ भी श्रद्धा न थी।
कथा है कि पहले जनम में रैदास जी बाम्हन थे । स्वामी रामानन्द जी से
उपदेश लिया था और उनकी सेवा में लगे रहते थे । एक दिन अपने गुरू के
भोजन के लिये एक बनिया से सामग्री ले आये जिसका न्यौहार चमारों के
साथ भी था । इस हाल के जानने पर रामानंद जी ने क्रोध से सराप दिया
कि तुम चमार का जनम पावोगे । इस पर, रैदास जी चोला छोड़ कर एक
रग्घू नाम चमार के घर घुरबिनिया चमाइन से पैदा हुए परन्तु पूरवने जोग के
बल से उनको पिछले जनम की सुध न बिसरी और अपनी मा की छाती में
मुँह न लगाया जब तक कि भगवन्त की आज्ञा से रामानन्द जी ने चमार के घर
आप जाकर रैदास जी को मा का दूध पीने की समझौती नहीं दी । स्वामी
रामानन्द जी ने लड़के का नाम रविदास रक्खा, पीछे से लोग उन्हें रैदास
रैदास कहने लगे ।
जब रैदास जी सयाने हुए तो भक्तों और साधुवों की सेवा में सदा रहने
लगे । साधु सेवा में ऐसा मन लग गया कि जो कुछ हाथ आता उन के खिलाने
पिलाने और सत्कार में खर्च कर डालते । यह चाल उनके बाप रग्घू को, जो
चमड़े के रोज़गार से बड़ा धनी हो गया था, नहीं सुहाई और रैदास जी को
अपने घर से निकाल कर पिछवाड़े की जमीन रहने को दे दी जहाँ छप्पर तक
नहीं था । एक कौड़ी खर्च को नहीं देता था । रैदास जी वहाँ अकेले अपनी
नों का टहर बनाये हुए है जिसका उसे अधिकार नहीं है इसलिये दंड`
- Look at 'वाम्हनों': yes, 'वाम्हनों'.
- Look at 'टहर': wait, look at 'टहर' vs 'टहल':
Wait, is that a 'ह'? Wait, could it be 'टहल' or 'टहर'? Look at the second letter: it's definitely 'ह'. Third letter: 'र'. Let's write 'टहर'. - Look at 'जिसका' : wait, after 'जिसका' there is a comma: 'जिसका,'.
- Look at 'इसलिये' : 'इसलिये'.
- 'दंड' : 'दंड'.
Line 20: का भागी है। राजा ने रैदास जी को बुलाकर हाल पूछा और उनके वचन
Line 21: से ऐसा प्रसन्न हुआ कि दंड देने के बदले बड़ा आदर किया।
- 'बड़ा' or 'बड़ा'? It's 'बड़ा'.
Line 22: भक्तमाल में लिखा है कि चित्तौड़ की रानी ने जो काशी में यात्रा के लिये
- 'काशी में यात्रा' : there is a small vertical dash under 'में'? No, between 'काशी' and 'यात्रा' there is 'में'.
Line 23: आई थी रैदास जी की महिमा सुनकर उनको अपना गुरू बनाया। यह गति
- 'गुरू' : 'गुरू' (or 'गुरु'? It has a loop: 'ग
( ३ )
प्रेम और दीनभाव से प्रार्थना की तो मूरत तुरत ही सिंहासन छोड़ कर रैदास
जी की गोद में आ बैठी—सब देखकर चकित हो गये।
भक्तमाल में रैदास जी की महिमा के दृष्टांत में यह भी वरनन है कि जब
चित्तौड़ की रानी जिसका नाम झाली लिखा है अपनी राजधानी को लौटी
तो बड़े आदर भाव से रैदास जी को बुलाया और उनके सुशोभित होने के उत्सव
में नगर के बाम्हनों को बहुत कुछ दान दिया और अपने यहाँ भोजन कराने के
लिये उनको नेवता दिया। बाम्हनों ने लालचवस नेवता तो मान लिया परन्तु चमार
की चेली के घर का बना हुआ भोजन करना धर्म के विरुद्ध समझ कर कोरा
सीधा लेकर अपने हाथ से भोजन बनाया। जब खाने पर बैठे तो देखते क्या हैं कि
हर पंगत में दो दो बाम्हनों के बीच में रैदास जी बैठे हैं—इस अचरजी कौतुक
पर सब हक्के-बक्के हो गये और कितनों ने चरनों पर गिर कर रैदास जी से दीक्षा
ली। रैदास जी ने अपने कंधे की खलड़ी को उधेड़ कर जनेऊ दिखलाया कि सच्चा भीतर
का जनेऊ यह है।
यह कथा सर्व साधारण में मीराबाई के भोज के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है और
बहुतों का विश्वास है कि यह चित्तौड़ की रानी जिसने रैदास जी से उपदेश
लिया और उनका नेवता किया मीरा बाई थी पर इसके निर्णय की यहाँ आवश्यकता
नहीं है।
यह कथा भी प्रसिद्ध है कि एक बड़े रईस रैदास जी की महिमा सुन कर
उनके दर्शन और सतसंग को गये। उन के आश्रम पर पहुँच कर देखा कि
एक बूढ़ा चमार और उसके साथ बहुत और चमार बैठे जूते बना रहे हैं।
थोड़ी देर पीछे सतसंग हुआ और उसके उपरांत एक चमार एक बड़े जूते में
भर कर रैदास जी का चरनामृत लाया और सब को बाँटा, जब रईस साहिब
की बारी आई तो उन्हों ने उसे ले तो लिया पर घिन मान कर अपने सिर से
उछाल कर पीछे गिरा दिया जो कि उन के अँगरखे में सूख गया। जब घर लौटे
तो शुद्ध होने के लिये कपड़े उतार कर भंगी को दे दिये और आप पंच गव्य
स्नान किया। उसी दिन से उन को गलित कोढ़ होने लगा और भंगी की जिस
ने चरनामृत पड़ा हुआ कपड़ा पहिना सोने समान देह निकल आई और चेहरे
पर बड़ा तेज आ गया। रईस साहब ने बहुत कुछ दवा की पर जब अच्छे न हुए
तो अपने मुसाहिबों की सलाह से फिर रैदास जी के आश्रम पर चरनामृत की
आसा में आये; उस दिन चरनामृत नहीं बँटा। तब रईस ने रैदास जी से प्रार्थना की
( ४ )
कि चरनामृत मिले। जवाब पाया कि अब जो चरनामृत आवेगा वह केवल
पानी होगा उसमें दया की मौज शामिल न होगी और मौज पर हमारा बस
नहीं है। फिर कुछ दिन पीछे बहुत झुरने पछताने पर रैदास जी की दयादृष्टि से
रईस अच्छा हो गया।
काशी गवर्नमेंट संस्कृत पाठशाला के सन् १६०७ के एक परीक्षापत्र में
नीचे लिखी हुई कथा संस्कृत में अनुवाद करने को छपी थी जिसे हम यहाँ
लिखते हैं—
"इस संसार में वही आदमी ऊँचा कहा जाता है जो कि ऊँचा काम करे,
ऊँचे घर में पैदा होने से ऊँचा नहीं कहलाता । देखो आग से धुआँ पैदा होता
है, वह हवा के संग से आसमान में भी बहुत दूर तक चढ़ जाता है पर लोगों
की आँख में पड़ कर तकलीफ ही देता है, इसीलिये लोग धुएँ को बुरा कहते
हैं। आग से कभी कभी बहुत लोग जल कर मर जाते हैं। गाँव के गाँव राख
हो जाते हैं तौ भी उस से बहुत फायदा होता है, इस लिये सब लोग उसे
पसन्द करते हैं । ऊँची जाति में पैदा होने का जो लोग घमन्ड करते हैं उन्हे
अच्छे लोग नादान समझते हैं । बनारस में एक बाम्हन किसी रघुवंसी छत्री
की ओर से रोज गंगा जी को फूल पान और सोपारी चढ़ाने जाता था। एक
दिन वह बाम्हन जूता खरीदने के लिये रैदास चमार की दूकान पर गया। बात
बात में वहाँ पर गगा पूजा की चर्चा चल पड़ी । रैदास ने कहा कि मैं आप को
यों ही जूता देता हूँ, कृपा कर आज मेरी इस सोपारी को भी गगा जी को चढ़ा
देना। बाम्हन ने उस सोपारी को जेब में रख लिया। दूसरे दिन गगा में नहा धो
कर जजमान की सोपारी इत्यादि को चढ़ा कर पीछे से चलती वेरा जेब में से
रैदास की सोपारी को निकाल कर दूर से गगा जी में फेंका। गगा जी ने पानी में से
हाथ ऊँचा कर उस सोपारी को ले लिया। यह तमाशा देख कर वह बाम्हन कहने लगा
कि सच है—
“जाति पाँति पूछै नहिँ कोई । हरि को भजै सो हरि को होई ॥”
रैदास जी पूरी अवस्था को पहुँच कर अर्थात् १२० बरस के होकर ब्रह्म -
पद को सिधारे और उनके पंथ के अनुयाइयों का विश्वास है कि यह कबीर
साहिब की भाँति सदेह गुप्त हो गये बरन अपनी बानी को भी साथ ले गये !!!
गुजरात प्रान्त में इस मत के लाखों आदमी हैं जो अपने को रविदासी
कहते हैं।
": wait, above the word, there is a mark: an anusvara/candrabindu.
Wait, look closely at that word:
ह - ा - र - य - ौँ -> in old fonts, conjunct र्य is written as र + य or with reph. But wait, if reph is used, it's on य: र्य.
Wait, here: ह ा र [something] ौ ?
Wait, is it "हारथौँ"? In Brajbhasha / Santbhasha, "हारथौँ" does not exist, but "हार्यौ" / "हार्यो" does!
Wait, look at "हारथौ" - wait, could it be "हार्योँ"?
Look at the reph: there is a curve above, like reph, but it's attached? No, look at:
ह (ha) + ा (aa) + र (ra) + थ (tha) ? Wait, no! Look at:
ह - ा - र - य - ौँ: wait, look at 'य' in 'आयौँ': य has a left curve, then goes right and up to the bar.
In this word: ह - ा - र - थ? No, it's ह - ा - र - थ - ौँ - wait! Could it be "हार्यौ"?
Wait, look at the letter: ह, ा, then र? No, that's not र! That's a letter with a loop:
( २ )
शब्द पृष्ठ
न
नरहरि चंचल है मति ... ७
नरहरि प्रगटसि ना हो . ९
नाम तुम्हारो आरतभजन .. ४१
प
परचै राम रमै जो कोई . २
प्रभुजी संगति सरन .. ४२
पहिले पहरे रैन दे . .. १४
पार गया चाहै सब कोई ... २१
पावन जस माधो तेरा . ३१
प्रीति सुधारन आव ३५
ब
बरजि हो बरजिवी ... १७
बापुरो सत रैदास कहै रे . २२
बंदे जानि साहिब गनी १८
भ
भगती ऐसी सुनहु रे .. ९
भाई रे भरम भगति . ५
भाई रे राम कहाँ ... ६
भाई रे सहज बड़ो लोई २०
भेष लियो पै भेद न जान्यो . २६
म
मन मेरो सत्त सरूप ... २५
मरम कैसे पाइव रे . १४
माधवे कहियत .. २४
माधो अविद्या हित कीन्ह २०
माधो भरम कैसेहु ... २५
म । संगत सरति .. १९
शब्द पृष्ठ
माया मोहिला कान्हा ... ३४
मैं का जानूँ देव .. ३८
मैं वेदनि कासनि आखूँ ... २९
य
यह अँदेश सोच जिय मेरे . २२
या रामा एक तूँ दाना .. १६
र
रथ को चतुर चलावन हारो ... २३
राम बिन संसय ... ८
राम भगत को जन ... ४
राम मैं पूजा कहा चढ़ाऊँ .. १८
रामराय का कहिये यह ऐसी ... २२
रामा हो जग जीवन मोरा ११
रे चित चेत अचेत काहे .. २३
रे मन माझला संसार समुंदे ... २३
स
सब कछु करत . ३६
साखी १
सुकछु बिचारथो .. .. १९
सो कहा जानै पीर पराई ... ३१
संत उतारैं आरती ... ४०
सतो अनिन भगति . ८
ह
हरि को टांडौ लादै जाइ रे .. ३५
हरि बिन नहिं कोइ .. ३०
है सब आतम सुख ... १३
त्र
त्राहि त्राहि त्रिभुवनपति .. ३९
रैदासजी की बानी
॥ साखी ॥
हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस ।
ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ॥ १ ॥
अंतरगति राचैँ नहीं, बाहर कथैँ उदास ।
ते नर जम पुर जाहिँगे, संत भाषै रैदास ॥ २ ॥
रैदास कहै जाके हृदै, रहै रैन दिन राम ।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम ॥ ३ ॥
जा देखे घिन ऊपजै, नरक कुंड मैं बास ।
प्रेम भगति सौँ ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ॥ ४ ॥
रैदास तूँ कावँच१ फली, तुझे न छीपै२ कोइ ।
तैँ निज नाँवँ न जानिया, भला कहाँ ते होइ ॥ ५ ॥
रैदास राति न सोइये, दिवस न करिये स्वाद ।
अह-निसि३ हरिजी सुमिरिये, छाड़ि सकल प्रतिबाद ॥ ६ ॥
॥ पद ॥
राग रामकली
॥ १ ॥
परचै राम रमै जो कोई ।
या रस परसे दुबिध न होई ॥टेक॥
जे दीसे ते सकल बिनास ।
अनदीठे नाहीँ बिसवास ॥ १ ॥
बरन कहंत कहैँ जे राम ।
सो भगता केवल निःकाम ॥२॥
१ किवाँच जिस के बदन मैं छू जाने से खाज पैदा हो कर ददोरे पड़ जाते हैं।
२ छुए। ३ दिन रात ।
( २ )
फलकारन फूलै बनराई ।
उपजै फल तब पुहुप बिलाई ॥ ३ ॥
ज्ञानहि कारन करम कराई ।
उपजै ज्ञान त करम नसाई ॥ ४ ॥
बट क बीज जैसा आकार ।
पसरयौ तीन लोक पासार ॥ ५ ॥
जहँ का उपजा तहाँ बिलाइ ।
सहज सुन्नि मेँ रह्यो लुकाइ ॥ ६ ॥
जे मन बिंदै सोई बिंद ।
अमा¹ समय ज्योँ दीसै चंद ॥ ७ ॥
जल मेँ जैसे तूँबा तिरै ।
परिचै² पिंड जीव नहिँ मरै ॥ ८ ॥
सो मन कौन जो मन को खाइ ।
बिन \डोरे तिरलोक समाइ ॥ ९ ॥
मन की महिमा सब कोइ कहै ।
पंडित सो जो अनतै रहै ॥ १० ॥
कह रैदास यह परम बैराग ।
राम नाम किन³ जपहु सभाग ॥ ११ ॥
घृत कारन दधि मथै सयान ।
जीवनमुक्ति सदा निरबान ॥ १२ ॥
॥ २ ॥
अब मैं हार्योँ रे भाई ।
कित भयोँ सब हाल चाल ते, लोक न बेद बड़ाई ॥टेक॥
१ अमावस । २ परिचय हो जाने से पिंड़ का भेद जान ले तो जीवनमुक्त हो
य । ३ क्यों न ।
( ३ )
थकित भयो गायन अरु नाचन, थाकी सेवा पूजा ।
काम क्रोध ते देह थकित भइ, कहौँ कहाँ लौँ दूजा ॥१॥
राम जनहूँ ना भगत कहाऊँ, चरन पखारूँ न देवा ।
जोइ जोइ करौँ उलटि मोहिँ बाँधैँ, ता तैँ निकट न भेवा ॥२॥
पहिले ज्ञान क किया चाँदना, पाछे दिया बुझाई ।
सुन्न सहज मैं दोऊ त्यागे, राम न कहुँ दुखदाई ॥३॥
दूर बसे षट कर्म सकल अरु, दूरउ कीन्हे सेऊ ।
ज्ञान-ध्यान दूर दोउ कीन्हे, दूरिउ छाड़े तेऊ ॥४॥
पाँचो थकित भये हैं जहँ तहँ, जहाँ तहाँ थिति१ पाई ।
जा कारन मैं दौरौ फिरतो, सो अब घट मैं आई ॥५॥
पाँचो मेरी सखी सहेली, तिन निधि दई दिखाई ।
अब मन फूलि भयो जग महियाँ, आप मैं उलटि समाई ॥६॥
चलत चलत मेरो निज मन थाक्यो, अब मोसे चलो न जाई ।
सांई सहज मिलौ सोइ सनमुख, कह रैदास बड़ाई ॥७॥
॥ ३ ॥
गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ ।
गावनहार को निकट बताऊँ ॥टेक॥
जब लग है या तन की आसा, तब लग करै पुकारा ।
जब मन मिल्यौ आस नहिँ तन की, तब को गावनहारा ॥१॥
जब लग नदी न समुद समावै, तब लग बढ़ै हँकारा ।
जब मन मिल्यौ राम सागर सौँ, तब यह मिटी पुकारा ॥२॥
जब लग भगति मुकति की आसा, परम तत्व सुनि गावै ।
जहँ जहँ आस धरत है यह मन, तहँ तहँ कछू न पावै ॥३॥
छाड़ै आस निरास परम पद, तब सुख सति कर होई ।
कह रैदास जासौँ और करत है, परम तत्त्व अब सोई ॥४॥
१ स्थिति=ठहराव ।
प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु-भक्ति एवं आत्म-ज्ञान)
( ४ )
॥ ४ ॥
राम भगत को जन न कहाऊँ, सेवा करूँ न दासाँ ।
जोग जग्य गुन कछू न जानूँ, ताते रहूँ उदासा ॥टेक॥
भगत हुआ तो चढ़ै बड़ाई, जोग करूँ जग मानै ।
गुन हुआ तो गुनी जन कहै, गुनी आप को आनै ॥१॥
ना मैंँ ममता मोह न महिया१, ये सब जाहिँ बिलाई ।
दोजख भिस्त दोउ सम कर जानौँ, दुहुँ ते तरक है भाई ॥२॥
मैंँ अरु ममता देखि सकल जग, मैंँ से मूल गँवाई ।
जब मन ममता एक एक मन, तबहि एक है भाई ॥३॥
कृस्न करीम रोम हरि राघव, जब लग एक न पेखा ।
बेद कतेब कुरान पुरानन, सहज एक नहिँ देखा ॥४॥
जोइ जोइ पूजिय सोइ सोइ काँची, सहज भाव सत होई ।
कह रैदास मैंँ ताहि को पूजूँ, जाके ठावैँ नावैँ नहिँ होई ।
॥ ५ ॥
अब मेरी बूड़ी रे भाई, ताते चढ़ी लोक बड़ाई ॥टेक॥
अति अहंकार उर माँ सत रज तम, तामैँ रह्यौ उरझाई ।
कर्मन बझि पर्यौ कछू नहिँ सूझै, स्वामी नावैँ भुलाई ॥१॥
हम मानौ गुनी जोग सुनि जुगता, महा मुरुख रे भाई ।
हम मानो सूर सकल बिधि त्यागी, ममता नहीं मिटाई ॥२॥
हम मानो अखिल२ सुन्न मन सोध्यो, सब चेतन सुधि पाई ।
ज्ञान ध्यान सबही हम जान्यो, बूझौँ कौन सौँ जाई ॥३॥
हम जानौ प्रेम प्रेम रस जाने, नौबिधि भगति कराई ।
स्वाँग देखि सब ही जन लटक्यो, फिरि यौँ आन बँधाई ॥४॥
१ मथा । २ संपूर्ण ।
( ५ )
यह तौ स्वाँग साँच ना जानो, लोगन यह भरमाई ।
स्वच्छ रूप सेली जब पहरी, बोली तब सुधि आई ॥५॥
ऐसी भगति हमारी संतो, प्रभुता इहइ बड़ाई ।
आपन अनत और नहिँ मानत, ताते मूल गँवाई ॥६॥
भन रैदास उदास ताहि ते, अब कछु मो पै करयो न जाई ।
आपा खोए भगति होत है, तब रहै अंतर उरझाई ॥७॥
॥ ६ ॥
भाई रे भरम भगति सुजान ।
जौ लौँ साँच सौँ नहिँ पहिचान ॥टेक॥
भरम नाचन भरम गायन, भरम जप तप दान ।
भरम सेवा भरम पूजा, भरम सो पहिचान ॥१॥
भरम षट क्रम सकल सहता, भरम गृह बन जानि ।
भरम करि करि करम कीये, भरम की यह बानि ॥२॥
भरम इंद्री निग्रह कीया, भरम गुफा मेँ बास ।
भरम तौ लौँ जानिये, सुन्न की करै आस ॥३॥
भरम सुद्ध सरीर तौ लौँ, भरम नावाँ बिनावाँ ।
भरम भनि रैदास तौ लौँ, जौ लौँ चाहै ठावाँ ॥४॥
॥ ७ ॥
ज्योँ तुम कारन केसवे, अंतर लव लागी ।
एक अनूपम अनुभवी, किमि होइ विभागी ॥टेक॥
इक अभिमानी चातृगा१, बिचरत जग माहीं ।
यद्यपि जल पूरन मही, कहूँ वा रुचि नाहीं ॥१॥
जैसे कामी देखि कामिनी, हृदय सूल उपजाई ।
कोटि बैद बिधि उच्चरै, वा की बिथा न जाई ॥२॥
जो तेहि चाहै सो मिलै, आरत गति होई ।
कह रैदास यह गोप नहिँ, जानै सब कोई ॥ ३ ॥
१ चातक, पपीहा।
( ६ )
॥ ८ ॥
आयौँ हो आयौँ देव तुम सरना ।
जानि कृपा कीजे अपनौ जना ॥टेक॥
त्रिबिध जोनि वास जम को अगम त्रास,
तुम्हरे भजन बिन भ्रमत फिरौँ ।
ममता अहं विषै मद मातौ,
यह सुख कबहुँ न दुतर१ तिरौँ ॥१॥
तुम्हरे नावँ बिसाम छाड़ी है आन की आस,
संसार धरम मेरो मन न धीजै२ ।
रैदास दास की सेवा मानि हो देव विधि देव,
पतित पावन नाम प्रगट कीजै ॥२॥
॥ ९ ॥
भाई रे राम कहाँ मोहिँ बताओ ।
सत राम ता के निकट न आयौ ॥टेक॥
राम कहत सब जगत भुलाना, सो यह राम न होई ।
करम अकरम करुनामय केसो, करता नावँ सु कोई ॥१॥
जा रामहीँ सबै जग जानै, भरम भुले रे भाई ।
आप आप तैँ कोइ न जानै, कहै कौन सो जाई ॥२॥
सत तन लोभ परस जीतै मन, गुना प्रश्न नहिँ जाई ।
अलख नाम जाको ठौर न कतहूँ, क्यों न कहो समुझाई ॥३॥
भन रैदास उदास ताहि ते, करता क्यों है भाई ।
केवल करता एक सही सिर, सत्त राम तेहि ठाईँ ॥४॥
॥ १० ॥
ऐसो कछु अनभौ कहत न आवै ।
साहिब मिलै तो को बिलगावै ॥टेक॥
१ दुस्तर, कठिन । २ धीर धरै ।
( ७ )
सब मेँ हरि है हरि मेँ सब है, हरि अपनो जिन जाना ।
साखी नहीँ और कोइ दूसर, जाननहार सयाना ॥१॥
बाजीगर सौँ रचि रहा, बाजी का मरम न जाना ।
बाजी झूठ साँच बाजीगर, जाना मन पतियाना ॥२॥
मन थिर होइ तो कोइ न सूझै, जानै जाननहारा ।
कह रैदास बिमल बिबेक सुख, सहज सरूप सँभारा ॥३॥
॥ ११ ॥
अखिल खिलै नहिँ का कहि पंडित, कोइ न कहै समुझाई ।
अबरन बरन रूप नहिँ जा के, कहँ लौ लाइ समाई ॥टेक॥
चंद सूर नहिँ रात दिवस नहिँ, धरनि अकास न भाई ।
करम अकरम नहिँ सुभ असुभ नहिँ, का कहि देहुँ बड़ाई ॥१॥
सीत वायु ऊसन नहिँ सरवत१, काम कुटिल नहिँ होई ।
जोग न भोग क्रिया नहिँ जा के, कहौँ नाम सत सोई ॥२॥
निरंजन निराकार निरलेपी, निरबीकार निसासी ।
काम कुटिलता ही कहि गावैँ, हरहर२ आवै हाँसी ॥३॥
गगन३ धूर४ धूप५ नहिँ जा के, पवन पूर नहिँ पानी ।
गुन निर्गुन कहियत नहिँ जाके, कहौ तुम वात सयानी ॥४॥
याही सों तुम जोग कहत हौ, जब लग आस की पासी६ ।
छुटै तबहि जब मिलै एकही, भन रैदास उदासी ॥५॥
॥ १२ ॥
नरहरि७ चंचल है मति मेरी । कैसे भगति करूँ मैँ तेरी ॥टेक॥
तूँ मोहिँ देखै हौं तोहि देखूँ, प्रीति परस्पर होई ॥१॥
तूँ मोहिँ देखै तोहि न देखूँ, यह मति सब बुधि खोई ॥२॥
१ पानी के ऐसा हो कर चूना। २ ठठाय के। ३ आकाश। ४ पृथ्वी। ५ तेज,
अग्नि। ६ फाँसी। ७ नरसिंह जी अर्थात् ईश्वर के एक अवतार का नाम।
( ८ )
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैंँ देखन नहिँ जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥३॥
मैंँ तैँ तोरि मोरि असमझि सौँ, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृस्न करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥४॥
॥ १३ ॥
राम बिन संसय गाँठि न छूटै ।
काम किरोध लोभ मद माया, इन पंचन मिलि लूटै ॥टेक॥
हम बड़ कबि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संयासी ।
ज्ञानी गुनी सूर हम दाता, याहु कहे मति नासी ॥१॥
पढ़े गुने कछु समुझि न परई, जौँ लौँ भाव न दरसै ।
लोहा हिरन^१ होइ धौँ कैसे, जौँ पारस नहिँ परसै ॥२॥
कह रैदास और असमझ सी, चालि परे भ्रम भोरे ।
एक अधार नाम नरहरि को, जिवन प्रान धन मोरे ॥३॥
॥ १४ ॥
जब राम नाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद समावैगा ॥टेक॥
जे सुख है या रस के परसे, सो सुख का कहि गावैगा ॥१॥
गुरुपरसाद भई अनुभौ मति, बिष अमृत सम धावैगा ॥२॥
कह रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावैगा ॥३॥
॥ १५ ॥
संतो अनिन^२ भगति यह नाहीँ ।
जब लग सिरजत मन पाँचो गुन, ब्यापत है या माहीँ ॥टेक॥
सोई आन अंतर करि हरि सौँ, अपमारग को आनै ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की, पल पल पूजा ठानै ॥१॥
सत्य सनेह इष्ट अँग लावै, अस्थल अस्थल खेलै ।
जो कछु मिलै आन आखत^३ सौँ, सुत दारा सिर मेलै ॥२॥
१ सोना। २ अनन्य, । ३ अक्षत, कुछ चावल ।
( ९ )
हरिजन हरिहि और ना जाने, तजै आन तन त्यागी।
कह रैदास सोई जन निर्मल, निसि दिन जो अनुरागी ॥३॥
॥ १६ ॥
भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आइ भगति तब गई बड़ाई ॥टेक॥
कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे।
कहा भयो जे चरन पखारे, जौँ लौँ तत्त्व न चीन्हे ॥१॥
कहा भयो जे मूँड़ मुड़ायो, कहा तीर्थ ब्रत कीन्हे।
स्वामी दास भगत अरु सेवक, परम तत्त्व नहिँ चीन्हे ॥२॥
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक१ ह्वै चुनि खावै ॥३॥
॥ १७ ॥
अब कछु मरम बिचारा हो हरि।
आदि अंत औसान राम बिन, कोइ न करै निवारा हो हरि ॥टेक॥
जब मैँ पंक पंक२ अमृत जल, जलहि सुद्ध होइ जैसे।
ऐसे करम भरम जग बाँध्यो, छूटै तुम बिन कैसे हो हरि ॥१॥
जप तप बिधी निषेध नाम करूँ, पाप पुन्न दोउ माया।
ऐसे मोहिँ तन मन गति बीमुख जनम जनम डँहकाया३ हो हरि ॥२॥
ताड़न४ छेदन५ त्रायन६ खेदन७, बहु बिधि कर ले उपाई।
लोनखड़ी८ संजोग बिना जस, कनक कलंक न जाई हो हरी ॥३॥
भन रैदास कठिन कलि के बल, कहा उपाय अब कीजै।
भव बूड़त भयभीत जगत जन, करि अवलंबन९ दीजै हो हरी ॥४॥
॥ १८ ॥
नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना हो।
दीनानाथ दयाल नरहरे ॥ टेक ॥
जनमेउँ तौही ते बिगरान। अहो कछु बूझै बहुरि सयान ॥१॥
१ पिपीलिका—चींटी। २ कीचड़। ३ ठगाया। ४ मारना। ५ काटना। ६ रक्षा करना।
७ शोक करना, त्याग करना। ८ नौसादर। ९ सहारा।
२
( १० )
परिवारि बिमुख मोहिँ लागि । कछु समुझि परत नहिँ जागि¹ ॥२॥
यह भौ बिदेस कलिकाल । अहो मैं आइ पर्योँ जमजाल ॥४॥
कबहुक तोर भरोस । जो मैं न कहूँ तो मोर दोस ॥ ४ ।
अस कहिये तेऊ न जान । अहो प्रभु तुम सरबस में सयान ॥५॥
सुत सेवक सदा असोच । ठाकुर पितहिँ सब सोच ॥ ६ ॥
रैदास बिनवै कर जोरि । अहो स्वामी तुम मोहिँ न खोरि² ॥७
सु³ तौ पुरबला अकरम मोर । बलि जाउँ करौ जिन कोर⁴ ॥८॥
॥ १९ ॥
त्यौँ तुम कारन केसवे, लालच जिव लागा ।
निकट नाथ प्रापत नहीँ, मन मोर अभागा ॥टेक॥
सागर सलिल⁵ सरोदिका⁶, जल थल अधिकाई ।
स्वाँति बुंद की आस है, पिउ प्यास न जाई ॥ १ ॥
जौँ रे सनेही चाहिये, चित्त बहु दूरी ।
पंगुल फल न पहुँच ही, कछु साध न पूरी ॥ २ ॥
कह रैदास अकथ कथा, उपनिषद⁷ सुनीजै ।
जस तूँ तस तूँ तस तुहीँ, कस उपमा दीजै ॥ ३ ॥
॥ २० ॥
गोबिंदे भवजल ब्याधि अपारा ।
ता में सूझै वार न पारा ॥टेक॥
अगम घर दूर उरतर, बोलि भरोस न देहू ।
तेरी भगति अरोहन संत अरोहन⁸, मोहिँ चढ़ाइ न लेहू ॥१॥
लोह की नाव पखान बोझी, सुकिरित भाव बिहीना ।
लोभ तरंग मोह भयो काला, मीन भयो मन लीना ॥२॥
दीनानाथ सुनहु मम बिनती, कवने हेत बिलंब करीजै ।
रैदास दास संत चरनन, मोहिँ अब अवलंबन दीजै ॥३॥
१ संसार या जगने पर। २ दोष न विचारो। ३ सो। ४ कसर। ५ पानी
६ तालाब का पानी। ७ वेद का एक अंग जिस में ब्रह्म का निरूपन है। ८ सीढ़ी।
( ५५ )
॥ २१ ॥
कहाँ सूते मुग्ध नर काल के मँझ मुख।
तजिय बस्तु राम चितवत अनेक सुख ॥टेक॥
असहज धीरज लोप कृस्न उधरंत कोप,
मदन भुवंग१ नहिँ मंत्र जंता।
बिखम पावक ज्वाल ताहि वार न पार,
लोभ की अयनी२ ज्ञान हंता ॥१॥
बिखम संसार ब्याल१ ब्याकुल तबै,
मोह गुन बिखै सँग बंधभूता३ ।
टेरि गुन गारुड़ी४ मंत्र स्रवना दियो,
जागि रे राम कहि कहि के सूता ॥२॥
सकल सिम्रित५ जिती सत मति कहै तिती,
हैँ इनही परम गति परम वेता६ ।
ब्रह्म ऋषि नारद संभु सनकादिक,
राम राम रमत गये पार तेता ॥३॥
जजन जाजन७ जाप रटन तीरथ दान,
ओषधी रसिक गदमूल८ देता।
नागदवनि जरजरी राम सुमिरन बरी,
भनत रैदास चेत निमेता९ ॥४॥
॥ २२ ॥
रामा हो जग जीवन मोरा।
तूँ न बिसोरि राम मैं जन तोरा ॥टेक॥
सकट सोच पोच दिन राती।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती ॥१॥
१ सांप। २ सेना, फौज। ३ बँधा हुआ। ४ सांप के विष उतारने का मंत्र।
५ धर्मशास्त्र। ६ जानने वाला। ७ यज्ञ करना और कराना। ८ रोग की जड़ को पैदा
करता है। ९ नियम करने वाला।
( १२ )
हरहु बिपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अलंबन ।
बेगि मिलौ जीन करौ विलंबन ॥३॥
॥ २३ ॥
तेरा जन काहे को बोलै ।
बोलि बोलि अपनी भगति को खोलै ॥टेक॥
बोलत बोलत बढ़ै वियाधी, बोल अबोलै जाई ।
बोलै बोल अबोल कोप करै, बोल बोल को खाई ॥१॥
बोलै ज्ञान मान परि बोलै, बोलै वेद बड़ाई ।
उर मेँ धरि धरि जब ही बोलै, तब ही मूल गँवाई ॥२॥
बोलि बोलि औरहि समझावै, तब लगि समझ न भाई ।
बोलि बोलि समझी जब बूझी, काल सहित सब खाई ॥३॥
बोलै गुरु अरु बोलै चेला, बोल बोल की परतीति आई ।
कह रैदास मगन भयो जबही, तबहि परमनिधि पाई ॥४॥
॥ २४ ॥
ऐसी भगति न होइ रे भाई ।
राम नाम बिन जो कछु करिये, सो सब भरम कहाई ॥टेक॥
भगति न रस दान भगति न कथै ज्ञान ।
भगति न बन मेँ गुफा खुदाई ॥१॥
भगति न ऐसी हाँसी भगति न आसापासी ।
भगति न यह सब कुल कान गँवाई ॥२॥
भगति न इंद्री बाँधा भगति न जोग साधा ।
भगति न अहार घटाई ये सब करम कहाई ॥३॥
भगति न इंद्री साधे भगति न बैराग बाँधे ।
भगति न ये सब वेद बड़ाई ॥४॥
भगति न मूड़ मुड़ाये भगति न माला दिखाये ।
भगति न चरन धुवाये ये सब गुनी जन कहाई ॥५॥
भगति न तौ लौं जाना आप को आप बखाना ।
जोइ जोइ करै सो सो करम बड़ाई ॥६॥
आपो गयो तब भगति पाई ऐसी भगति भाई ।
राम मिल्यो आपो गुन खोयो रिधि सिधि सबै गँवाई ॥७॥
कह रैदास छूटी आस सब तब हरि ताही के पास ।
आत्मा थिर भई तब सबही निधि पाई ॥८॥
॥ २५ ॥
है सब आतम सुख परकास साँचो ।
निरंतर निराहार कलपित ये पाँचो ॥टेक॥
आदि मध्य औसान१ एक रस, तार बन्यो हो भाई ।
थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रह्यो हरिराई ॥१॥
सर्बेस्वर सर्वांगी सब गति, करता हरता सोई ।
सिव न असिव न साध अस सेवक, उनै भाव नहिँ होई ॥२॥
धरम अधरम मोच्छ नहिँ बंधन, जरा मरन भव नासा ।
दृष्टि अदृष्टि गेय२ अरु ज्ञाना, एकमेक रैदासा ॥३॥
(राग गौरी)
॥ २६ ॥
कोई सुमार३ न देखूँ ये सब उपल४ चोभा ।
जा को जेता प्रकास ता को तेति ही सोभा ॥टेक॥
हम हिये सीखि सीखै हम हिये माड़े ।
थोरे ही इतराइ चलै पतिसाही५ छाड़े ॥१॥
अतिही आतुर वह काची ही तोरे ।
बूड़े जल पैसे६ नहिँ पड़ै रे खोरे ॥२॥
१ अंत । २ जानने योग्य । ३ गिनती । ४ पत्थर । ५ बादशाही । ६ पैठे ।