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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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( ३ )
प्रेम और दीनभाव से प्रार्थना की तो मूरत तुरत ही सिंहासन छोड़ कर रैदास
जी की गोद में आ बैठी—सब देखकर चकित हो गये।
भक्तमाल में रैदास जी की महिमा के दृष्टांत में यह भी वरनन है कि जब
चित्तौड़ की रानी जिसका नाम झाली लिखा है अपनी राजधानी को लौटी
तो बड़े आदर भाव से रैदास जी को बुलाया और उनके सुशोभित होने के उत्सव
में नगर के बाम्हनों को बहुत कुछ दान दिया और अपने यहाँ भोजन कराने के
लिये उनको नेवता दिया। बाम्हनों ने लालचवस नेवता तो मान लिया परन्तु चमार
की चेली के घर का बना हुआ भोजन करना धर्म के विरुद्ध समझ कर कोरा
सीधा लेकर अपने हाथ से भोजन बनाया। जब खाने पर बैठे तो देखते क्या हैं कि
हर पंगत में दो दो बाम्हनों के बीच में रैदास जी बैठे हैं—इस अचरजी कौतुक
पर सब हक्के-बक्के हो गये और कितनों ने चरनों पर गिर कर रैदास जी से दीक्षा
ली। रैदास जी ने अपने कंधे की खलड़ी को उधेड़ कर जनेऊ दिखलाया कि सच्चा भीतर
का जनेऊ यह है।
यह कथा सर्व साधारण में मीराबाई के भोज के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है और
बहुतों का विश्वास है कि यह चित्तौड़ की रानी जिसने रैदास जी से उपदेश
लिया और उनका नेवता किया मीरा बाई थी पर इसके निर्णय की यहाँ आवश्यकता
नहीं है।
यह कथा भी प्रसिद्ध है कि एक बड़े रईस रैदास जी की महिमा सुन कर
उनके दर्शन और सतसंग को गये। उन के आश्रम पर पहुँच कर देखा कि
एक बूढ़ा चमार और उसके साथ बहुत और चमार बैठे जूते बना रहे हैं।
थोड़ी देर पीछे सतसंग हुआ और उसके उपरांत एक चमार एक बड़े जूते में
भर कर रैदास जी का चरनामृत लाया और सब को बाँटा, जब रईस साहिब
की बारी आई तो उन्हों ने उसे ले तो लिया पर घिन मान कर अपने सिर से
उछाल कर पीछे गिरा दिया जो कि उन के अँगरखे में सूख गया। जब घर लौटे
तो शुद्ध होने के लिये कपड़े उतार कर भंगी को दे दिये और आप पंच गव्य
स्नान किया। उसी दिन से उन को गलित कोढ़ होने लगा और भंगी की जिस
ने चरनामृत पड़ा हुआ कपड़ा पहिना सोने समान देह निकल आई और चेहरे
पर बड़ा तेज आ गया। रईस साहब ने बहुत कुछ दवा की पर जब अच्छे न हुए
तो अपने मुसाहिबों की सलाह से फिर रैदास जी के आश्रम पर चरनामृत की
आसा में आये; उस दिन चरनामृत नहीं बँटा। तब रईस ने रैदास जी से प्रार्थना की