रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
कि चरनामृत मिले। जवाब पाया कि अब जो चरनामृत आवेगा वह केवल
पानी होगा उसमें दया की मौज शामिल न होगी और मौज पर हमारा बस
नहीं है। फिर कुछ दिन पीछे बहुत झुरने पछताने पर रैदास जी की दयादृष्टि से
रईस अच्छा हो गया।
काशी गवर्नमेंट संस्कृत पाठशाला के सन् १६०७ के एक परीक्षापत्र में
नीचे लिखी हुई कथा संस्कृत में अनुवाद करने को छपी थी जिसे हम यहाँ
लिखते हैं—
"इस संसार में वही आदमी ऊँचा कहा जाता है जो कि ऊँचा काम करे,
ऊँचे घर में पैदा होने से ऊँचा नहीं कहलाता । देखो आग से धुआँ पैदा होता
है, वह हवा के संग से आसमान में भी बहुत दूर तक चढ़ जाता है पर लोगों
की आँख में पड़ कर तकलीफ ही देता है, इसीलिये लोग धुएँ को बुरा कहते
हैं। आग से कभी कभी बहुत लोग जल कर मर जाते हैं। गाँव के गाँव राख
हो जाते हैं तौ भी उस से बहुत फायदा होता है, इस लिये सब लोग उसे
पसन्द करते हैं । ऊँची जाति में पैदा होने का जो लोग घमन्ड करते हैं उन्हे
अच्छे लोग नादान समझते हैं । बनारस में एक बाम्हन किसी रघुवंसी छत्री
की ओर से रोज गंगा जी को फूल पान और सोपारी चढ़ाने जाता था। एक
दिन वह बाम्हन जूता खरीदने के लिये रैदास चमार की दूकान पर गया। बात
बात में वहाँ पर गगा पूजा की चर्चा चल पड़ी । रैदास ने कहा कि मैं आप को
यों ही जूता देता हूँ, कृपा कर आज मेरी इस सोपारी को भी गगा जी को चढ़ा
देना। बाम्हन ने उस सोपारी को जेब में रख लिया। दूसरे दिन गगा में नहा धो
कर जजमान की सोपारी इत्यादि को चढ़ा कर पीछे से चलती वेरा जेब में से
रैदास की सोपारी को निकाल कर दूर से गगा जी में फेंका। गगा जी ने पानी में से
हाथ ऊँचा कर उस सोपारी को ले लिया। यह तमाशा देख कर वह बाम्हन कहने लगा
कि सच है—
“जाति पाँति पूछै नहिँ कोई । हरि को भजै सो हरि को होई ॥”
रैदास जी पूरी अवस्था को पहुँच कर अर्थात् १२० बरस के होकर ब्रह्म -
पद को सिधारे और उनके पंथ के अनुयाइयों का विश्वास है कि यह कबीर
साहिब की भाँति सदेह गुप्त हो गये बरन अपनी बानी को भी साथ ले गये !!!
गुजरात प्रान्त में इस मत के लाखों आदमी हैं जो अपने को रविदासी
कहते हैं।