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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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संतबानी
संतबानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जगत्-प्रसिद्ध महात्माओं की
बानी और उपदेश को, जिन का लोप होता जाता है, बचा लेने का है । जितनी बानियाँ
हमने छापी हैं उन में से विशेष तो पहिले छपी नहीं थीं और जो छपी थीँ सो
प्रायः ऐसे छिन्न भिन्न और बेजोड़ रूप में या क्षेपक और त्रुटि से भरी हुई कि उन
से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था ।
हमने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ हस्तलिखित दुर्लभ
ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक मिल सके असल या नक़ल कराके मँगवाये ।
भरसक तो पूरे ग्रंथ छापे गये हैं, और फुटकर शब्दों की हालत में सर्व-साधारण
के उपकारक पद चुन लिये हैं, प्राय कोई पुस्तक बिना दो लिपियों का मुक़ाबला
किये और ठीक रीति से शोधे नहीं छापी गई है और कठिन और अनूठे शब्दों के
अर्थ और सकेत फ़ुट-नोट में दे दिये हैं । जिन महात्मा की बानी है उनका
जीवन-चरित्र भी साथ ही छापा गया है और जिन भक्तों और महापुरुषों के नाम
किसी बानी में आये हैं उनके वृत्तांत और कौतुक संक्षेप से फ़ुट-नोट में लिख
दिये गये हैं ।
दो अंतिम पुस्तकें इस पुस्तक माला की अर्थात् “सतबानी संग्रह” भाग १
[ साखी ] और भाग २ [ शब्द ] छप चुकीँ जिन का नमूना देखकर महा-
महोपाध्याय श्री पंडित सुधाकर द्विवेदी वैकुंठ-वासी ने गद्गद होकर कहा था—
“न भूतो न भविष्यति” ।
एक अनूठी और अद्वितीय पुस्तक महात्माओँ और बुद्धिमानों के बचनों की
“लोक परलोक हितकारी” नाम की गद्य में सन् १९१६ में छपी है जिसके विषय
में श्रीमान् महाराज काशी नरेश ने लिखा है—“वह उपकारी शिक्षाओँ का अचरजी
संग्रह है जो सोने के तोल सस्ता है” ।
पाठक महाशयोँ की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोष उन
की दृष्टि में आवें उन्हें हम को कृपा करके लिख भेजें जिस से वह दूसरे छापे में
दूर कर दिये जावें ।
हिन्दी में और भी अनूठी पुस्तकें छपी हैं जिनमें प्रेम कहानियों के द्वा
शिक्षा बतलाई गई हैं—उनके नाम और दाम इस पुस्तक के अन्त वाले पृ
में देखिए ।
मैनेजर, वेलवेडियर छापाखाना,