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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

रैदासजी की बानी
॥ साखी ॥
हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस ।
ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ॥ १ ॥
अंतरगति राचैँ नहीं, बाहर कथैँ उदास ।
ते नर जम पुर जाहिँगे, संत भाषै रैदास ॥ २ ॥
रैदास कहै जाके हृदै, रहै रैन दिन राम ।
सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम ॥ ३ ॥
जा देखे घिन ऊपजै, नरक कुंड मैं बास ।
प्रेम भगति सौँ ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ॥ ४ ॥
रैदास तूँ कावँच१ फली, तुझे न छीपै२ कोइ ।
तैँ निज नाँवँ न जानिया, भला कहाँ ते होइ ॥ ५ ॥
रैदास राति न सोइये, दिवस न करिये स्वाद ।
अह-निसि३ हरिजी सुमिरिये, छाड़ि सकल प्रतिबाद ॥ ६ ॥
॥ पद ॥
राग रामकली
॥ १ ॥
परचै राम रमै जो कोई ।
या रस परसे दुबिध न होई ॥टेक॥
जे दीसे ते सकल बिनास ।
अनदीठे नाहीँ बिसवास ॥ १ ॥
बरन कहंत कहैँ जे राम ।
सो भगता केवल निःकाम ॥२॥
१ किवाँच जिस के बदन मैं छू जाने से खाज पैदा हो कर ददोरे पड़ जाते हैं।
२ छुए। ३ दिन रात ।