महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२१६-
षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपुर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना
वर्गोवाच
ततो वयं प्रव्यथिताः सर्वा भारतसत्तम ।
अयाम शरणं विप्रं तं तपोधनमच्युतम् ॥ १ ॥
वर्गा बोली— भरतवंशके महापुरुष! उन ब्राह्मणका शाप सुनकर हमें बड़ा दुःख हुआ। तब हम सब-की-सब अपने धर्मसे च्युत न होनेवाले उन तपस्वी विप्रकी शरणमें गयीं ॥ १ ॥
रूपेण वयसा चैव कन्दर्पेण च दर्पिताः ।
अयुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज ॥ २ ॥
(और इस प्रकार बोलीं—) 'ब्रह्मन्! हम रूप, यौवन और कामसे उन्मत्त हो गयी थीं। इसीलिये यह अनुचित कार्य कर बैठीं। आप कृपापूर्वक हमारा अपराध क्षमा करें ॥ २ ॥
एष एव वधोऽस्माकं सुपर्याप्तस्तपोधन ।
यद् वयं संशितात्मानं प्रलोब्धुं त्वामिहागताः ॥ ३ ॥
'तपोधन! हमारा तो पूर्णरूपसे यही मरण हो गया कि हम आप-जैसे शुद्धात्मा मुनिको लुभानेके लिये यहाँ आयीं ॥ ३ ॥
अवध्यास्तु स्त्रियः सृष्टा मन्यन्ते धर्मचारिणः ।
तस्माद् धर्मेण वर्ध त्वं नास्मान् हिंसितुमर्हसि ॥ ४ ॥
'धर्मात्मा पुरुष ऐसा मानते हैं कि स्त्रियाँ अवध्य बनायी गयी हैं। अतः आप अपने धर्माचरणद्वारा निरन्तर उन्नति कीजिये। आपको हम अबलाओंकी हत्या नहीं करनी चाहिये ॥ ४ ॥
सर्वभूतेषु धर्मज्ञ मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।
सत्यो भवतु कल्याण एष वादो मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
'धर्मज्ञ! ब्राह्मण समस्त प्राणियोंपर मैत्रीभाव रखनेवाला कहा जाता है। भद्र पुरुष! मनीषी पुरुषोंका यह कथन सत्य होना चाहिये ॥ ५ ॥
शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनाम् ।
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मस्तस्मात् त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
'श्रेष्ठ महात्मा शरणागतोंकी रक्षा करते हैं। हम भी आपकी शरणमें आयी हैं; अतः आप हमारे अपराध क्षमा करें' ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स धर्मात्मा ब्राह्मणः शुभकर्मकृत् ।
प्रसादं कृतवान् वीर रविसोमसमप्रभः ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—वीरवर! उनके ऐसा कहनेपर सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी तथा शुभ कर्म करनेवाले उन धर्मात्मा ब्राह्मणने उन सबपर कृपा की ॥ ७ ॥
ब्राह्मण उवाच
शतं शतसहस्रं तु सर्वमक्षय्यवाचकम् ।
परिमाणं शतं त्वेतन्नेदमक्षय्यवाचकम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण बोले—'शत' और 'शतसहस्र' शब्द—ये सभी अनन्त संख्याके वाचक हैं, परंतु यहाँ जो मैंने 'शतं समाः' (तुमलोगोंको सौ वर्षोंतक ग्राह होनेके लिये) कहा है, उसमें शत शब्द सौ वर्षके परिमाणका ही वाचक है। अनन्तकालका वाचक नहीं है ॥ ८ ॥
यदा च वो ग्राहभूता गृह्णन्तीः पुरुषाञ्जले ।
उत्कर्षति जलात् तस्मात् स्थलं पुरुषसत्तमः ॥ ९ ॥
तदा यूयं पुनः सर्वाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ ।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन ॥ १० ॥
जब जलमें ग्राह बनकर लोगोंको पकड़नेवाली तुम सब अप्सराओंको कोई श्रेष्ठ पुरुष जलसे बाहर स्थलपर खींच लायेगा, उस समय तुम सब लोग फिर अपना दिव्य रूप प्राप्त कर लोगी। मैंने पहले कभी हँसीमें भी झूठ नहीं कहा है ॥ ९-१० ॥
तानि सर्वाणि तीर्थानि ततः प्रभृति चैव ह ।
नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्यातिं यास्यन्ति सर्वशः ।
पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीषिणाम् ॥ ११ ॥
तुमलोगोंका उद्धार हो जानेके बाद वे सभी तीर्थ इस जगत्में नारीतीर्थके नामसे विख्यात होंगे और मनीषी पुरुषोंको भी पवित्र करनेवाले पुण्यतीर्थ बन जायँगे ॥ ११ ॥
वर्गोवाच
ततोऽभिवाद्य तं विप्रं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
अचिन्तयामोऽपसृत्य तस्माद् देशात् सुदुःखिताः ॥ १२ ॥
क्व नु नाम वयं सर्वाः कालेनाल्पेन तं नरम् ।
समागच्छेम यो नस्तद् रूपमापादयेत् पुनः ॥ १३ ॥
**वर्गा कहती है—**भारत! तदनन्तर उन ब्राह्मणको प्रणाम और उनकी प्रदक्षिणा करके अत्यन्त दुःखी हो हम सब उस स्थानसे अन्यत्र चली आयीं और इस चिन्तामें पड़ गयीं कि कहाँ जाकर हम सब लोग रहें, जिससे थोड़े ही समयमें हमें वह मनुष्य मिल जाय, जो हमें पुनः हमारे पूर्व स्वरूपकी प्राप्ति करायेगा ।। १२-१३ ।।
ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत ।
दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम् ।। १४ ।।
भरतश्रेष्ठ! हमलोग दो घड़ीसे इस प्रकार सोच-विचार कर ही रही थीं कि हमको महाभाग देवर्षि नारदजीका दर्शन प्राप्त हुआ ।। १४ ।।
सम्प्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम् ।
अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्रीडिताननाः ।। १५ ।।
कुन्तीनन्दन! उन अमिततेजस्वी देवर्षिको देखकर हमें बड़ा हर्ष हुआ और उन्हें प्रणाम करके हम लज्जावश सिर झुकाकर वहाँ खड़ी हो गयीं ।। १५ ।।
स नोऽपृच्छद् दुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम् ।
श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत् ।। १६ ।।
फिर उन्होंने हमारे दुःखका कारण पूछा और हमने उनसे सब कुछ बता दिया। सारा हाल सुनकर वे इस प्रकार बोले— ।। १६ ।।
दक्षिणे सागरानूपे पञ्च तीर्थानि सन्ति वै ।
पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरम् ।। १७ ।।
‘दक्षिण समुद्रके तटके समीप पाँच तीर्थ हैं, जो परम पुण्यजनक तथा अत्यन्त रमणीय हैं। तुम सब उन्हींमें चली जाओ, देर न करो ।। १७ ।।
तत्राशु पुरुषव्याघ्रः पाण्डवेयो धनंजयः ।
मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः ।। १८ ।।
तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमिहागताः ।
तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वयानघ ।। १९ ।।
‘वहाँ पुरुषोंमें श्रेष्ठ शुद्धात्मा पाण्डुकुमार धनंजय शीघ्र ही पहुँचकर तुम्हें इस दुःखसे छुड़ायेंगे, इसमें संशय नहीं है।' वीर अर्जुन! नारदजीका यह वचन सुनकर हम सब सखियाँ यहीं चली आयीं। अनघ! आज सचमुच ही आपने मुझे उस शापसे मुक्त कर दिया ।। १८-१९ ।।
एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः ।
कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय ।। २० ।।
ये मेरी चार सखियाँ और हैं, जो अभी जलमें ही पड़ी हैं। वीरवर! आप यह पुण्य कर्म कीजिये; इन सबको शापसे छुड़ा दीजिये ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्ताः पाण्डवश्रेष्ठः सर्वा एव विशाम्पते ।
तस्माच्छापाददीनात्मा मोक्षयामास वीर्यवान् ॥ २१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब उदारहृदय पराक्रमी पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनने उन सभी अप्सराओंको उस शापसे मुक्त कर दिया ॥ २१ ॥
उत्थाय च जलात् तस्मात् प्रतिलभ्य वपुः स्वकम् ।
तास्तदाप्सरसो राजन्नदृश्यन्त यथा पुरा ॥ २२ ॥
राजन्! उस जलसे ऊपर निकलकर फिर अपना पूर्वस्वरूप प्राप्त कर लेनेपर वे अप्सराएँ उस समय पहलेकी भाँति दिखायी देने लगीं ॥ २२ ॥
तीर्थानि शोधयित्वा तु तथानुज्ञाय ताः प्रभुः ।
चित्राङ्गदां पुनर्द्रष्टुं मणिपूरं पुनर्ययौ ॥ २३ ॥
इस प्रकार उन तीर्थोंका शोधन करके उन अप्सराओंको जानेकी आज्ञा दे शक्तिशाली अर्जुन चित्रांगदासे मिलनेके लिये पुनः मणिपुर गये ॥ २३ ॥
तस्यामजनयत् पुत्रं राजानं बभ्रुवाहनम् ।
तं दृष्ट्वा पाण्डवो राजंश्चित्रवाहनमब्रवीत् ॥ २४ ॥
वहाँ उन्होंने चित्रांगदाके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न किया था, उसका नाम बभ्रुवाहन रखा गया था। राजन्! अपने उस पुत्रको देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने राजा चित्रवाहनसे कहा— ॥ २४ ॥
चित्राङ्गदायाः शुल्कं त्वं गृहाण बभ्रुवाहनम् ।
अनेन च भविष्यामि ऋणान्मुक्तो नराधिप ॥ २५ ॥
‘महाराज! इस बभ्रुवाहनको आप चित्रांगदाके शुल्करूपमें ग्रहण कीजिये, इससे मैं आपके ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा' ॥ २५ ॥
चित्राङ्गदां पुनर्वाक्यमब्रवीत् पाण्डुनन्दनः ।
इह वै भव भद्रं ते वर्धैथा बभ्रुवाहनम् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् पाण्डुकुमारने पुनः चित्रांगदासे कहा—'प्रिये! तुम्हारा कल्याण हो। तुम यहीं रहो और बभ्रुवाहनका पालन-पोषण करो ॥ २६ ॥
इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्रागत्य रंस्यसि ।
कुन्तीं युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ ॥ २७ ॥
आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च बान्धवान् ।
बान्धवैः सहिताः सर्वैर्नन्दसे त्वमनिन्दिते ॥ २८ ॥
‘फिर यथासमय हमारे निवासस्थान इन्द्रप्रस्थमें आकर तुम बड़े सुखसे रहोगी। वहाँ आनेपर माता कुन्ती, युधिष्ठिर, भीमसेन, मेरे छोटे भाई नकुल-सहदेव तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंको देखनेका तुम्हें अवसर मिलेगा। अनिन्दिते! इन्द्रप्रस्थमें मेरे समस्त बन्धु-बान्धवोंसे मिलकर तुम बहुत प्रसन्न होओगी ॥ २७-२८ ॥
धर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः ।
जित्वा तु पृथिवीं सर्वां राजसूयं करिष्यति ॥ २९ ॥
‘सदा धर्मपर स्थित रहनेवाले सत्यवादी कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर सारी पृथिवीको जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे ॥ २९ ॥
तत्रागच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः ।
बहूनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता ॥ ३० ॥
‘उस समय वहाँ भूमण्डलके नरेशनामधारी सभी राजा आयेंगे। तुम्हारे पिता भी बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर उस समय उपस्थित होंगे ॥ ३० ॥
एकसार्थं प्रयातासि चित्रवाहनसेवया ।
द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः ॥ ३१ ॥
‘चित्रवाहनकी सेवाके निमित्त उन्हींके साथ राजसूययज्ञमें तुम भी चली आना। मैं वहीं तुमसे मिलूँगा। इस समय पुत्रका पालन करो और शोक छोड़ दो ॥ ३१ ॥
बभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो महीचरः ।
तस्माद् भरस्व पुत्रं वै पुरुषं वंशवर्धनम् ॥ ३२ ॥
‘बभ्रुवाहनके नामसे मेरा प्राण ही इस भूतलपर विद्यमान है, अतः तुम इस पुत्रका भरण-पोषण करो। यह इस वंशको बढ़ानेवाला पुरुषरत्न है ॥ ३२ ॥
चित्रवाहनदायादं धर्मात् पौरवनन्दनम् ।
पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात् पालय सर्वदा ॥ ३३ ॥
‘यह धर्मतः चित्रवाहनका पुत्र है; किंतु शरीरसे पूरुवंशको आनन्दित करनेवाला है। अतः पाण्डवोंके इस प्रिय पुत्रका तुम सदा पालन करो ॥ ३३ ॥
विप्रयोगेन संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते ।
चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा गोकर्णमभितोऽगमत् ॥ ३४ ॥
‘सती-साध्वी प्रिये! मेरे वियोगसे तुम संतप्त न होना।’ चित्रांगदासे ऐसा कहकर अर्जुन गोकर्णतीर्थकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥
आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम् ।
यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम् ॥ ३५ ॥
वह भगवान् शंकरका आदिस्थान है और दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। पापी मनुष्य भी वहाँ जाकर निर्भय पद प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वण्यर्जुनतीर्थयात्रायां षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१६ ॥
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