महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१७३-
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना
वैशम्पायन उवाच
स गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत् तदा भरतर्षभ ।
अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! गन्धर्वका यह कथन सुनकर अर्जुन अत्यन्त भक्तिभावके कारण पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगे ॥ १ ॥
उवाच च महेष्वासो गन्धर्वं कुरुसत्तमः ।
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोबलात् ॥ २ ॥
फिर महाधनुर्धर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने गन्धर्वसे कहा—'सखे! वसिष्ठके तपोबलकी बात सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा पैदा हो गयी है ॥ २ ॥
वसिष्ठ इति तस्यैतदृषेर्नाम त्वयेरितम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत् तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
‘तुमने उन महर्षिका नाम वसिष्ठ बताया था। उनका यह नाम क्यों पड़ा? इसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम यथार्थ रूपसे मुझे बताओ ॥ ३ ॥
य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः ।
आसीदेतन्ममाचक्ष्व क एष भगवानृषिः ॥ ४ ॥
‘गन्धर्वराज! ये जो हमारे पूर्वजोंके पुरोहित थे, वे भगवान् वसिष्ठ मुनि कौन हैं? यह मुझसे कहो' ॥ ४ ॥
गन्धर्व उवाच
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥ ५ ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥ ६ ॥
गन्धर्वने कहा— वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है। जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं। इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥
यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः ।
विश्वामित्रापराधेन धारयन् मन्युमुत्तमम् ॥ ७ ॥
विश्वामित्रके अपराधसे मनमें पवित्र क्रोध धारण करते हुए भी उन उदारबुद्धि महर्षिने कुशिकवंशका समूलोच्छेद नहीं किया ॥ ७ ॥
पुत्रव्यसनसंतप्तः शक्तिमानप्यशक्तवत् ।
विश्वामित्रविनाशाय न चक्रे कर्म दारुणम् ॥ ८ ॥
विश्वामित्रके द्वारा अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेसे वे संतप्त थे, उनमें बदला लेनेकी शक्ति भी थी, तो भी उन्होंने असमर्थकी भाँति सब कुछ सह लिया एवं विश्वामित्रका विनाश करनेके लिये कोई दारुण कर्म नहीं किया ॥ ८ ॥
मृतांश्च पुनराहर्तुं शक्तः पुत्रान् यमक्षयात् ।
कृतान्तं नातिचक्राम वेलामिव महोदधिः ॥ ९ ॥
वे अपने मरे हुए पुत्रोंको यमलोकसे वापस ला सकते थे; परंतु जैसे महासागर अपने तटका उल्लंघन नहीं करता, उसी प्रकार वे यमराजकी मर्यादाको लाँघनेके लिये उद्यत नहीं हुए ॥ ९ ॥
यं प्राप्य विजितात्मानं महात्मानं नराधिपाः ।
इक्ष्वाकवो महीपाला लेभिरे पृथिवीमिमाम् ॥ १० ॥
उन्हीं जितात्मा महात्मा वसिष्ठ मुनिको (पुरोहितरूपमें) पाकर इक्ष्वाकुवंशी भूपालोंने (दीर्घ-कालतक) इस (समूची) पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त किया था ॥ १० ॥
पुरोहितमिमं प्राप्य वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
ईजिरे क्रतुभिश्चैव नृपास्ते कुरुनन्दन ॥ ११ ॥
कुरुनन्दन! इन्हीं मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठको पुरोहित-रूपमें पाकर उन नरपतियोंने बहुत-से यज्ञ भी किये थे ॥ ११ ॥
स हि तान् याजयामास सर्वान् नृपतिसत्तमान् ।
ब्रह्मर्षिः पाण्डवश्रेष्ठ बृहस्पतिरिवामरान् ॥ १२ ॥
पाण्डवश्रेष्ठ! जैसे बृहस्पतिजी सम्पूर्ण देवताओंका यज्ञ कराते हैं, उसी प्रकार ब्रह्मर्षि वसिष्ठने उन सम्पूर्ण श्रेष्ठ राजाओंका यज्ञ कराया था ॥ १२ ॥
तस्माद् धर्मप्रधानात्मा वेदधर्मविदीप्सितः ।
ब्राह्मणो गुणवान् कश्चित् पुरोधाः प्रतिदृश्यताम् ॥ १३ ॥
इसलिये जिसके मनमें धर्मकी प्रधानता हो, जो वेदोक्त धर्मका ज्ञाता और मनके अनुकूल हो; ऐसे किसी गुणवान् ब्राह्मणको आपलोग भी पुरोहित बनानेका निश्चय करें ॥ १३ ॥
क्षत्रियेणाभिजातेन पृथिवीं जेतुमिच्छता ।
पूर्वं पुरोहितः कार्यः पार्थ राज्याभिवृद्धये ॥ १४ ॥
पार्थ! पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा रखनेवाले कुलीन क्षत्रियको अपने राज्यकी वृद्धिके लिये पहले (किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको) पुरोहित नियुक्त कर लेना चाहिये ॥ १४ ॥
महीं जिगीषता राज्ञा ब्रह्मकार्यं पुरस्सरम् ।
तस्मात् पुरोहितः कश्चिद् गुणवान् विजितेन्द्रियः ।
विद्वान् भवतु वो विप्रो धर्मकामार्थतत्त्ववित् ॥ १५ ॥
पृथ्वीको जीतनेकी इच्छावाले राजाको उचित है कि वह ब्राह्मणको अपने आगे रखे; अतः कोई गुणवान्, जितेन्द्रिय, वेदाभ्यासी, विद्वान् तथा धर्म, काम और अर्थका तत्त्वज्ञ ब्राह्मण आपका पुरोहित हो ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पुरोहितकरणकथने
त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें पुरोहित बनानेके लिये कथनसम्बन्धी एक सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७३ ॥