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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

१२१-

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डुका कुन्तीको समझाना और कुन्तीका पतिकी आज्ञासे पुत्रोत्पत्तिके लिये धर्मदेवताका आवाहन करनेके लिये उद्यत होना

वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तया राजा तां देवीं पुनरब्रवीत् ।
धर्मविद् धर्मसंयुक्तमिदं वचनमुत्तमम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कुन्तीके यों कहनेपर धर्मज्ञ राजा पाण्डुने देवी कुन्तीसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही ॥ १ ॥

पाण्डुरुवाच
एवमेतत् पुरा कुन्ति व्युषिताश्वश्चकार ह ।
यथा त्वयोक्तं कल्याणि स ह्यासीदमरोपमः ॥ २ ॥
**पाण्डु बोले—**कुन्ती! तुम्हारा कहना ठीक है। पूर्वकालमें राजा व्युषिताश्वने जैसा तुमने कहा है, वैसा ही किया था। कल्याणी! वे देवताओंके समान तेजस्वी थे ॥ २ ॥
अथ त्विदं प्रवक्ष्यामि धर्मतत्त्वं निबोध मे ।
पुराणमृषिभिर्दृष्टं धर्मविद्भिर्महात्मभिः ॥ ३ ॥
अब मैं तुम्हें यह धर्मका तत्त्व बतलाता हूँ, सुनो। यह पुरातन धर्मतत्त्व धर्मज्ञ महात्मा ऋषियोंने प्रत्यक्ष किया है ॥ ३ ॥
धर्ममेवं जनाः सन्तः पुराणं परिचक्षते ।
भर्ता भार्यां राजपुत्रि धर्म्यं वाधर्म्यमेव वा ॥ ४ ॥
यद् ब्रूयात् तत् तथा कार्यमिति वेदविदो विदुः ।
विशेषतः पुत्रगृध्यी हीनः प्रजननात् स्वयम् ॥ ५ ॥
यथाहमनवद्याङ्गि पुत्रदर्शनलालसः ।
तथा रक्ताङ्गुलितलः पद्मपत्रनिभः शुभे ॥ ६ ॥
प्रसादार्थं मया तेऽयं शिरस्यभ्युद्यतोऽञ्जलिः ।
मन्नियोगात् सुकेशान्ते द्विजातेस्तपसाधिकात् ॥ ७ ॥
पुत्रान् गुणसमायुक्तानुत्पादयितुमर्हसि ।
त्वत्कृतेऽहं पृथुश्रोणि गच्छेयं पुत्रिणां गतिम् ॥ ८ ॥
साधु पुरुष इसीको प्राचीन धर्म कहते हैं। राजकन्ये! पति अपनी पत्नीसे जो बात कहे, वह धर्मके अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे अवश्य पूर्ण करना चाहिये—ऐसा वेदज्ञ पुरुषोंका

कथन है। विशेषतः ऐसा पति, जो पुत्रकी अभिलाषा रखता हो और स्वयं संतानोत्पादनकी शक्तिसे रहित हो, जो बात कहे, वह अवश्य माननी चाहिये। निर्दोष अंगोंवाली शुभलक्षणे! मैं चूँकि पुत्रका मुँह देखनेके लिये लालायित हूँ, अतएव तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मस्तकके समीप यह अंजलि धारण करता हूँ, जो लाल-लाल अंगुलियोंसे युक्त तथा कमलदलके समान सुशोभित है। सुन्दर केशोंवाली प्रिये! तुम मेरे आदेशसे तपस्यामें बढ़े-चढ़े हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणके साथ समागम करके गुणवान् पुत्र उत्पन्न करो। सुश्रोणि! तुम्हारे प्रयत्नसे मैं पुत्रवानोंकी गति प्राप्त करूँ, ऐसी मेरी अभिलाषा है॥ ४—८॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ता ततः कुन्ती पाण्डुं परपुरंजयम्।
प्रत्युवाच वरारोहा भर्तुः प्रियहिते रता ॥ ९॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार कही जानेपर पतिके प्रिय और हितमें लगी रहनेवाली सुन्दरांगी कुन्ती शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले महाराज पाण्डुसे इस प्रकार बोली— ॥ ९॥
(अधर्मः सुमहानेष स्त्रीणां भरतसत्तम।
यत् प्रसादयते भर्ता प्रसाद्यः क्षत्रियर्षभ ॥
शृणु चेदं महाबाहो मम प्रीतिकरं वचः ॥)
'भरतश्रेष्ठ! क्षत्रियशिरोमणे! स्त्रियोंके लिये यह बड़े अधर्मकी बात है कि पति ही उनसे प्रसन्न होनेके लिये बार-बार अनुरोध करे; क्योंकि नारीका ही यह कर्तव्य है कि वह पतिको प्रसन्न रखे। महाबाहो! आप मेरी यह बात सुनिये। इससे आपको बड़ी प्रसन्नता होगी।
पितृवेश्मन्यहं बाला नियुक्तातिथिपूजने।
उग्रं पर्यचरं तत्र ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १०॥
निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः।
तमहं संशितात्मानं सर्वयत्नैस्तोष्यम् ॥ ११॥
'बाल्यावस्थामें जब मैं पिताके घर थी, मुझे अतिथियोंके सत्कारका काम सौंपा गया था। वहाँ कठोर व्रतका पालन करनेवाले एक उग्रस्वभावके ब्राह्मणकी, जिनका धर्मके विषयमें निश्चय दूसरोंको अज्ञात है तथा जिन्हें लोग दुर्वासा कहते हैं, मैंने बड़ी सेवा-शुश्रूषा की। अपने मनको संयममें रखनेवाले उन महात्माको मैंने सब प्रकारके यत्नोंद्वारा संतुष्ट किया॥ १०-११॥

स मेऽभिचारसंयुक्तमाचष्ट भगवान् वरम् ।
मन्त्रं त्विमं च मे प्रादादब्रवीच्चैव मामिदम् ॥ १२ ॥
‘तब भगवान् दुर्वासाने वरदानके रूपमें मुझे प्रयोगविधिसहित एक मन्त्रका उपदेश दिया और मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि ।
अकामो वा सकामो वा वशं ते समुपैष्यति ॥ १३ ॥
‘तुम इस मन्त्रसे जिस-जिस देवताका आवाहन करोगी, वह निष्काम हो या सकाम, निश्चय ही तुम्हारे अधीन हो जायगा ॥ १३ ॥
तस्य तस्य प्रसादात् ते राज्ञि पुत्रो भविष्यति ।
इत्युक्ताहं तदानेन पितृवेश्मनि भारत ॥ १४ ॥
‘राजकुमारी! उस देवताके प्रसादसे तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा।’ भारत! इस प्रकार मेरे पिताके घरमें उस ब्राह्मणने उस समय मुझसे यह बात कही थी ॥ १४ ॥
ब्राह्मणस्य वचस्तथ्यं तस्य कालोऽयमागतः ।
अनुज्ञाता त्वया देवमाह्वयेयमहं नृप ।
तेन मन्त्रेण राजर्षे यथास्यान्नौ प्रजा हिता ॥ १५ ॥

‘उस ब्राह्मणकी बात सत्य ही होगी। उसके उपयोगका यह अवसर आ गया है। महाराज! आपकी आज्ञा होनेपर मैं उस मन्त्रद्वारा किसी देवताका आवाहन कर सकती हूँ। जिससे राजर्षे! हम दोनोंके लिये हितकर संतान प्राप्त हो ।। १५ ।।
(यां मे विद्यां महाराज अददात् स महायशाः ।
तयाहूतः सुरः पुत्रं प्रदास्यति सुरोपमम् ।
अनपत्यकृतं यस्ते शोकं हि व्यपनेष्यति ।।
अपत्यकाम एवं स्यान्ममापत्यं भवेदिति ।)

‘महाराज! उन महायशस्वी महर्षिने जो विद्या मुझे दी थी, उसके द्वारा आवाहन करनेपर कोई भी देवता आकर देवोपम पुत्र प्रदान करेगा, जो आपके संतानहीनताजनित शोकको दूर कर देगा; इस प्रकार मुझे संतान प्राप्त होगी और आपकी पुत्रकामना सफल हो जायगी।
आवाहयामि कं देवं ब्रूहि सत्यवतां वर ।
त्वत्तोऽनुज्ञाप्रतीक्षां मां विद्ध्यास्मिन् कर्मणि स्थिताम् ।। १६ ।।

‘सत्यवानोंमें श्रेष्ठ नरेश! बताइये, मैं किस देवताका आवाहन करूँ। आप समझ लें, मैं (आपके संतोषार्थ) इस कार्यके लिये तैयार हूँ। केवल आपसे आज्ञा मिलनेकी प्रतीक्षामें हूँ’ ।। १६ ।।

पाण्डुरुवाच

(धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वं नो धात्री कुलस्य हि ।
नमो महर्षये तस्मै येन दत्तो वरस्तव ।।
न चाधर्मेण धर्मज्ञे शक्याः पालयितुं प्रजाः ।।)

अद्यैव त्वं वरारोहे प्रयतस्व यथाविधि ।
धर्ममावाहय शुभे स हि लोकेषु पुण्यभाक् ।। १७ ।।

**पाण्डु बोले—**प्रिये! मैं धन्य हूँ, तुमने मुझपर महान् अनुग्रह किया। तुम्हीं मेरे कुलको धारण करनेवाली हो। उन महर्षिको नमस्कार है, जिन्होंने तुम्हें वैसा वर दिया। धर्मज्ञे! अधर्मसे प्रजाका पालन नहीं हो सकता। इसलिये वरारोहे! तुम आज ही विधिपूर्वक इसके लिये प्रयत्न करो। शुभे! सबसे पहले धर्मका आवाहन करो, क्योंकि वे ही सम्पूर्ण लोकोंमें धर्मात्मा हैं ।। १७ ।।
अधर्मेण न नो धर्मः संयुज्यति कथंचन ।
लोकश्चायं वरारोहे धर्मोऽयमिति मन्यते ।। १८ ।।

धार्मिकश्च कुरूणां स भविष्यति न संशयः ।
धर्मेण चापि दत्तस्य नाधर्मे रंस्यते मनः ।। १९ ।।

तस्माद् धर्मं पुरस्कृत्य नियता त्वं शुचिस्मिते ।

उपचाराभिचाराभ्यां धर्ममावाहयस्व वै ।। २० ।।
(इस प्रकार करनेपर) हमारा धर्म कभी किसी तरह अधर्मसे संयुक्त नहीं हो सकता। वरारोहे! लोक भी उनको साक्षात् धर्मका स्वरूप मानता है। धर्मसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र कुरुवंशियोंमें सबसे अधिक धर्मात्मा होगा—इसमें संशय नहीं है। धर्मके द्वारा दिया हुआ जो पुत्र होगा, उसका मन अधर्ममें नहीं लगेगा। अतः शुचिस्मिते! तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर धर्मको भी सामने रखते हुए उपचार (पूजा) और अभिचार (प्रयोगविधि)-के द्वारा धर्मदेवताका आवाहन करो ।। १८—२० ।।

वैशम्पायन उवाच

सा तथोक्ता तथेत्युक्त्वा तेन भर्त्रा वराङ्गना ।
अभिवाद्याभ्यनुज्ञाता प्रदक्षिणमवर्तत ।। २१ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! अपने पति पाण्डुके यों कहनेपर नारियोंमें श्रेष्ठ कुन्तीने 'तथास्तु' कहकर उन्हें प्रणाम किया और आज्ञा लेकर उनकी परिक्रमा की ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कुन्तीपुत्रोत्पत्त्यनुज्ञाने
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कुन्तीको पुत्रोत्पत्तिके लिये आदेशविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२१ ।।