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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः ।

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एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्गार

वैशम्पायन उवाच

ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः ।
गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय ॥ १ ॥
वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम् ।
कृष्णस्य मतमादाय प्रययौ भरतर्षभः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर उस विवाहसम्बन्धी संदेशपर युधिष्ठिरकी आज्ञा मिल जानेके पश्चात् धनंजयको जब यह मालूम हुआ कि सुभद्रा रैवतक पर्वतपर गयी हुई है, तब उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे सलाह ली। श्रीकृष्णने उन्हें आगे क्या करना है, यह बताकर सुभद्रासे विवाह करने तथा उसे हर ले जानेकी अनुमति दे दी। श्रीकृष्णकी सम्मति पाकर भरतश्रेष्ठ अर्जुन अपने विश्रामस्थानपर चले गये ॥ १-२ ॥

रथेन काञ्चनाङ्गेन कल्पितेन यथाविधि ।
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ॥ ३ ॥
सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतखनादिना ।
ज्वलिताग्निप्रकाशेन द्विषतां हर्षघातिना ॥ ४ ॥
संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
मृगयाव्यपदेशेन प्रययौ पुरुषर्षभः ॥ ५ ॥
(भगवान्‌की आज्ञासे दारुकने) उनके सुवर्णमय रथको विधिपूर्वक सजाकर तैयार किया था। उसमें स्थान-स्थानपर छोटी-छोटी घंटिकाएँ तथा झालरें लगा दी थीं और शैब्य, सुग्रीव आदि अश्व भी उसमें जोत दिये थे। उस रथके भीतर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मौजूद थे। उसकी घर्घराहटसे मेघकी गर्जनाके समान आवाज होती थी। वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखते ही शत्रुओंका हर्ष हवा हो जाता था। नरश्रेष्ठ धनंजय कवच और तलवार बाँधकर एवं हाथोंमें दस्ताने पहनकर उसी रथके द्वारा शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये ॥ ३—५ ॥

सुभद्रा त्वथ शैलेन्द्रमभ्यर्च्यैव हि रैवतम् ।
दैवतानि च सर्वाणि ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ॥ ६ ॥
प्रदक्षिणं गिरेः कृत्वा प्रययौ द्वारकां प्रति ।
तामभिद्रुत्य कौन्तेयः प्रसह्यारोपयद् रथम् ।

सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं कामबाणप्रपीडितः ॥ ७ ॥
उधर सुभद्रा गिरिराज रैवतक तथा सब देवताओंकी पूजा करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पर्वतकी परिक्रमा पूरी करके द्वारकाकी ओर लौट रही थी। अर्जुन कामदेवके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उन्होंने दौड़कर सर्वाङ्गसुन्दरी सुभद्राको बलपूर्वक रथपर बिठा लिया ॥ ६-७ ॥

ततः स पुरुषव्याघ्रस्तामादाय शुचिस्मिताम् ।
रथेन काञ्चनाङ्गेन प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥ ८ ॥
इसके बाद पुरुषसिंह धनंजय पवित्र मुसकानवाली सुभद्राको साथ ले उस सुवर्णमय रथद्वारा अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥
ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः ।
विक्रोशन्तोऽद्रवन् सर्वे द्वारकामभितः पुरीम् ॥ ९ ॥
सुभद्राका अपहरण होता देख समस्त सैनिकगण हल्ला मचाते हुए द्वारकापुरीकी ओर दौड़े गये ॥ ९ ॥
ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् ।
सभापालस्य तत् सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम् ॥ १० ॥
उन्होंने एक साथ सुधर्मासभामें पहुँचकर सभापालसे अर्जुनके उस साहसपूर्ण पराक्रमका सारा हाल कह सुनाया ॥ १० ॥
तेषां श्रुत्वा सभापालो भेरीं सांनाहिकीं ततः ।

समाजघ्ने महाघोषां जाम्बूनदपरिष्कृताम् ॥ ११ ॥
उनकी बातें सुनकर सभापालने सबको युद्धके लिये तैयार होनेकी सूचना देनेके उद्देश्यसे सुवर्णखचित नगाड़ा बजाया, जिसकी आवाज बहुत ऊँची और दूरतक फैलनेवाली थी ॥ ११ ॥

क्षुब्धास्तेनाथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ।
अन्नपानमपास्याथ समापेतुः समन्ततः ॥ १२ ॥
उसकी आवाज सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीर क्षुब्ध हो उठे और खाना-पीना छोड़कर चारों ओरसे दौड़े आये ॥ १२ ॥

तत्र जाम्बूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च ।
मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च ॥ १३ ॥
भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ॥ १४ ॥
उस सभामें सैकड़ों सिंहासन रखे गये थे, जिनमें सुवर्ण जड़ा गया था। उन सिंहासनोंपर बहुमूल्य बिछौने पड़े थे। वे सभी आसन मणि और मूँगोंसे चित्रित होनेके कारण प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषसिंह महारथी वीर उन्हीं सिंहासनोंपर आकर बैठे, मानो यज्ञकी वेदियोंपर प्रज्वलित अग्निदेव शोभा पा रहे हों ॥ १३-१४ ॥

तेषां समुपविष्टानां देवानामिव संनये ।
आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ॥ १५ ॥
देवसमूहकी भाँति वहाँ बैठे हुए उन यदुवंशियोंके समुदायमें सेवकोंसहित सभापालने अर्जुनकी वह सारी करतूत कह सुनायी ॥ १५ ॥

तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः ।
अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहंकृताः ॥ १६ ॥
यह सुनते ही युद्धोन्मादसे लाल नेत्रोंवाले वृष्णि-वंशी वीर अर्जुनके प्रति अमर्षसे भर गये और गर्वसे उछल पड़े ॥ १६ ॥

योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च ।
धनूंषि च महार्हाणि कवचानि बृहन्ति च ॥ १७ ॥
(वे बड़ी उतावलीसे कहने लगे—) ‘जल्दी रथ जोतो, फौरन प्रास ले आओ, धनुष तथा बहुमूल्य एवं विशाल कवच लाओ’ ॥ १७ ॥

सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद् रथान् योजयतेति च ।
स्वयं च तुरगान् केचिदयुञ्जन् हेमभूषितान् ॥ १८ ॥
कोई सारथियोंको पुकारकर कहने लगे—‘अरे! जल्दी रथ जोतो।’ कुछ लोग स्वयं ही सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ोंको रथोंमें जोतने लगे ॥ १८ ॥

रथेष् plug -> रथेष्वा नीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च ।
अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत् तुमुलं महत् ॥ १९ ॥
रथ, कवच और ध्वजाओंके लाये जाते समय चारों ओर उन नर-वीरोंके कोलाहलसे वहाँ बड़ी भारी तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी ॥ १९ ॥
वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः ।
नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
तदनन्तर कैलासशिखरके समान गौरवर्णवाले नील वस्त्र और वनमाला धारण करनेवाले बलरामजी उन यादवोंसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने ।
अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥ २१ ॥
'मूर्खो! श्रीकृष्ण तो चुपचाप बैठे हैं, तुम यह क्या कर रहे हो? इनका अभिप्राय जाने बिना ही तुम इतने कुपित हो उठे। तुमलोगोंकी यह गर्जना व्यर्थ ही है ॥ २१ ॥
एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः ।
यदस्य रुचिरं कर्तुं तत् कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥ २२ ॥
'पहले परम बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपना अभिप्राय बतावें। तदनन्तर जो कर्तव्य इन्हें उचित जान पड़े, उसीका आल

मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित् ॥ २७ ॥
‘अपनेको कुलीन माननेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो जिस बर्तनमें खाये, उसीमें छेद करे ॥ २७ ॥

इच्छन्नेव हि सम्बन्धं कृतं पूर्वं च मानयन् ।
को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ॥ २८ ॥
‘सम्बन्धकी इच्छा रहते हुए भी कौन ऐसा कल्याणकामी पुरुष होगा, जो पहलेके उपकारको मानते हुए ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य करे ॥ २८ ॥

सोऽवमन्य तथास्माकमनादृत्य च केशवम् ।
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥ २९ ॥
‘उसने हमलोगोंका अपमान और केशवका अनादर करके आज बलपूर्वक सुभद्राका अपहरण किया है, जो उसके लिये अपनी मृत्युके समान है ॥ २९ ॥

कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम ।
मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ॥ ३० ॥
‘गोविन्द! जैसे सर्प पैरकी ठोकर नहीं सह सकता, उसी प्रकार मैं उसने जो मेरे सिरपर पैर रख दिया है, उसे कैसे सह सकूँगा? ॥ ३० ॥

अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुंधराम् ।
न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥ ३१ ॥
‘अर्जुनका यह अन्याय मेरे लिये असह्य है। आज मैं अकेला ही इस वसुन्धराको कुरुवंशियोंसे विहीन कर दूँगा’ ॥ ३१ ॥

तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् ।
अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ॥ ३२ ॥
मेघ और दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनिके समान बलरामजीकी वैसी गर्जना सुनकर उस समय भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके समस्त वीरोंने उन्हींका अनुसरण किया ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपर्वणि बलदेवक्रोधे
एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सुभद्राहरणपर्वमें बलदेवक्रोधविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥