महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
वैशम्पायन उवाच
ततः समुद्रे तीर्थानि दक्षिणे भरतर्षभ ।
अभ्यगच्छत् सुपुण्यानि शोभितानि तपस्विभिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अर्जुन दक्षिण समुद्रके तटपर तपस्वीजनोंसे सुशोभित परम पुण्यमय तीर्थोंमें गये ॥ १ ॥
वर्जयन्ति स्म तीर्थानि तत्र पञ्च स्म तापसाः ।
अवकीर्णानि यान्यासन् पुरस्तात् तु तपस्विभिः ॥ २ ॥
वहाँ उन दिनों तपस्वीलोग पाँच तीर्थोंको छोड़ देते थे। ये वे ही तीर्थ थे, जहाँ पूर्वकालमें बहुतेरे तपस्वी महात्मा भरे रहते थे ॥ २ ॥
अगस्त्यतीर्थं सौभद्रं पौलोमं च सुपावनम् ।
कारन्धमं प्रसन्नं च हयमेधफलं च तत् ॥ ३ ॥
भारद्वाजस्य तीर्थं तु पापप्रशमनं महत् ।
एतानि पञ्च तीर्थानि ददर्श कुरुसत्तमः ॥ ४ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—अगस्त्यतीर्थ, सौभद्र-तीर्थ, परम पावन पौलोमतीर्थ, अश्वमेध यज्ञका फल देनेवाला स्वच्छ कारन्धमतीर्थ तथा पापनाशक महान् भारद्वाजतीर्थ। कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने इन पाँचों तीर्थोंका दर्शन किया ॥ ३-४ ॥
विविक्तान्युपलक्ष्याथ तानि तीर्थानि पाण्डवः ।
दृष्ट्वा च वर्ज्यमानानि मुनिभिर्धर्मबुद्धिभिः ॥ ५ ॥
पाण्डुपुत्र अर्जुनने देखा, ये सभी तीर्थ बड़े एकान्तमें हैं, तो भी एकमात्र धर्ममें बुद्धिको लगाये रखनेवाले मुनि भी उन तीर्थोंको दूरसे ही छोड़ दे रहे हैं ॥ ५ ॥
तपस्विनस्ततोऽपृच्छत् प्राञ्जलिः कुरुनन्दनः ।
तीर्थानीमानि वर्ज्यन्ते किमर्थं ब्रह्मवादिभिः ॥ ६ ॥
तब कुरुनन्दन धनंजयने दोनों हाथ जोड़कर तपस्वी मुनियोंसे पूछा—‘वेदवक्ता ऋषिगण इन तीर्थोंका परित्याग किसलिये कर रहे हैं?’ ॥ ६ ॥
तापसा ऊचुः
ग्राहाः पञ्च वसन्त्येषु हरन्ति च तपोधनान् ।
तत एतानि वर्ज्यन्ते तीर्थानि कुरुनन्दन ॥ ७ ॥
**तपस्वी बोले—**कुरुनन्दन! उन तीर्थोंमें पाँच ग्राह रहते हैं, जो नहानेवाले तपोधन ऋषियोंको जलके भीतर खींच ले जाते हैं; इसीलिये ये तीर्थ मुनियोंद्वारा त्याग दिये गये हैं॥ ७॥
वैशम्पायन उवाच
तेषां श्रुत्वा महाबाहुर्वार्यमाणस्तपोधनैः।
जगाम तानि तीर्थानि द्रष्टुं पुरुषसत्तमः॥ ८॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**उनकी बातें सुनकर कुरुश्रेष्ठ महाबाहु अर्जुन उन तपोधनोंके मना करनेपर भी उन तीर्थोंका दर्शन करनेके लिये गये॥ ८॥
ततः सौभद्रमासाद्य महर्षेस्तीर्थमुत्तमम्।
विगाह्य सहसा शूरः स्नानं चक्रे परंतपः॥ ९॥
तदनन्तर परंतप शूरवीर अर्जुन महर्षि सुभद्रके उत्तम सौभद्रतीर्थमें सहसा उतरकर स्नान करने लगे॥ ९॥
अथ तं पुरुषव्याघ्रमन्तर्जलचरो महान्।
जग्राह चरणे ग्राहः कुन्तीपुत्रं धनंजयम्॥ १०॥
इतनेमें ही जलके भीतर विचरनेवाले एक महान् ग्राहने नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजयका एक पैर पकड़ लिया॥ १०॥
स तमादाय कौन्तेयो विस्फुरन्तं जलेचरम्।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्बलेन बलिनां वरः॥ ११॥
परंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कुन्तीकुमार बहुत उछल-कूद मचाते हुए उस जलचर जीवको लिये-दिये पानीसे बाहर निकल आये॥ ११॥
उत्कृष्ट एव ग्राहस्तु सोऽर्जुनेन यशस्विना।
बभूव नारी कल्याणी सर्वाभरणभूषिता॥ १२॥
यशस्वी अर्जुनद्वारा पानीके ऊपर खिंच आनेपर वह ग्राह समस्त आभूषणोंसे विभूषित एक परम सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ १२॥
दीप्यमाना श्रिया राजन् दिव्यरूपा मनोरमा।
तदद्भुतं महत् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः॥ १३॥
तां स्त्रियं परमप्रीत इदं वचनमब्रवीत्।
का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी॥ १४॥
किमर्थं च महत् पापमिदं कृतवती पुरा।
राजन्! वह दिव्यरूपिणी मनोरमा रमणी अपनी अद्भुत कान्तिसे प्रकाशित हो रही थी। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर कुन्तीनन्दन धनंजय बड़े प्रसन्न हुए और उस स्त्रीसे इस प्रकार बोले—‘कल्याणी! तुम कौन हो और कैसे जलचरयोनिको प्राप्त हुई थी? तुमने पूर्वकालमें ऐसा महान् पाप किसलिये किया जिससे तुम्हारी यह दुर्गति हुई?’ ॥ १३-१४½ ॥
वर्गोवाच
अप्सरास्मि महाबाहो देवारण्यविहारिणी ॥ १५ ॥
**वर्गा बोली—**महाबाहो! मैं नन्दनवनमें विहार करनेवाली एक अप्सरा हूँ ॥ १५ ॥
इष्टा धनपतेर्नित्यं वर्गा नाम महाबल ।
मम सख्यश्चतस्रोऽन्याः सर्वाः कामगमाः शुभाः ॥ १६ ॥
महाबल! मेरा नाम वर्गा है। मैं कुबेरकी नित्यप्रेयसी रही हूँ। मेरी चार दूसरी सखियाँ भी हैं। वे सब इच्छानुसार गमन करनेवाली और सुन्दरी हैं ॥ १६ ॥
ताभिः सार्धं प्रयातास्मि लोकपालनिवेशनम् ।
ततः पश्यामहे सर्वा ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १७ ॥
उन सबके साथ एक दिन मैं लोकपाल कुबेरके घरपर जा रही थी। मार्गमें हम सबने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले एक ब्राह्मणको देखा ॥ १७ ॥
रूपवन्तमधीयानमेकमेकान्तचारिणम् ।
तस्यैव तपसा राजंस्तद् वनं तेजसाऽऽवृतम् ॥ १८ ॥
वे बड़े रूपवान् थे और अकेले एकान्तमें रहकर वेदोंका स्वाध्याय करते थे। राजन्! उन्हींकी तपस्यासे वह सारा वनप्रान्त तेजोमय हो रहा था ॥ १८ ॥
आदित्य इव तं देशं कृत्स्नं सर्वं व्यकाशयत् ।
तस्य दृष्ट्वा तपस्तादृग् रूपं चाद्भुतमुत्तमम् ॥ १९ ॥
अवतीर्णाः स्म तं देशं तपोविघ्नचिकीर्षया ।
वे सूर्यकी भाँति उस सम्पूर्ण प्रदेशको प्रकाशित कर रहे थे। उनकी वैसी तपस्या और वह अद्भुत एवं उत्तम रूप देखकर हम सभी अप्सराएँ उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे उस स्थानमें उतर पड़ीं ॥ १९½ ॥
अहं च सौरभेयी च समीची बुद्बुदा लता ॥ २० ॥
यौगपद्येन तं विप्रमभ्यगच्छाम भारत ।
गायन्त्योऽथ हसन्त्यश्च लोभयित्वा च तं द्विजम् ॥ २१ ॥
भारत! मैं, सौरभेयी, समीची, बुद्बुदा और लता—पाँचों एक ही साथ उन ब्राह्मणके समीप गयीं और उन्हें लुभाती हुई हँसने तथा गाने लगीं ॥ २०-२१ ॥
स च नास्मासु कृतवान् मनो वीर कथंचन ।
नाकम्पत महातेजाः स्थितस्तपसि निर्मले ॥ २२ ॥
परंतु वीरवर! उन्होंने किसी प्रकार भी अपने मनको हमारी ओर नहीं खिंचने दिया। वे महातेजस्वी ब्राह्मण निर्मल तपस्यामें संलग्न थे। वे उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ २२ ॥
सोऽशपत् कुपितोऽस्मासु ब्राह्मणः क्षत्रियर्षभ ।
ग्राहभूता जले यूयं चरिष्यथ शतं समाः ॥ २३ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! हमारी उद्दण्डतासे कुपित होकर उन ब्राह्मणने हमें शाप दे दिया—‘तुमलोग सौ वर्षोंतक जलमें ग्राह बनकर रहोगी’ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वणि तीर्थग्राहविमोचने
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें तीर्थग्राहविमोचनविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥