सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 415)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकषष्टितमोऽध्यायः

कौरव-पाण्डवोंमें फूट और युद्ध होनेके वृत्तान्तका सूत्ररूपमें निर्देश

वैशम्पायन उवाच

गुरवे प्राङ्नमस्कृत्य मनोबुद्धिसमाधिभिः ।
सम्पूज्य च द्विजान् सर्वांस्तथान्यान् विदुषो जनान् ॥ १ ॥
महर्षेर्विश्रुतस्येह सर्वलोकेषु धीमतः ।
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यास्य महात्मनः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! मैं सबसे पहले श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्तसे अपने गुरुदेव श्रीव्यासजी महाराजको साष्टांग नमस्कार करके सम्पूर्ण द्विजों तथा अन्यान्य विद्वानोंका समादर करते हुए यहाँ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात महर्षि एवं महात्मा इन परम बुद्धिमान् व्यासजीके मतका पूर्णरूपसे वर्णन करता हूँ ॥ १-२ ॥

श्रोतुं पात्रं च राजंस्त्वं प्राप्येमां भारतीं कथाम् ।
गुरोर्वक्त्रपरिस्पन्दो मनः प्रोत्साहतीव मे ॥ ३ ॥

जनमेजय! तुम इस महाभारतकी कथाको सुननेके लिये उत्तम पात्र हो और मुझे यह कथा उपलब्ध है तथा श्रीगुरुजीके मुखारविन्दसे मुझे यह आदेश मिल गया है कि मैं तुम्हें कथा सुनाऊँ, इससे मेरे मनको बड़ा उत्साह प्राप्त होता है ॥ ३ ॥

शृणु राजन् यथा भेदः कुरुपाण्डवयोरभूत् ।
राज्यार्थे द्यूतसम्भूतो वनवासस्तथैव च ॥ ४ ॥
यथा च युद्धमभवत् पृथिवीक्षयकारकम् ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि पृच्छते भरतर्षभ ॥ ५ ॥

राजन्! जिस प्रकार कौरव और पाण्डवोंमें फूट पड़ी, वह प्रसंग सुनो। राज्यके लिये जो जुआ खेला गया, उससे उनमें फूट हुई और उसीके कारण पाण्डवोंका वनवास हुआ। भरतश्रेष्ठ! फिर जिस प्रकार पृथिवीके वीरोंका विनाश करनेवाला महाभारत-युद्ध हुआ, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार तुमसे कहता हूँ, सुनो ॥ ४-५ ॥

मृते पितरि ते वीरा वनादेत्य स्वमन्दिरम् ।
नचिरादेव विद्वांसो वेदे धनुषि चाभवन् ॥ ६ ॥

अपने पिता महाराज पाण्डुके स्वर्गवासी हो जानेपर वे वीर पाण्डव वनसे अपने राजभवनमें आकर रहने लगे। वहाँ थोड़े ही दिनोंमें वे वेद तथा धनुर्वेदके पूरे पण्डित हो गये ॥ ६ ॥

तांस्तथा सत्त्ववीर्यौजः सम्पन्नान् पौरसम्मतान् ।
नाम्ऋष्यन् कुरवो दृष्ट्वा पाण्डवाञ्छ्रीयशोभृतः ॥ ७ ॥
सत्त्व (धैर्य और उत्साह), वीर्य (पराक्रम) तथा ओज (देहबल)-से सम्पन्न होनेके कारण पाण्डवलोग पुरवासियोंके प्रेम और सम्मानके पात्र थे। उनके धन, सम्पत्ति और यशकी वृद्धि होने लगी। यह सब देखकर कौरव उनके उत्कर्षको सहन न कर सके ॥ ७ ॥

ततो दुर्योधनः क्रूरः कर्णश्च सहसौबलः ।
तेषां निग्रहनिर्वासान् विविधांस्ते समारभन् ॥ ८ ॥
तब क्रूर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि तीनोंने मिलकर पाण्डवोंको वशमें करने या देशसे निकाल देनेके लिये नाना प्रकारके यत्न आरम्भ किये ॥ ८ ॥

ततो दुर्योधनः शूरः कुलिङ्गस्य मते स्थितः ।
पाण्डवान् विविधोपायै राज्यहेतोरपीडयत् ॥ ९ ॥
शकुनिकी सम्मतिसे चलनेवाले शूरवीर दुर्योधनने राज्यके लिये भाँति-भाँतिके उपाय करके पाण्डवोंको पीड़ा दी ॥ ९ ॥

ददावथ विषं पापो भीमाय धृतराष्ट्रजः ।
जरयामास तद् वीरः सहान्नेन वृकोदरः ॥ १० ॥
उस पापी धृतराष्ट्रपुत्रने भीमसेनको विष दे दिया, किंतु वीरवर भीमसेनने भोजनके साथ उस विषको भी पचा लिया ॥ १० ॥

प्रमाणकोट्यां संसुप्तं पुनर्बद्ध्वा वृकोदरम् ।
तोयेषु भीमं गङ्गायाः प्रक्षिप्य पुरमाव्रजत् ॥ ११ ॥
फिर दुर्योधनने गङ्गाके प्रमाणकोटि नामक तीर्थपर सोये हुए भीमसेनको बाँधकर गङ्गाजीके गहरे जलमें डाल दिया और स्वयं चुपचाप नगरमें लौट आया ॥ ११ ॥

यदा विबुद्धः कौन्तेयस्तदा संछिद्य बन्धनम् ।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्भीमसेनो गतव्यथः ॥ १२ ॥
जब कुन्तीनन्दन महाबाहु भीमकी आँख खुली, तब वे सारा बन्धन तोड़कर बिना किसी पीड़ाके उठ खड़े हुए ॥ १२ ॥

आशीविषैः कृष्णसर्पैः सुप्तं चैनमदंशयत् ।
सर्वेष्वेवाङ्गदेशेषु न ममार च शत्रुहा ॥ १३ ॥
एक दिन दुर्योधनने भीमसेनको सोते समय उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगोंमें काले साँपोंसे डँसवा दिया, किंतु शत्रुघाती भीम मर न सके ॥ १३ ॥

तेषां तु विप्रकारेषु तेषु तेषु महामतिः ।
मोक्षणे प्रतिकारे च विदुरोऽवहितोऽभवत् ॥ १४ ॥
कौरवोंके द्वारा किये हुए उन सभी अपकारोंके समय पाण्डवोंको उनसे छुड़ाने अथवा उनका प्रतीकार करनेके लिये परम बुद्धिमान् विदुरजी सदा सावधान रहते थे ॥ १४ ॥

स्वर्गस्थो जीवलोकस्य यथा शक्रः सुखावहः ।
पाण्डवानां तथा नित्यं विदुरोऽपि सुखावहः ॥ १५ ॥
जैसे स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले इन्द्र सम्पूर्ण जीव-जगत्‌को सुख पहुँचाते रहते हैं, उसी प्रकार विदुरजी भी सदा पाण्डवोंको सुख दिया करते थे ॥ १५ ॥
यदा तु विविधोपायैः संवृतैर्विवृतैरपि ।
नाशकद् विनिहन्तुं तान् दैवभाव्यर्थरक्षितान् ॥ १६ ॥
ततः सम्मन्त्र्य सचिवैर्वृषदुःशासनादिभिः ।
धृतराष्ट्रमनुज्ञाप्य जातुषं गृहमादिशत् ॥ १७ ॥
भविष्यमें जो घटना घटित होनेवाली थी, उसके लिये मानो दैव ही पाण्डवोंकी रक्षा कर रहा था। जब छिपकर या प्रकटरूपमें किये हुए अनेक उपायोंसे भी दुर्योधन पाण्डवोंका नाश न कर सका, तब उसने कर्ण और दुःशासन आदि मन्त्रियोंसे सलाह करके धृतराष्ट्रकी आज्ञासे वारणावत नगरमें एक लाहका घर बनानेकी आज्ञा दी ॥ १६-१७ ॥
सुतप्रियैषी तान् राजा पाण्डवानम्बिकासुतः ।
ततो विवासयामास राज्यभोगबुभुक्षया ॥ १८ ॥
अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र अपने पुत्रका प्रिय चाहनेवाले थे। अतः उन्होंने राज्यभोगकी इच्छासे पाण्डवोंको हस्तिनापुर छोड़कर वारणावतके लाक्षागृहमें रहनेकी आज्ञा दे दी ॥ १८ ॥
ते प्रतिष्ठन्त सहिता नगरान्नागसाह्वयात् ।
प्रस्थाने चाभवन्मन्त्री क्षत्ता तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥
तेन मुक्ता जतुगृहान्निशीथे प्राद्रवन् वनम् ।
मातासहित पाँचों पाण्डव एक साथ हस्तिनापुरसे प्रस्थित हुए। उन महात्मा पाण्डवोंके प्रस्थानकालमें विदुरजी सलाह देनेवाले हुए। उन्हींकी सलाह एवं सहायतासे पाण्डवलोग लाक्षागृहसे बचकर आधीरातके समय वनमें भाग निकले थे ॥ १९½ ॥
ततः सम्प्राप्य कौन्तेया नगरं वारणावतम् ॥ २० ॥
न्यवसन्त महात्मानो मात्रा सह परंतपाः ।
धृतराष्ट्रेण चाज्ञप्ता उषिता जातुषे गृहे ॥ २१ ॥
पुरोचनाद् रक्षमाणाः संवत्सरमतन्द्रिताः ।
सुरुङ्गां कारयित्वा तु विदुरेण प्रचोदिताः ॥ २२ ॥
आदीप्य जातुषं वेश्म दग्ध्वा चैव पुरोचनम् ।
प्राद्रवन् भयसंविग्ना मात्रा सह परंतपाः ॥ २३ ॥
धृतराष्ट्रकी आज्ञासे शत्रुओंका दमन करनेवाले कुन्तीकुमार महात्मा पाण्डव वारणावत नगरमें आकर लाक्षागृहमें अपनी माताके साथ रहने लगे। पुरोचनसे सुरक्षित हो सदा सजग रहकर उन्होंने एक वर्षतक वहाँ निवास किया। फिर विदुरकी प्रेरणा (विदुरके भेजे हुए

आदमियों)-से पाण्डवोंने एक सुरंग खुदवायी। तत्पश्चात् वे शत्रुसंतापी पाण्डव उस लाक्षागृहमें आग लगा पुरोचनको दग्ध करके भयसे व्याकुल हो मातासहित सुरंगद्वारा वहाँसे निकल भागे ॥ २०—२३ ॥

ददृशुर्दारुणं रक्षो हिडिम्बं वननिर्झरे ।
हत्वा च तं राक्षसेन्द्रं भीताः समवबोधनात् ॥ २४ ॥
निशि सम्प्राद्रवन् पार्था धार्तराष्ट्रभयार्दिताः ।
प्राप्ता हिडिम्बा भीमेन यत्र जातो घटोत्कचः ॥ २५ ॥
तत्पश्चात् वनमें एक झरनेके पास उन्होंने एक भयंकर राक्षसको देखा, जिसका नाम हिडिम्ब था। राक्षसराज हिडिम्बको मारकर पाण्डवलोग प्रकट होनेके भयसे रातमें ही वहाँसे दूर निकल गये। उस समय उन्हें धृतराष्ट्रके पुत्रोंका भय सता रहा था। हिडिम्ब-वधके पश्चात् भीमको हिडिम्बा नामकी राक्षसी पत्नीरूपमें प्राप्त हुई, जिसके गर्भसे घटोत्कचका जन्म हुआ ॥ २४-२५ ॥

एकचक्रां ततो गत्वा पाण्डवाः संशितव्रताः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नास्तेऽभवन् ब्रह्मचारिणः ॥ २६ ॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डव एकचक्रा नगरीमें जाकर वेदाध्ययनपरायण ब्रह्मचारी बन गये ॥ २६ ॥

ते तत्र नियताः कालं कंचिदूषुर्नरर्षभाः ।
मात्रा सहैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ २७ ॥
उस एकचक्रा नगरीमें वे नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ एक ब्राह्मणके घरमें कुछ कालतक टिके रहे ॥ २७ ॥

तत्राससाद क्षुधितं पुरुषादं वृकोदरः ।
भीमसेनो महाबाहुर्बकं नाम महाबलम् ॥ २८ ॥
उस नगरके समीप एक मनुष्यभक्षी राक्षस रहता था, जिसका नाम था बक। एक दिन महाबाहु भीमसेन उस क्षुधातुर महाबली राक्षस बकके समीप गये ॥ २८ ॥

तं चापि पुरुषव्याघ्रो बाहुवीर्येण पाण्डवः ।
निहत्य तरसा वीरो नगरान् पर्यसान्त्वयत् ॥ २९ ॥
नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन वीरवर भीमने अपने बाहुबलसे उस राक्षसको वेगपूर्वक मारकर वहाँके नगरनिवासियोंको धैर्य बँधाया ॥ २९ ॥

ततस्ते शुश्रुवुः कृष्णां पञ्चालेषु स्वयंवराम् ।
श्रुत्वा चैवाभ्यगच्छन्त गत्वा चैवालभन्त ताम् ॥ ३० ॥
ते तत्र द्रौपदीं लब्ध्वा परिसंवत्सरोषिताः ।
विदिता हास्तिनपुरं प्रत्याजग्मुररिंदमाः ॥ ३१ ॥

वहीं सुननेमें आया कि पांचाल देशकी राजकुमारी कृष्णाका स्वयंवर होनेवाला है। यह सुनकर पाण्डव वहाँ गये और जाकर उन्होंने राजकुमारीको प्राप्त कर लिया। द्रौपदीको प्राप्त करनेके बाद पहचान लिये जानेपर भी वे एक वर्षतक पांचाल देशमें ही रहे। फिर वे शत्रुदमन पाण्डव पुनः हस्तिनापुर लौट आये॥ ३०-३१॥
ते उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च ।
भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति ॥ ३२ ॥
अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः ।
तस्माज्जनपदोपेतं सुविभक्तमहापथम् ॥ ३३ ॥
वासाय खाण्डवप्रस्थं व्रजध्वं गतमत्सराः ।
तयोस्ते वचनाज्जग्मुः सह सर्वैः सुहृज्जनैः ॥ ३४ ॥
नगरं खाण्डवप्रस्थं रत्नान्यादाय सर्वशः ।
तत्र ते न्यवसन् पार्थाः संवत्सरगणान् बहून् ॥ ३५ ॥
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीभृतः ।
एवं धर्मप्रधानास्ते सत्यव्रतपरायणाः ॥ ३६ ॥
अप्रमत्तोत्थिताः क्षान्ताः प्रतपन्तोऽहितान् बहून् ।
वहाँ आनेपर राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मजीने उनसे कहा—'तात! तुम्हें अपने भाई कौरवोंके साथ लड़ने-झगड़नेका अवसर न प्राप्त हो इसके लिये हमने विचार किया है कि तुमलोग खाण्डवप्रस्थमें रहो। वहाँ अनेक जनपद उससे जुड़े हुए हैं। वहाँ सुन्दर विभागपूर्वक बड़ी-बड़ी सड़कें बनी हुई हैं। अतः तुमलोग ईर्ष्याका त्याग करके खाण्डवप्रस्थमें रहनेके लिये जाओ।' उन दोनोंके इस प्रकार आज्ञा देनेपर सब पाण्डव अपने समस्त सुहृदोंके साथ सब प्रकारके रत्न लेकर खाण्डवप्रस्थको चले गये। वहाँ वे कुन्तीपुत्र अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे अन्यान्य राजाओंको अपने वशमें करते हुए बहुत वर्षोंतक निवास करते रहे। इस प्रकार धर्मको प्रधानता देनेवाले, सत्यव्रतके पालनमें तत्पर, सदा सावधान एवं सजग रहनेवाले, क्षमाशील पाण्डव वीर बहुत-से शत्रुओंको संतप्त करते हुए वहाँ निवास करने लगे ॥ ३२—३६ ½ ॥
अजयद् भीमसेनस्तु दिशं प्राचीं महायशाः ॥ ३७ ॥
उदीचीमर्जुनो वीरः प्रतीचीं नकुलस्तथा ।
दक्षिणां सहदेवस्तु विजिग्ये परवीरहा ॥ ३८ ॥
महायशस्वी भीमसेनने पूर्व दिशापर विजय पायी। वीर अर्जुनने उत्तर, नकुलने पश्चिम और शत्रु वीरोंका संहार करनेवाले सहदेवने दक्षिण दिशापर विजय प्राप्त की॥ ३७-३८॥
एवं चक्रुरिमां सर्वे वशे कृत्स्नां वसुन्धराम् ।
पञ्चभिः सूर्यसंकाशैः सूर्येण च विराजता ॥ ३९ ॥
षट्सूर्येवाभवत् पृथ्वी पाण्डवैः सत्यविक्रमैः ।

ततो निमित्ते कस्मिंश्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४० ॥
वनं प्रस्थापयामास तेजस्वी सत्यविक्रमः ।
प्राणेभ्योऽपि प्रियतरं भ्रातरं सव्यसाचिनम् ॥ ४१ ॥
अर्जुनं पुरुषव्याघ्रं स्थिरात्मानं गुणैर्युतम् ।
(धैर्यात् सत्याच्च धर्माच्च विजयाच्चाधिकप्रियः ।
अर्जुनो भ्रातरं ज्येष्ठं नात्यवर्तत जातुचित् ॥)
स वै संवत्सरं पूर्णं मासं चैकं वने वसन् ॥ ४२ ॥

इस तरह सब पाण्डवोंने समूची पृथिवीको अपने वशमें कर लिया। वे पाँचों भाई सूर्यके समान तेजस्वी थे और आकाशमें नित्य उदित होनेवाले सूर्य तो प्रकाशित थे ही; इस तरह सत्यपराक्रमी पाण्डवोंके होनेसे यह पृथ्वी मानो छः सूर्योंसे प्रकाशित होनेवाली बन गयी। तदनन्तर कोई निमित्त बन जानेके कारण सत्यपराक्रमी तेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने अपने प्राणोंसे भी अत्यन्त प्रिय, स्थिर-बुद्धि तथा सद्गुणयुक्त भाई नरश्रेष्ठ सव्यसाची अर्जुनको वनमें भेज दिया। अर्जुन अपने धैर्य, सत्य, धर्म और विजयशीलताके कारण भाइयोंको अधिक प्रिय थे। उन्होंने अपने बड़े भाईकी आज्ञाका कभी उल्लंघन नहीं किया था। वे पूरे बारह वर्ष और एक मासतक वनमें रहे ॥ ३९—४२ ॥

(तीर्थयात्रां च कृतवान् नागकन्यामवाप्य च ।
पाण्ड्यस्य तनयां लब्ध्वा तत्र ताभ्यां सहोषितः ॥)
ततोऽगच्छद्धृषीकेशं द्वारवत्यां कदाचन ।
लब्धवांस्तत्र बीभत्सुर्भार्यां राजीवलोचनाम् ॥ ४३ ॥
अनुजां वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ।
सा शचीव महेन्द्रेण श्रीः कृष्णेनेव संगता ॥ ४४ ॥
सुभद्रा युयुजे प्रीत्या पाण्डवेनार्जुनेन ह ।

उसी समय उन्होंने निर्मल तीर्थोंकी यात्रा की और नागकन्या उलूपीको पाकर पाण्ड्यदेशीय नरेश चित्रवाहनकी पुत्री चित्रांगदाको भी प्राप्त किया और उन-उन स्थानोंमें उन दोनोंके साथ कुछ कालतक निवास किया। तत्पश्चात् वे किसी समय द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्णके पास गये। वहाँ अर्जुनने मंगलमय वचन बोलनेवाली कमललोचना सुभद्राको, जो वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी छोटी बहिन थी, पत्नीरूपमें प्राप्त किया। जैसे इन्द्रसे शची और भगवान् विष्णुसे लक्ष्मी संयुक्त हुई हैं, उसी प्रकार सुभद्रा बड़े प्रेमसे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे मिली ॥ ४३-४४ ½ ॥

अतर्पयच्च कौन्तेयः खाण्डवे हव्यवाहनम् ॥ ४५ ॥
बीभत्सुर्वासुदेवेन सहितो नृपसत्तम ।
नातिभारो हि पार्थस्य केशवेन सहाभवत् ॥ ४६ ॥
व्यवसायसहायस्य विष्णोः शत्रुवधेष्विव ।

तत्पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें भगवान् वासुदेवके साथ रहकर अग्निदेवको तृप्त किया। नृपश्रेष्ठ जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका साथ होनेसे अर्जुनको इस कार्यमें ठीक उसी तरह अधिक परिश्रम या भारका अनुभव नहीं हुआ, जैसे दृढ़ निश्चयको सहायक बनाकर देवशत्रुओंका वध करते समय भगवान् विष्णुको भार या परिश्रमकी प्रतीति नहीं होती है ॥ ४५-४६ १/२ ॥

पार्थायाग्निर्ददौ चापि गाण्डीवं धनुरुत्तमम् ॥ ४७ ॥
इषुधी चाक्षयैर्बाणै रथं च कपिलक्षणम् ।
मोक्षयामास बीभत्सुर्मयं यत्र महासुरम् ॥ ४८ ॥
तदनन्तर अग्निदेवने संतुष्ट हो अर्जुनको उत्तम गाण्डीव धनुष, अक्षय बाणोंसे भरे हुए दो तूणीर और एक कपिध्वज रथ प्रदान किया। उसी समय अर्जुनने महान् असुर मयको खाण्डव वनमें जलनेसे बचाया था ॥ ४७-४८ ॥

स चकार सभां दिव्यां सर्वरत्नसमाचिताम् ।
तस्यां दुर्योधनो मन्दो लोभं चक्रे सुदुर्मतिः ॥ ४९ ॥
इससे संतुष्ट होकर उसने अर्जुनके लिये एक दिव्य सभाभवनका निर्माण किया, जो सब प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित था। खोटी बुद्धिवाले मूर्ख दुर्योधनके मनमें उस सभाको ले लेनेके लिये लोभ पैदा हुआ ॥ ४९ ॥

ततोऽक्षैर्वञ्चयित्वा च सौबलेन युधिष्ठिरम् ।
वनं प्रस्थापयामास सप्त वर्षाणि पञ्च च ॥ ५० ॥
अज्ञातमेकं राष्ट्रे च ततो वर्षं त्रयोदशम् ।
ततश्चतुर्दशे वर्षे याचमानाः स्वकं वसु ॥ ५१ ॥
तब उसने शकुनिकी सहायतासे कपटपूर्ण जुएके द्वारा युधिष्ठिरको ठग लिया और उन्हें बारह वर्षतक वनमें और तेरहवें वर्ष एक राष्ट्रमें अज्ञात-रूपसे वास करनेके लिये भेज दिया। इसके बाद चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंने लौटकर अपना राज्य और धन माँगा ॥ ५०-५१ ॥

नालभन्त महाराज ततो युद्धमवर्तत ।
ततस्ते क्षत्रमुत्साद्य हत्वा दुर्योधनं नृपम् ॥ ५२ ॥
राज्यं विहतभूयिष्ठं प्रत्यपद्यन्त पाण्डवाः ।
एवमेतत् पुरावृत्तं तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।
भेदो राज्यविनाशाय जयश्च जयतां वर ॥ ५३ ॥
महाराज! जब इस प्रकार न्यायपूर्वक माँगनेपर भी उन्हें राज्य नहीं मिला, तब दोनों दलोंमें युद्ध छिड़ गया। फिर तो पाण्डव-वीरोंने क्षत्रियकुलका संहार करके राजा दुर्योधनको भी मार डाला और अपने राज्यको, जिसका अधिकांश भाग उजाड़ हो गया था, पुनः अपने अधिकारमें कर लिया। विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! अनायास महान् कर्म करनेवाले

पाण्डवोंका यही पुरातन इतिहास है। इस प्रकार राज्यके विनाशके लिये उनमें फूट पड़ी और युद्धके बाद उन्हें विजय प्राप्त हुई ।। ५२-५३ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि भारतसूत्रं नामैकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अंशावतरणपर्वमें भारतसूत्र नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं)