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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2125)

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पञ्चषष्टितमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका धन, राज्य, भाइयों तथा द्रौपदीसहित अपनेको भी हारना

शकुनिरुवाच

बहु वित्तं पराजैषीः पाण्डवानां युधिष्ठिर ।
आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥ १ ॥
**शकुनि बोला—**कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! आप अबतक पाण्डवोंका बहुत-सा धन हार चुके। यदि आपके पास बिना हारा हुआ कोई धन शेष हो तो बताइये ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मम वित्तमसंख्येयं यदहं वेद सौबल ।
अथ त्वं शकुने कस्माद् वित्तं समनुपृच्छसि ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**सुबलपुत्र! मेरे पास असंख्य धन है, जिसे मैं जानता हूँ। शकुने! तुम मेरे धनका परिमाण क्यों पूछते हो? ॥ २ ॥
अयुतं प्रयुतं चैव शङ्कं पद्मं तथार्बुदम् ।
खर्वं शङ्खं निखर्वं च महापद्मं च कोटयः ॥ ३ ॥
मध्यं चैव परार्धं च सपरं चात्र पण्यताम् ।
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ ४ ॥
अयुत, प्रयुत, शंकु, पद्म, अर्बुद, खर्व, शंख, निखर्व, महापद्म, कोटि, मध्य, परार्ध और पर इतना धन मेरे पास है। राजन्! खेलो, मैं इसीको दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ खेलता हूँ ॥ ३-४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर शकुनिने छलका आश्रय ले पुनः इसी निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह धन भी मैंने जीत लिया' ॥ ५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

गवाश्वं बहुधेनुकमसंख्येयमजाविकम् ।
यत् किंचिदनुपर्णाशां प्राक् सिन्धोरपि सौबल ।
एतन्मम धनं सर्वं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥ ६ ॥

**युधिष्ठिर बोले—**सुबलपुत्र! मेरे पास सिन्धु नदीके पूर्वी तटसे लेकर पर्णाशा नदीके किनारेतक जो भी बैल, घोड़े, गाय, भेड़ एवं बकरी आदि पशुधन हैं, वह असंख्य है। उनमें भी दूध देनेवाली गौओंकी संख्या अधिक है। यह सारा मेरा धन है, जिसे मैं दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। ६ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ।। ७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर शठताके आश्रित हुए शकुनिने अपनी ही जीत घोषित करते हुए युधिष्ठिरसे कहा—'लो, यह दाँव भी मैंने ही जीता' ।। ७ ।।

युधिष्ठिर उवाच

पुरं जनपदो भूमिरब्राह्मणधनैः सह ।
अब्राह्मणाश्च पुरुषा राजञ्छिष्टं धनं मम ।
एतद् राजन् मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ।। ८ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**राजन्! ब्राह्मणोंको जीविकारूपमें जो ग्रामादि दिये गये हैं, उन्हें छोड़कर शेष जो नगर, जनपद तथा भूमि मेरे अधिकारमें है तथा जो ब्राह्मणेतर मनुष्य मेरे यहाँ रहते हैं, वे सब मेरे शेष धन हैं। शकुने! मैं इसी धनको दाँवपर रखकर तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ ।। ८ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ।। ९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर कपटका आश्रय ग्रहण करके शकुनिने पुनः अपनी ही जीतका निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'इस दाँवपर भी मेरी ही विजय हुई' ।। ९ ।।

युधिष्ठिर उवाच

राजपुत्रा इमे राजञ्शोभन्ते यैर्विभूषिताः ।
कुण्डलानि च निष्काश्च सर्वं राजविभूषणम् ।
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वया ।। १० ।।
**युधिष्ठिर बोले—**राजन्! ये राजपुत्र जिन आभूषणोंसे विभूषित होकर शोभित हो रहे हैं, वे कुण्डल और गलेके स्वर्णभूषण आदि समस्त राजकीय आभूषण मेरे धन हैं। इन्हें दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ ।। १० ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्य़ुधिष्ठिरमभाषत ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! यह सुनकर छल-कपटका आश्रय लेनेवाले शकुनिने युधिष्ठिरसे निश्चयपूर्वक कहा—‘लो, यह भी मैंने जीता’ ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

श्यामो युवा लोहिताक्षः सिंहस्कन्धो महाभुजः ।
नकुलो ग्लह एवैको विद्धयेतन्मम तद्धनम् ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर बोले— श्यामवर्ण, तरुण, लाल नेत्रों और सिंहके समान कंधोंवाले महाबाहु नकुलको ही इस समय मैं दाँवपर रखता हूँ, इन्हींको मेरे दाँवका धन समझो ॥ १२ ॥

शकुनिरुवाच

प्रियस्ते नकुलो राजन् राजपुत्रो युधिष्ठिर ।
अस्माकं वशतां प्राप्तो भूयः केनेह दीव्यसे ॥ १३ ॥
शकुनि बोला— धर्मराज युधिष्ठिर! आपके परमप्रिय राजकुमार नकुल तो हमारे अधीन हो गये, अब किस धनसे आप यहाँ खेल रहे हैं? ॥ १३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु तानक्षाञ्छकुनिः प्रत्यदीव्यत ।
जितमित्येव शकुनिर्य़ुधिष्ठिरमभाषत ॥ १४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर शकुनिने पासे फेंके और युधिष्ठिरसे कहा—‘लो, इस दाँवपर भी मेरी ही विजय हुई’ ॥ १४ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अयं धर्मान् सहदेवोऽनुशास्ति
लोके ह्यस्मिन् पण्डिताख्यां गतश्च ।
अनर्हता राजपुत्रेण तेन
दीव्याम्यहं चाप्रियवत् प्रियेण ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले— ये सहदेव धर्मोंका उपदेश करते हैं। संसारमें पण्डितके रूपमें इनकी ख्याति है। मेरे प्रिय राजकुमार सहदेव यद्यपि दाँवपर लगानेके योग्य नहीं हैं, तो भी मैं अप्रिय वस्तुकी भाँति इन्हें दाँवपर रखकर खेलता हूँ ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।

जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! यह सुनकर छली शकुनिने उसी निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा—'यह दाँव भी मैंने ही जीता' ॥ १६ ॥

शकुनिरुवाच
माद्रीपुत्रौ प्रियौ राजंस्तवेमौ विजितौ मया ।
गरीयांसौ तु ते मन्ये भीमसेनधनंजयौ ॥ १७ ॥
शकुनि बोला— राजन्! आपके ये दोनों प्रिय भाई माद्रीके पुत्र नकुल-सहदेव तो मेरे द्वारा जीत लिये गये, अब रहे भीमसेन और अर्जुन। मैं समझता हूँ, ये दोनों आपके लिये अधिक गौरवकी वस्तु हैं (इसीलिये आप इन्हें दाँवपर नहीं लगाते) ॥ १७ ॥

युधिष्ठिर उवाच
अधर्मं चरसे नूनं यो नावेक्षसि वै नयम् ।
यो नः सुमनसां मूढ विभेदं कर्तुमिच्छसि ॥ १८ ॥
युधिष्ठिर बोले— ओ मूढ़! तू निश्चय ही अधर्मका आचरण कर रहा है, जो न्यायकी ओर नहीं देखता। तू शुद्ध हृदयवाले हमारे भाइयोंमें फूट डालना चाहता है ॥

शकुनिरुवाच
गर्ते मत्तः प्रपतते प्रमत्तः स्थाणुमृच्छति ।
ज्येष्ठो राजन् वरिष्ठोऽसि नमस्ते भरतर्षभ ॥ १९ ॥
शकुनि बोला— राजन्! धनके लोभसे अधर्म करनेवाला मतवाला मनुष्य नरककुण्डमें गिरता है। अधिक उन्मत्त हुआ ठूँठा काठ हो जाता है। आप तो आयुमें बड़े और गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। भरतवंशविभूषण! आपको नमस्कार है ॥
स्वप्ने तानि न दृश्यन्ते जाग्रतो वा युधिष्ठिर ।
कितवा यानि दीव्यन्तः प्रलपन्त्युत्कटा इव ॥ २० ॥
धर्मराज युधिष्ठिर! जुआरी जूआ खेलते समय पागल होकर जो अनाप-शनाप बातें बक जाया करते हैं, वे न कभी स्वप्नमें दिखायी देती हैं और न जाग्रत्कालमें ही ॥ २० ॥

युधिष्ठिर उवाच
यो नः संख्ये नौरिव पारनेता
जेता रिपूणां राजपुत्रस्तरस्वी ।
अनर्हता लोकवीरेण तेन
दीव्याम्यहं शकुने फाल्गुनेन ॥ २१ ॥
युधिष्ठिरने कहा— शकुने! जो युद्धरूपी समुद्रमें हमलोगोंको नौकाकी भाँति पार लगानेवाले हैं तथा शत्रुओंपर विजय पाते हैं, वे लोकविख्यात वेगशाली वीर राजकुमार

अर्जुन यद्यपि दाँवपर लगानेयोग्य नहीं हैं, तो भी उनको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ

खेलता हूँ ।। २१ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।

जितमित्येव शकुनिर्य्युधिष्ठिरमभाषत ।। २२ ।।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने पूर्ववत् विजयका

निश्चय करके युधिष्ठिरसे कहा—'यह भी मैंने ही जीता' ।। २२ ।।

शकुनिरुवाच

अयं मया पाण्डवानां धनुर्धरः

पराजितः पाण्डवः सव्यसाची ।

भीमेन राजन् दयितेन दीव्य

यत् कैतवं पाण्डव तेऽवशिष्टम् ।। २३ ।।

शकुनि फिर बोला—राजन्! ये पाण्डवोंमें धनुर्धर वीर सव्यसाची अर्जुन मेरे द्वारा

जीत लिये गये। पाण्डुनन्दन! अब आपके पास भीमसेन ही जुआरियोंको प्राप्त होनेवाले

धनके रूपमें शेष हैं, अतः उन्हींको दाँवपर रखकर खेलिये ।। २३ ।।

युधिष्ठिर उवाच

यो नो नेता युधि नः प्रणेता

यथा वज्री दानवशत्रुरेकः ।

तिर्यक्प्रेक्षी संनतभूर्महात्मा

सिंहस्कन्धो यश्च सदात्यमर्षी ।। २४ ।।

बलेन तुल्यो यस्य पुमान् न विद्यते

गदाभृतामग्रय इहारिमर्दनः ।

अनर्हता राजपुत्रेण तेन

दीव्याम्यहं भीमसेनेन राजन् ।। २५ ।।

युधिष्ठिरने कहा—राजन्! जो युद्धमें हमारे सेनापति और दानवशत्रु वज्रधारी इन्द्रके

समान अकेले ही आगे बढ़नेवाले हैं; जो तिरछी दृष्टिसे देखते हैं, जिनकी भौंहें धनुषकी

भाँति झुकी हुई हैं, जिनका हृदय विशाल और कंधे सिंहके समान हैं, जो सदा अत्यन्त

अमर्षमें भरे रहते हैं, बलमें जिनकी समानता करनेवाला कोई पुरुष नहीं है, जो

गदाधारियोंमें अग्रगण्य तथा अपने शत्रुओंको कुचल डालनेवाले हैं, उन्हीं राजकुमार

भीमसेनको दाँवपर लगाकर मैं जूआ खेलता हूँ। यद्यपि वे इसके योग्य नहीं हैं ।। २४-२५ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर शठताका आश्रय लेकर शकुनिने उसी निश्चयके साथ युधिष्ठिरसे कहा, ‘यह दाँव भी मैंने ही जीता' ॥ २६ ॥

शकुनिरुवाच

बहु वित्तं पराजैषीर्भ्रातृंश्च सहयद्विपान् ।
आचक्ष्व वित्तं कौन्तेय यदि तेऽस्त्यपराजितम् ॥ २७ ॥
**शकुनि बोला—**कुन्तीनन्दन! आप अपने भाइयों और हाथी-घोड़ोंसहित बहुत धन हार चुके, अब आपके पास बिना हारा हुआ धन कोई अवशिष्ट हो, तो बतलाइये ॥

युधिष्ठिर उवाच

अहं विशिष्टः सर्वेषां भ्रातॄणां दयितस्तथा ।
कुर्यामहं जितः कर्म स्वयमात्मन्युपप्लुते ॥ २८ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**मैं अपने सब भाइयोंमें बड़ा और सबका प्रिय हूँ; अतः अपनेको ही दाँवपर लगाता हूँ। यदि मैं हार गया तो पराजित दासकी भाँति सब कार्य करूँगा ॥ २८ ॥

वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः ।
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ २९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर कपटी शकुनिने निश्चयपूर्वक अपनी जीत घोषित करते हुए युधिष्ठिरसे कहा—‘ये दाँव भी मैंने ही जीता’ ॥ २९ ॥

शकुनिरुवाच

एतत् पापिष्ठमकरोर्यदात्मानमहारयः ।
शिष्टे सति धने राजन् पाप आत्मपराजयः ॥ ३० ॥
**शकुनि फिर बोला—**राजन्! आप अपनेको दाँवपर लगाकर जो हार गये, यह आपके द्वारा बड़ा अधर्म-कार्य हुआ। धनके शेष रहते हुए अपने-आपको हार जाना महान् पाप है ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा मताक्षस्तान् ग्लहे सर्वानवस्थितान् ।
पराजयं लोकवीरानुक्त्वा राज्ञां पृथक्-पृथक् ॥ ३१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पासा फेंकनेकी विद्यामें निपुण शकुनिने राजा युधिष्ठिरसे दाँव लगानेके विषयमें उक्त बातें कहकर सभामें बैठे हुए लोक-प्रसिद्ध वीर

राजाओंको पृथक्-पृथक् पाण्डवोंकी पराजय सूचित की ॥ ३१ ॥

शकुनिरुवाच

अस्ति ते वै प्रिया राजन् ग्लह एकोऽपराजितः ।
पणस्व कृष्णां पाञ्चालीं तयाऽऽत्मानं पुनर्जय ॥ ३२ ॥
**तत्पश्चात् शकुनिने फिर कहा—**राजन्! आपकी प्रियतमा द्रौपदी एक ऐसा दाँव है, जिसे आप अबतक नहीं हारे हैं; अतः पांचालराजकुमारी कृष्णाको आप दाँवपर रखिये और उसके द्वारा फिर अपनेको जीत लीजिये ॥ ३२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

नैव ह्रस्वा न महती न कृष्णा नातिरोहिणी ।
नीलकुञ्चितकेशी च तया दीव्याम्यहं त्वया ॥ ३३ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**जो न नाटी है न लंबी, न कृष्णवर्णा है न अधिक रक्तवर्णा तथा जिसके केश नीले और घुँघराले हैं, उस द्रौपदीको दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ ॥ ३३ ॥
शारदोत्पलपत्राक्ष्या शारदोत्पलगन्धया ।
शारदोत्पलसेविन्या रूपेण श्रीसमानया ॥ ३४ ॥
उसके नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलदलके समान सुन्दर एवं विशाल हैं। उसके शरीरसे शारदीय कमलके समान सुगन्ध फैलती रहती है। वह शरद्-ऋतुके कमलोंका सेवन करती है तथा रूपमें साक्षात् लक्ष्मीके समान है ॥ ३४ ॥
तथैव स्यादानृशंस्यात् तथा स्याद् रूपसम्पदा ।
तथा स्याच्छीलसम्पत्त्या यामिच्छेत् पुरुषः स्त्रियम् ॥ ३५ ॥
पुरुष जैसी स्त्री प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है, उसमें वैसा ही दयाभाव है, वैसी ही रूपसम्पत्ति है तथा वैसे ही शील-स्वभाव हैं ॥ ३५ ॥
सर्वैर्गुणैर्हि सम्पन्नामनुकूलां प्रियंवदाम् ।
यादृशीं धर्मकामार्थसिद्धिमिच्छेन्नरः स्त्रियम् ॥ ३६ ॥
वह समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न तथा मनके अनुकूल और प्रिय वचन बोलनेवाली है। मनुष्य धर्म, काम और अर्थकी सिद्धिके लिये जैसी पत्नीकी इच्छा रखता है, द्रौपदी वैसी ही है ॥ ३६ ॥
चरमं संविशति या प्रथमं प्रतिबुध्यते ।
आगोपालाविपालेभ्यः सर्वं वेद कृताकृतम् ॥ ३७ ॥
वह ग्वालों और भेड़ोंके चरवाहोंसे भी पीछे सोती और सबसे पहले जागती है। कौन-सा कार्य हुआ और कौन-सा नहीं हुआ, इन सबकी वह जानकारी रखती है ॥ ३७ ॥
आभाति पद्मवद् वक्त्रं सस्वेदं मल्लिकेव च ।

वेदिमध्या दीर्घकेशी ताम्रास्या नातिलोमशा ॥ ३८ ॥
उसका स्वेदबिन्दुओंसे विभूषित मुख कमलके समान सुन्दर और मल्लिकाके समान सुगन्धित है। उसका मध्यभाग वेदीके समान कृश दिखायी देता है। उसके सिरके केश बड़े-बड़े हैं, मुख और ओष्ठ अरुणवर्णके हैं तथा उसके अंगोंमें अधिक रोमावलियाँ नहीं हैं ॥ ३८ ॥
तयैवंविधया राजन् पाञ्चाल्याहं सुमध्यया ।
ग्लहं दीव्यामि चार्वङ्ग्या द्रौपद्या हन्त सौबल ॥ ३९ ॥
सुबलपुत्र! ऐसी सर्वांगसुन्दरी सुमध्यमा पांचाल-राजकुमारी द्रौपदीको दाँवपर रखकर मैं तुम्हारे साथ जूआ खेलता हूँ; यद्यपि ऐसा करते हुए मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ३९ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता ।
धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः ॥ ४० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बुद्धिमान् धर्मराजके ऐसा कहते ही उस सभामें बैठे हुए बड़े-बूढ़े लोगोंके मुखसे 'धिक्कार है, धिक्कार है' की आवाज आने लगी ॥ ४० ॥
चुक्षुभे सा सभा राजन् राज्ञां संजज्ञिरे शुचः ।
भीष्मद्रोणकृपादीनां स्वेदश्च समजायत ॥ ४१ ॥
राजन्! उस समय सारी सभामें हलचल मच गयी। राजाओंको बड़ा शोक हुआ। भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके शरीरसे पसीना छूटने लगा ॥ ४१ ॥
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् ।
आस्ते ध्यायन्नधोवक्त्रो निःश्वसन्निव पन्नगः ॥ ४२ ॥
विदुरजी तो दोनों हाथोंसे अपना सिर थामकर बेहोश-से हो गये। वे फुँफकारते हुए सर्पकी भाँति उच्छ्वास लेकर मुँह नीचे किये हुए गम्भीर चिन्तामें निमग्न हो बैठे रह गये ॥ ४२ ॥
(बाह्लीकः सोमदत्तश्च प्रातीपेयः ससंजयः ।
द्रौणिर्भूरिश्रवाश्चैव युयुत्सुर्धृतराष्ट्रजः ॥
हस्तौ पिंषन्नधोवक्त्रा निःश्वसन्त इवोरगाः ॥)
बाह्लीक, प्रतीपके पौत्र सोमदत्त, भीष्म, संजय, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा तथा धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सु—ये सब मुँह नीचे किये सर्पोंके समान लंबी साँसें खींचते हुए अपने दोनों हाथ मलने लगे।
धृतराष्ट्रस्तु तं हृष्टः पर्यपृच्छत् पुनः पुनः ।
किं जितं किं जितमिति ह्याकारं नाभ्यरक्षत ॥ ४३ ॥

धृतराष्ट्र मन-ही-मन प्रसन्न हो उनसे बार-बार पूछ रहे थे, 'क्या हमारे पक्षकी जीत हो रही है?' वे अपनी प्रसन्नताकी आकृतिको न छिपा सके ।। ४३ ।।
जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः ।
इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ।। ४४ ।।
दुःशासन आदिके साथ कर्णको तो बड़ा हर्ष हुआ; परंतु अन्य सभासदोंकी आँखोंसे आँसू गिरने लगे ।। ४४ ।।
सौबलस्त्वभिधायैवं जितकाशी मदोत्कटः ।
जितमित्येव तानक्षान् पुनरेवान्वपद्यत ।। ४५ ।।
सुबलपुत्र शकुनिने मैंने यह भी जीत लिया, ऐसा कहकर पासोंको पुनः उठा लिया। उस समय वह विजयोल्लाससे सुशोभित और मदोन्मत्त हो रहा था ।। ४५ ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपदीपराजय पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें द्रौपदीपराजयविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४६ १/३ श्लोक हैं)