महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1847)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके यज्ञमें सब देशके राजाओं, कौरवों तथा यादवोंका आगमन और उन सबके भोजन-विश्राम आदिकी सुव्यवस्था
वैशम्पायन उवाच
स गत्वा हास्तिनपुरं नकुलः समितिंजयः ।
भीष्ममामन्त्रयाञ्चक्रे धृतराष्ट्रं च पाण्डवः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युद्धविजयी पाण्डुकुमार नकुलने हस्तिनापुरमें जाकर भीष्म और धृतराष्ट्रको निमन्त्रित किया ॥ १ ॥
सत्कृत्यामन्त्रितास्तेन आचार्यप्रमुखास्ततः ।
प्रययुः प्रीतमनसो यज्ञं ब्रह्मपुरःसराः ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने बड़े सत्कारके साथ आचार्य आदिको भी न्यौता दिया। वे सब लोग बड़े प्रसन्न मनसे ब्राह्मणोंको आगे करके उस यज्ञमें गये ॥ २ ॥
संश्रुत्य धर्मराजस्य यज्ञं यज्ञविदस्तदा ।
अन्ये च शतशस्तुष्टैर्मनोभिर्भरतर्षभ ॥ ३ ॥
भरतकुलभूषण! यज्ञवेत्ता धर्मराजका यज्ञ सुनकर अन्य सैकड़ों मनुष्य भी संतुष्ट हृदयसे वहाँ गये ॥ ३ ॥
द्रष्टुकामाः सभां चैव धर्मराजं च पाण्डवम् ।
दिग्भ्यः सर्वे समापेतुः क्षत्रियास्तत्र भारत ॥ ४ ॥
समुपादाय रत्नानि विविधानि महान्ति च ।
भारत! धर्मराज युधिष्ठिर और उनकी सभाको देखनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंसे सभी क्षत्रिय वहाँ नाना प्रकारके बहुमूल्य रत्नोंकी भेंट लेकर आये ॥ ४ १/२ ॥
धृतराष्ट्रश्च भीष्मश्च विदुरश्च महामतिः ॥ ५ ॥
दुर्योधनपुरोगाश्च भ्रातरः सर्व एव ते ।
गान्धारराजः सुबलः शकुनिश्च महाबलः ॥ ६ ॥
अचलो वृषकश्चैव कर्णश्च रथिनां वरः ।
तथा शल्यश्च बलवान् बाह्लिकश्च महाबलः ॥ ७ ॥
सोमदत्तोऽथ कौरव्यो भूरिर्भूरिश्रवाः शलः ।
अश्वत्थामा कृपो द्रोणः सैन्धवश्च जयद्रथः ॥ ८ ॥
यज्ञसेनः सपुत्रश्च शाल्वश्च वसुधाधिपः ।
प्राग्ज्योतिषश्च नृपतिर्भगदत्तो महारथः ॥ ९ ॥
स तु सर्वैः सह म्लेच्छैः सागरानूपवासिभिः ।
पर्वतीयाश्च राजानो राजा चैव बृहद्वलः ॥ १० ॥
पौण्ड्रको वासुदेवश्च वङ्गः कालिङ्गकस्तथा ।
आकर्षाः कुन्तलाश्चैव मालवाश्चान्ध्रकास्तथा ॥ ११ ॥
द्राविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा ।
कुन्तिभोजो महातेजाः पार्थिवो गौरवाहनः ॥ १२ ॥
बाह्लिकाश्चापरे शूरा राजानः सर्व एव ते ।
विराटः सह पुत्राभ्यां मावेल्लश्च महाबलः ॥ १३ ॥
राजानो राजपुत्राश्च नानाजनपदेश्वराः ।
धृतराष्ट्र, भीष्म, महाबुद्धिमान् विदुर, दुर्योधन आदि सभी भाई, गान्धारराज सुबल, महाबली शकुनि, अचल, वृषक, रथियोंमें श्रेष्ठ कर्ण, बलवान् राजा शल्य, महाबली बाह्निक, सोमदत्त, कुरुनन्दन भूरि, भूरिश्रवा, शाल, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, सिन्धुराज जयद्रथ, पुत्रोंसहित द्रुपद, राजा शाल्व, प्राग्ज्योतिषपुरके नरेश महारथी भगदत्त, जिनके साथ समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले सब जातियोंके म्लेच्छ भी थे, पर्वतीय नृपतिगण, राजा बृहद्वल, पौण्ड्रक वासुदेव, वंगदेशके राजा, कलिंगनरेश, आकर्ष, कुन्तल, मालव आन्ध्र, द्राविड़ और सिंहलदेशके नरेशगण, काश्मीरनरेश, महातेजस्वी कुन्तिभोज, राजा गौरवाहन, बाह्निक, दूसरे शूर नृपतिगण, अपने दोनों पुत्रोंके साथ विराट, महाबली मावेल्ल तथा नाना जनपदोंके शासक राजा एवं राजकुमार उस यज्ञमें पधारे थे ॥ ५—१३ ½ ॥
शिशुपालो महावीर्यः सह पुत्रेण भारत ॥ १४ ॥
आगच्छत् पाण्डवेयस्य यज्ञं समरदुर्मदः ।
रामश्चैवानिरुद्धश्च कङ्कश्च सहसारणः ॥ १५ ॥
गदप्रद्युम्नसाम्बाश्च चारुदेष्णश्च वीर्यवान् ।
उल्मुको निशठश्चैव वीरश्चाङ्गावहस्तथा ॥ १६ ॥
वृष्णयो निखिलाश्चान्ये समाजग्मुर्महारथाः ।
भारत! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके उस यज्ञमें रणदुर्मद महापराक्रमी राजा शिशुपाल भी अपने पुत्रके साथ आया था। इसके सिवा बलराम, अनिरुद्ध, कंक, सारण, गद, प्रद्युम्न, साम्ब, पराक्रमी चारुदेष्ण, उल्मुक, निशठ, वीर अंगावह तथा अन्य सभी वृष्णिवंशी महारथी उस यज्ञमें आये थे ॥ १४—१६ ½ ॥
एते चान्ये च बहवो राजानो मध्यदेशजाः ॥ १७ ॥
आजग्मुः पाण्डुपुत्रस्य राजसूयं महाक्रतुम् ।
ये तथा दूसरे भी बहुत-से-मध्यदेशीय नरेश पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके राजसूय महायज्ञमें सम्मिलित हुए थे ॥ १७ ½ ॥
ददुस्तेषामावसथान् धर्मराजस्य शासनात् ॥ १८ ॥
बहुभक्ष्यान्वितान् राजन् दीर्घिकावृक्षशोभितान् ।
तथा धर्मात्मजः पूजां चक्रे तेषां महात्मनाम् ॥ १९ ॥
धर्मराजकी आज्ञासे प्रबन्धकोंने उनके ठहरनेके लिये उत्तम भवन दिये, जो बहुत अधिक भोजनसामग्रीसे सम्पन्न थे। राजन्! उन घरोंके भीतर स्नानके लिये बावलियाँ बनी थीं और वे भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे भी सुशोभित थे। धर्मपुत्र युधिष्ठिर उन सभी महात्मा नरेशोंका स्वागत-सत्कार करते थे ॥ १८-१९ ॥
सत्कृताश्च यथोद्दिष्टाञ्जग्मुरावसथान् नृपाः ।
कैलासशिखरप्रख्यान् मनोज्ञान् द्रव्यभूषितान् ॥ २० ॥
उनसे सम्मानित हो उन्हींके बताये हुए विभिन्न भवनोंमें जाकर राजालोग ठहरते थे। वे सभी भवन कैलासशिखरके समान ऊँचे और भव्य थे। नाना प्रकारके द्रव्योंसे विभूषित एवं मनोहर थे ॥ २० ॥
सर्वतः संवृतानुच्चैः प्राकारैः सुकृतैः सितैः ।
सुवर्णजालसंवीतान् मणिकुट्टिमभूषितान् ॥ २१ ॥
वे भव्य भवन सब ओरसे सुन्दर, सफेद और ऊँचे परकोटोंद्वारा घिरे हुए थे। उनमें सोनेकी झालरें लगी थीं। उनके आँगनके फर्शमें मणि एवं रत्न जड़े हुए थे ॥ २१ ॥
सुखारोहणसोपानान् महासनपरिच्छदान् ।
स्रग्दामसमवच्छन्नानुत्तमागुरुगन्धिनः ॥ २२ ॥
उनमें सुखपूर्वक ऊपर चढ़नेके लिये सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। उन महलोंके भीतर बहुमूल्य एवं बड़े-बड़े आसन तथा अन्य आवश्यक सामान थे। उन घरोंको मालाओंसे सजाया गया था। उनमें उत्तम अगुरुकी सुगन्ध व्याप्त हो रही थी ॥ २२ ॥
हंसेन्दुवर्णसदृशानायोजनसुदर्शनान् ।
असम्बाधान् समद्वारान् युतानुच्चावचैर्गुणैः ॥ २३ ॥
वे सभी अतिथिभवन हंस और चन्द्रमाके समान सफेद थे। एक योजन दूरसे ही वे अच्छी तरह दिखायी देने लगते थे। उनमें स्थानकी संकीर्णता या तंगी नहीं थी। सबके दरवाजे बराबर थे। वे सभी गृह विभिन्न गुणों (सुख-सुविधाओं)-से युक्त थे ॥ २३ ॥
बहुधातुनिबद्धाङ्गान् हिमवच्छिखरानिव ।
उनकी दीवारें अनेक प्रकारकी धातुओंसे चित्रित थीं तथा वे हिमालयके शिखरोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे ॥ २३ ½ ॥
विश्रान्तास्ते ततोऽपश्यन् भूमिपा भूरिदक्षिणम् ॥ २४ ॥
वृतं सदस्यैर्बहुभिर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
तत् सदः पार्थिवै कीर्णं ब्राह्मणैश्च महर्षिभि ।
भ्राजते स्म तदा राजन् नाकपृष्ठं यथामरैः ॥ २५ ॥
वहाँ विश्राम करनेके अनन्तर वे भूमिमपाल बहुत दक्षिणा देनेवाले एवं बहुतेरे सदस्योंसे घिरे हुए धर्मराज युधिष्ठिरसे मिले। जनमेजय! उस समय राजाओं, ब्राह्मणों तथा महर्षियोंसे भरा हुआ वह यज्ञमण्डप देवताओंसे भरे-पूरे स्वर्गलोकके समान शोभा पा रहा था॥ २४-२५ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयपर्वणि निमन्त्रितराजागमने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजसूयपर्वमें निमन्त्रित राजाओंका आगमनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥