महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१८७-
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त करना
वैशम्पायन उवाच
यदा निवृत्ता राजानो धनुषः सज्यकर्मणः ।
अथोदतिष्ठद् विप्राणां मध्याज्जिष्णुरुदारधीः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! जब सब राजाओंने उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ानेके कार्यसे मुँह मोड़ लिया, तब उदारबुद्धि अर्जुन ब्राह्मणमण्डलीके बीचसे उठकर खड़े हुए ॥ १ ॥
उदक्रोशन् विप्रमुख्या विधुन्वन्तोऽजिनानि च ।
दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं पार्थमिन्द्रकेतुसमप्रभम् ॥ २ ॥
इन्द्रकी ध्वजाके समान (लंबे) अर्जुनको उठकर धनुषकी ओर जाते देख बड़े-बड़े ब्राह्मण अपने-अपने मृगचर्म हिलाते हुए जोर-जोरसे कोलाहल करने लगे ॥ २ ॥
केचिदासन् विमनसः केचिदासन् मुदान्विताः ।
आहुः परस्परं केचित्त्रिपुणा बुद्धिजीविनः ॥ ३ ॥
कुछ ब्राह्मण उदास हो गये और कुछ प्रसन्नताके मारे फूल उठे तथा कुछ चतुर एवं बुद्धिजीवी ब्राह्मण आपसमें इस प्रकार कहने लगे— ॥ ३ ॥
यत् कर्णशल्यप्रमुखैः क्षत्रियैर्लोकविश्रुतैः ।
नानतं बलवद्भिर्हि धनुर्वेदपरायणैः ॥ ४ ॥
तत् कथं त्वकृतास्त्रेण प्राणतो दुर्बलीयसा ।
वटुमात्रेण शक्यं हि सज्यं कर्तुं धनुर्द्विजाः ॥ ५ ॥
‘ब्राह्मणो! कर्ण और शल्य आदि बलवान्, धनुर्वेदपरायण तथा लोकविख्यात क्षत्रिय जिसे झुका (-तक) न सके, उसी धनुषपर अस्त्र-ज्ञानसे शून्य और शारीरिक बलकी दृष्टिसे अत्यन्त दुर्बल यह निरा ब्राह्मण-बालक कैसे प्रत्यंचा चढ़ा सकेगा ॥ ४-५ ॥
अवहास्या भविष्यन्ति ब्राह्मणाः सर्वराजसु ।
कर्मण्यस्मिन्नसंसिद्धे चापलादपरीक्षिते ॥ ६ ॥
‘इसने बालोचित चपलताके कारण इस कार्यकी कठिनाईपर विचार नहीं किया है। यदि इसमें यह सफल न हुआ तो समस्त राजाओंमें ब्राह्मणोंकी बड़ी हँसी होगी ॥ ६ ॥
यद्येष दर्पाद्धर्षाद् वाप्यथ ब्राह्मणचापलात् ।
प्रस्थितो धनुरानन्तुं वार्यतां साधु मा गमत् ॥ ७ ॥
‘यदि यह अभिमान, हर्ष अथवा ब्राह्मणसुलभ चंचलताके कारण धनुषपर डोरी चढ़ानेके लिये आगे बढ़ा है तो इसे रोक देना चाहिये; अच्छा तो यही होगा कि यह जाय ही
नहीं' ॥ ७ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
नावहास्या भविष्यामो न च लाघवमास्थिताः ।
न च विद्विष्टतां लोके गमिष्यामो महीक्षिताम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण बोले—(भाइयो!) हमारी हँसी नहीं होगी। न हमें किसीके सामने छोटा ही बनना पड़ेगा और लोकमें हमलोग राजाओंके द्वेषपात्र भी नहीं होंगे। (अतः इन बातोंकी चिन्ता छोड़ दो) ॥ ८ ॥
केचिदाहुर्युवा श्रीमान् नागराजकरोपमः ।
पीनस्कन्धोरुबाहुश्च धैर्येण हिमवानिव ॥ ९ ॥
कुछ ब्राह्मणोंने कहा—'यह सुन्दर युवक नागराज ऐरावतके शुण्ड-दण्डके समान हृष्ट-पुष्ट दिखायी देता है। इसके कंधे सुपुष्ट और भुजाएँ बड़ी-बड़ी हैं। यह धैर्यमें हिमालयके समान जान पड़ता है ॥ ९ ॥
सिंहखेलगतिः श्रीमान् मत्तनागेन्द्रविक्रमः ।
सम्भाव्यमस्मिन् कर्मेदमुत्साहाच्चानुमीयते ॥ १० ॥
'इसकी सिंहके समान मस्तानी चाल है। यह शोभाशाली तरुण मतवाले गजराजके समान पराक्रमी प्रतीत होता है। इस वीरके लिये यह कार्य करना सम्भव है। इसका उत्साह देखकर भी ऐसा ही अनुमान होता है ॥ १० ॥
शक्तिरस्य महोत्साहा न ह्यशक्तः स्वयं व्रजेत् ।
न च तद् विद्यते किंचित् कर्म लोकेषु यद् भवेत् ॥ ११ ॥
ब्राह्मणानामसाध्यं च नृषु संस्थानचारिषु ।
अब्भक्षा वायुभक्षाश्च फलाहारा दृढव्रताः ॥ १२ ॥
दुर्बला अपि विप्रा हि बलीयांसः स्वतेजसा ।
ब्राह्मणो नावमन्तव्यः सदसद् वा समाचरन् ॥ १३ ॥
सुखं दुःखं महद् ह्रस्वं कर्म यत् समुपागतम् ।
(धनुर्वेदे च वेदे च योगेषु विविधेषु च ।
न तं पश्यामि मेदिन्यां ब्राह्मणाभ्यधिको भवेत् ॥
मन्त्रयोगबलेनापि महताऽऽत्मबलेन वा ।
जृम्भयेयुरमुं लोकमथवा द्विजसत्तमाः ॥)
जामदग्न्येन रामेण निर्जिताः क्षत्रिया युधि ॥ १४ ॥
इसमें शक्ति और महान् उत्साह है। यदि यह असमर्थ होता तो स्वयं ही धनुषके पास जानेका साहस नहीं करता। सम्पूर्ण लोकोंमें देवता, असुर आदिके रूपमें विचरनेवाले पुरुषोंका ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो ब्राह्मणोंके लिये असाध्य हो। ब्राह्मणलोग जल पीकर,
हवा खाकर अथवा फलाहार करके (भी) दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हैं। अतः वे शरीरसे दुबले होनेपर भी अपने तेजके कारण अत्यन्त बलवान् होते हैं। ब्राह्मण भला-बुरा, सुखद-दुःखद और छोटा-बड़ा जो भी कर्म प्राप्त होता है, कर लेता है; अतः किसी भी कर्मको करते समय उस ब्राह्मणका अपमान नहीं करना चाहिये। मैं भूमण्डलमें ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता जो धनुर्वेद, वेद तथा नाना प्रकारके योगोंमें ब्राह्मणसे बढ़-चढ़कर हो। श्रेष्ठ ब्राह्मण मन्त्रबल, योगबल अथवा महान् आत्मबलसे इस सम्पूर्ण जगत्को स्तब्ध कर सकते हैं। (अतः उनके प्रति तुच्छ बुद्धि नहीं रखनी चाहिये।) देखो, जमदग्निनन्दन परशुरामजीने अकेले ही (सम्पूर्ण) क्षत्रियोंको युद्धमें जीत लिया था ॥ ११—१४ ॥
पीतः समुद्रोऽगस्त्येन ह्यगाधो ब्रह्मतेजसा ।
तस्माद् ब्रुवन्तु सर्वेऽत्र बटुरेष धनुर्महान् ॥ १५ ॥
आरोपयतु शीघ्रं वै तथेत्यूचुर्द्विजर्षभाः ।
‘महर्षि अगस्त्यने अपने ब्रह्मतेजके प्रभावसे अगाध समुद्रको पी डाला। इसलिये आप सब लोग यहाँ आशीर्वाद दें कि यह महान् ब्रह्मचारी शीघ्र ही इस धनुषको चढ़ा दे (और लक्ष्य-वेध करनेमें सफल हो)। यह सुनकर वे श्रेष्ठ ब्राह्मण उसी प्रकार आशीर्वादकी वर्षा करने लगे ॥ १५१/२ ॥
एवं तेषां विलपतां विप्राणां विविधा गिरः ॥ १६ ॥
अर्जुनो धनुषोऽभ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचलः ।
स तद् धनुः परिक्रम्य प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १७ ॥
इस प्रकार जब ब्राह्मणलोग भाँति-भाँतिकी बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुषके पास जाकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये। फिर उन्होंने धनुषके चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की ॥ १६-१७ ॥
प्रणम्य शिरसा देवमीशानं वरदं प्रभुम् ।
कृष्णं च मनसा कृत्वा जगृहे चार्जुनो धनुः ॥ १८ ॥
इसके बाद वरदायक भगवान् शंकरको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और मन-ही-मन भगवान् श्रीकृष्णका चिन्तन करके अर्जुनने वह धनुष उठा लिया ॥ १८ ॥
यत् पार्थिवै रुक्मसुनीथवक्रैः
राधेयदुर्योधनशल्यशाल्वैः ।
तदा धनुर्वेदपरैर्नृसिंहैः
कृतं न सज्यं महतोऽपि यत्नात् ॥ १९ ॥
तदर्जुनो वीर्यवतां सदर्प-
स्तदैन्द्रिरिन्द्रावरजप्रभावः ।
सज्यं च चक्रे निमिषान्तरेण
शरांश्च जग्राह दशार्धसंख्यान् ॥ २० ॥
रुक्म, सुनीथ, वक्र, कर्ण, दुर्योधन, शल्य तथा शाल्व आदि धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् पुरुषसिंह राजालोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुषपर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुषपर विष्णुके समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी वीरोंमें श्रेष्ठताका अभिमान रखनेवाले इन्द्रकुमार अर्जुनने पलक मारते-मारते प्रत्यंचा चढ़ा दी। इसके बाद उन्होंने वे पाँच बाण भी अपने हाथमें ले लिये ।। १९-२० ।।
विव्याध लक्ष्यं निपपात तच्च
छिद्रेण भूमौ सहसातिविद्धम् ।
ततोऽन्तरिक्षे च बभूव नादः
समाजमध्ये च महान् निनादः ॥ २१ ॥
और उन्हें चलाकर बात-की-बातमें (लक्ष्य) वेध दिया। वह बिंधा हुआ लक्ष्य अत्यन्त छिन्न-भिन्न हो यन्त्रके छेदसे सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय आकाशमें बड़े जोरका हर्षनाद हुआ और सभामण्डपमें तो उससे भी महान् आनन्द-कोलाहल छा गया ।। २१ ।।
पुष्पाणि दिव्यानि ववर्ष देवः
पार्थस्य मूर्ध्नि द्विषतां निहन्तुः ॥ २२ ॥
देवतालोग शत्रुहन्ता अर्जुनके मस्तकपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे ।। २२ ।।
चैलानि विव्यधुस्तत्र ब्राह्मणाश्च सहस्रशः ।
विलक्षितास्ततश्चक्रुर्हाहाकारांश्च सर्वशः ।
न्यपतंश्चात्र नभसः समन्तात् पुष्पवृष्टयः ॥ २३ ॥
शताङ्गानि च तूर्याणि वादकाः समवादयन् ।
सूतमागधसङ्घाश्चाप्यस्तुवंस्तत्र सुस्वराः ॥ २४ ॥
सहस्रों ब्राह्मण (हर्षमें भरकर) वहाँ अपने दुपट्टे हिलाने लगे (मानो अर्जुनकी विजय-ध्वजा फहरा रहे हों), फिर तो जो लोग (लक्ष्यवेध करनेमें असमर्थ हो, हार मान चुके थे) वे राजा लोग सब ओरसे हाहाकार करने लगे। उस रंगभूमिमें आकाशसे सब ओर फूलोंकी वर्षा हो रही थी। बाजा बजानेवाले लोग सैकड़ों अंगोंवाली तुरही आदि बजाने लगे। सूत और मागधगण वहाँ मीठे स्वरसे यशोगान करने लगे ।। २३-२४ ।।
तं दृष्ट्वा द्रुपदः प्रीतो बभूव रिपुसूदनः ।
सह सैन्यैश्च पार्थस्य साहाय्यार्थमियेष सः ॥ २५ ॥
अर्जुनको देखकर शत्रुसूदन द्रुपदके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने अपनी सेनाके साथ उनकी सहायता करनेका निश्चय किया ।। २५ ।।
तस्मिंस्तु शब्दे महति प्रवृद्धे
युधिष्ठिरो धर्मभृतां वरिष्ठः ।
आवासमेवोपजगाम शीघ्रं
सार्धं यमाभ्यां पुरुषोत्तमाभ्याम् ॥ २६ ॥
उस समय जब महान् कोलाहल बढ़ने लगा, धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर पुरुषोत्तम नकुल और सहदेवको साथ लेकर डेरेपर ही चले गये ।। २६ ।।
विद्धं तु लक्ष्यं प्रसमीक्ष्य कृष्णा
पार्थं च शक्रप्रतिमं निरीक्ष्य ।
आदाय शुक्लं वरमाल्यदाम
जगाम कुन्तीसुतमुत्स्मयन्ती ।। २७ ।।
(स्वभ्यस्तरूपापि नवेव नित्यं
विनापि हासं हसतीव कन्या ।
मदादृतेऽपि स्खलतीव भावै-
र्वाचा विना व्याहरतीव दृष्ट्या ।।
समेत्य तस्योपरि सोत्ससर्ज
समागतानां पुरतो नृपाणाम् ।
विन्यस्य मालां विनयेन तस्थौ
विहाय राज्ञः सहसा नृपात्मजा ।।
शचीव देवेन्द्रमथाग्निदेवं
स्वाहेव लक्ष्मीश्च यथा मुकुन्दम् ।
उषेव सूर्यं मदनं रतिश्च
महेश्वरं पर्वतराजपुत्री ।
रामं यथा मैथिलराजपुत्री
भैमी यथा राजवरं नलं हि ।।)
लक्ष्यको बिंधकर धरतीपर गिरा देख इन्द्रके तुल्य पराक्रमी अर्जुनपर दृष्टि डालकर हाथमें सुन्दर श्वेत फूलोंकी जयमाला लिये द्रौपदी मन्द-मन्द मुसकराती हुई कुन्तीकुमारके समीप गयी। उसका रूप जिन्होंने बार-बार देखा था, उनके लिये भी वह नित्य नयी-सी जान पड़ती थी। वह द्रुपदकुमारी बिना हँसीके भी हँसती-सी प्रतीत होती थी। मदसेवनके बिना भी (आन्तरिक अनुराग-सूचक) भावोंके द्वारा लड़खड़ाती-सी चलती थी और बिना बोले भी केवल दृष्टिसे ही बातचीत करती-सी जान पड़ती थी। निकट जाकर राजकुमारी द्रौपदीने वहाँ जुटे हुए समस्त राजाओंके समक्ष उन सबकी उपेक्षा करके सहसा वह माला अर्जुनके गलेमें डाल दी और विनयपूर्वक खड़ी हो गयी। जैसे शचीने देवराज इन्द्रका, स्वाहाने अग्निदेवका, लक्ष्मीने भगवान् विष्णुका, उषाने सूर्यदेवका, रतिने कामदेवका, गिरिराजकुमारी उमाने महेश्वरका, विदेहराजनन्दिनी सीताने श्रीरामका तथा भीमकुमारी दमयन्तीने नृपश्रेष्ठ नलका वरण किया था, उसी प्रकार द्रौपदीने पाण्डुपुत्र अर्जुनका वरण कर लिया ।। २७ ।।
स तामुपादाय विजित्य रङ्गे
द्विजातिभिस्तैरभिपूज्यमानः ।
रङ्गाान्निचक्रामदचिन्त्यकर्मा
पत्न्या तया चाप्यनुगम्यमानः ॥ २८ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले अर्जुन इस प्रकार उस स्वयंवरसभामें (स्त्रीरत्न द्रौपदीको जीतकर) उसे अपने साथ ले रंगभूमिसे बाहर निकले। पत्नी द्रौपदी उनके पीछे-पीछे चल रही थी। उस समय उपस्थित ब्राह्मणोंने उनका बड़ा सत्कार किया ॥ २८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि लक्ष्यच्छेदने
सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें लक्ष्यछेदनविषयक एक सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३३ १/३ श्लोक हैं)