महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
जरिता और उसके बच्चोंका संवाद
जरितोवाच
अस्माद् बिलान्निष्पतितमाखुं श्येनो जहार तम् ।
क्षुद्रं पद्ध्यां गृहीत्वा च यातो नात्र भयं हि वः ॥ १ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! चूहा इस बिलसे निकला था, उस समय उसे बाज उठा ले गया; उस छोटेसे चूहेको वह अपने दोनों पंजोंसे पकड़कर उड़ गया। अतः अब इस बिलमें तुम्हारे लिये भय नहीं है ॥ १ ॥
शाङ्गँका ऊचुः
न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥ २ ॥
शाङ्गँक बोले— हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहेको उठा ले गया। उस बिलमें दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है ॥ २ ॥
संशयो वह्निरागच्छेदृ दृष्टं वायोर्निवर्तनम् ।
मृत्युर्नो बिलवासिभ्यो बिले स्यान्नात्र संशयः ॥ ३ ॥
आग यहाँतक आयेगी, इसमें संदेह है; क्योंकि वायुके वेगसे अग्निका दूसरी ओर पलट जाना भी देखा गया है। परंतु बिलमें तो उसके भीतर रहनेवाले जीवोंसे हमारी मृत्यु होनेमें कोई संशय ही नहीं है ॥ ३ ॥
निःसंशयात् संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते ।
चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ ४ ॥
माँ! संशयरहित मृत्युसे संशययुक्त मृत्यु अच्छी है (क्योंकि उसमें बच जानेकी भी आशा होती है); अतः तुम आकाशमें उड़ जाओ। तुम्हें फिर (धर्मानुकूल रीतिसे) सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४ ॥
जरितोवाच
अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पततां वरम् ।
बिलादाखुं समादाय श्येनं पुत्रा महाबलम् ॥ ५ ॥
तं पतन्तं महावेगात् त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् ।
आशिषोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूषिकं बिलात् ॥ ६ ॥
जरिताने कहा— बच्चो! जब पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली बाज बिलसे चूहेको लेकर वेगपूर्वक उड़ा जा रहा था, उस समय महान् वेगसे उड़नेवाले उस बाजके पीछे मैं भी बड़ी
तीव्र गतिसे गयी और बिलसे चूहेको ले जानेके कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली — ॥ ५-६ ॥
यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि ।
भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥
‘श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय’ ॥ ७ ॥
स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्त्रिणा ।
तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥ ८ ॥
जब उस पक्षिप्रवर बाजने चूहेको खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी ॥ ८ ॥
प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् ।
श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥ ९ ॥
अतः बच्चो! तुमलोग विश्वासपूर्वक बिलमें घुसो। वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है। महान् बाजने मेरी आँखोंके सामने ही चूहेका अपहरण किया था ॥ ९ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥
शार्ङ्गका बोले—माँ! बाजने चूहेको पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिलमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १० ॥
जरितोवाच
अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् ।
नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥
जरिताने कहा—बेटो! मैं जानती हूँ, बाजने अवश्य चूहेको पकड़ लिया। तुमलोग मेरी बात मानो। इस बिलमें तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ११ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः ।
समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥ १२ ॥
शार्ङ्गका बोले—माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भयसे छुड़ानेकी चेष्टा न करो। संदिग्ध कार्योंमें प्रवृत्त होना बुद्धिमानीका काम नहीं है ॥ १२ ॥
न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान् वेत्थ ये वयम् ।
पीड्यमाना बिभर्ष्यास्मान् का सती के वयं तव ॥ १३ ॥
हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है और हम पहले कौन थे, इस बातको भी तुम नहीं जानतीं। फिर तुम क्यों कष्ट सहकर हमारी रक्षा करना चाहती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं? ।। १३ ।।
तरुणी दर्शनीयासि समर्था भर्तुरिषणे ।
अनुगच्छ पतिं मात: पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ।। १४ ।।
माँ! अभी तुम्हारी तरुण अवस्था है, तुम दर्शनीय सुन्दरी हो और पतिके अन्वेषणमें समर्थ भी हो। अतः पतिका ही अनुसरण करो। तुम्हें फिर सुन्दर पुत्र मिल जायँगे ।। १४ ।।
वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् ।
अथास्मान् न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ।। १५ ।।
हम आगमें जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्निने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना ।। १५ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता ततः शार्ङ्गी पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे ।
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ।। १६ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! बच्चोंके ऐसा कहनेपर शार्ङ्गी उन्हें खाण्डववनमें छोड़कर तुरंत ऐसे स्थानमें चली गयी, जहाँ आगसे कुशलपूर्वक बिना किसी कष्टके बच जानेकी सम्भावना थी ।। १६ ।।
ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात् त्वरितो हव्यवाहनः ।
यत्र शार्ङ्गा बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ।। १७ ।।
तदनन्तर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव तुरंत वहाँ आ पहुँचे, जहाँ मन्दपालके पुत्र शार्ङ्गक पक्षी मौजूद थे ।। १७ ।।
ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहंगमाः ।
जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ।। १८ ।।
तब उस जलती हुई आगको देखकर वे पक्षी आपसमें वार्तालाप करने लगे। उनमेंसे जरितारिने अग्निदेवको यह बात सुनायी ।। १८ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने
त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २३० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २३० ।।